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गजब समाजवादी तर्क ! करात एंड कम्पनी घोर ‘मार्क्सवादी’ है, पर राष्ट्रीय नही !

उज्ज्वल भट्टाचार्या

मित्र चंचल कुमार कहते हैं : "करात एंड कम्पनी घोर 'मार्क्सवादी' है, पर राष्ट्रीय नहीं हैं ये और इनकी पार्टी अंतरराष्ट्रीय है चुनांचे इनके सारे फैसले वही होंगे जो क्रेमलिन करेगा या बेजिंग। क्रेमलिंग के बिखराव के बाद करात बेजिंग पर उलझे पड़े हैं।“

मुझे 1970-71 में कॉमरेड भूपेश गुप्त के साथ हुई एक बातचीत याद आ रही है।

मैंने सुभाष बोस के लिये कम्युनिस्टों की ओर से कहे गये अपशब्दों का ज़िक्र छेड़ा था और उनकी राय जानना चाहता था। अपनी याददाश्त से उनकी बातों को दोहरा रहा हूं।

कॉमरेड गुप्त ने कहा कि पार्टी की किसी दस्तावेज में ऐसी कोई बात नहीं कही गई थी। पार्टी के बांगला मुखपत्र में एक लेख में ये बातें कही गई थीं, जिनकी आज भी चर्चा होती है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मूल्यांकन में बोस के साथ हमारे मतभेद थे और हमने आलोचना की। यह पूरी तरह से जायज़ था, लेकिन हमने सुभाष की देशभक्ति पर सवाल उठाया, यह बिल्कुल ग़लत था और हमने इसके लिये माफ़ी मांगी है।

इसके बाद मेरी ओर देखते हुए उन्होंने कहा : दूसरी ओर, हमारे विरोधी मौक़ा मिलते ही हमें देशद्रोही कहते हैं। क्या उन्होंने कभी अपनी ग़लती स्वीकार की है ?

देशद्रोहियों का समर्थन चाहना कैसी देशभक्ति है जनाब ?

चंचल कुमार ने भी यही किया है. पेकिंग के निर्देश पर कम्युनिस्ट ऐसा कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, वे देशद्रोही हैं।

पहला सवाल तो यह है कि आपने अपने राजनीतिक जीवन में कई बार इन देशद्रोहियों को अपने साथ लिया है। अब भी आपको शिकायत यह है कि ये देशद्रोही कांग्रेस का समर्थन नहीं कर रहे हैं। देशद्रोहियों का समर्थन चाहना कैसी देशभक्ति है जनाब ? आपका मानना है कि करात की लाईन दरअसल मोदी को बनाये रखने के लिये पेकिंग के षड़यंत्र का अंग है। आपकी राजनीतिक बुद्धिमत्ता अपनी जगह पर, मैं कहने की कोशिश करूंगा कि करात लाईन के बारे में मेरी क्या समझ है।



मुख्यधारा की तीनों कम्युनिस्ट पार्टियां भारत में संसदीय लोकतंत्र को स्वीकार करती हैं, चुनाव में भाग लेती हैं। इनमें से दो पार्टियां सरकारों में भाग ले चुकी हैं, सरकार बना चुकी हैं। लेकिन उनकी पार्टी कार्यक्रम आधारित समझ के अनुसार यह भागीदारी क्रांति के लिये, आमूल सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के लिये वृहत्तर व दीर्घकालीन रणनीति का हिस्सा है, उसके लिये तैयारी है। लेकिन अमल में क्या हो रहा है ? इन पार्टियों का पूरा ध्यान, उनकी समूची राजनीति अपने-अपने चुनावी किले की रक्षा पर केंद्रित हो चुका है। इस बार भी हमने देखा कि सीपीएम के अंदर दो परस्पर विरोधी लाइनों की वकालत मुख्यतः केरल और बंगाल से आये सदस्य कर रहे थे। केरल में वामपंथियों की चुनावी लड़ाई कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे से है। दूसरी ओर, बंगाल के कामरेड चुनावी मैदान में भी भाजपा से मिल रही चुनौती को महसूस कर रहे हैं। भारत की राजनीतिक परिस्थिति का – कम से कम – मार्क्सवादी नज़रिये से मूल्यांकन नहीं, बल्कि सीटें जीतना और सरकार बना सकना ही उनकी रणनीति का आधार बन चुका है। संसदीय लोकतंत्र में भागीदारी से आगे बढ़कर वे अवसरवादी संसदीय लोकतंत्रवाद से ग्रस्त हो चुके हैं। इससे उबरकर उन्हें संघर्ष के रास्ते पर आना पड़ेगा। सारे देश में उभर रहे संघर्ष से जुड़ना पड़ेगा। नई चुनौतियो को समझना पड़ेगा, उनका सामना करना पड़ेगा।




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