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कासगंज : यह पहला मौका नहीं है जब हिन्दुत्व ने लाश पर सियासत की हो

कासगंज के आईने में हिन्दुत्व  

शरद जायसवाल

कासगंज की घटना को एक महीना बीत चुका है और इस एक महीने में कासगंज जितना चर्चा में रहा उतना शायद ही कभी रहा हो. बीते 26 जनवरी को वहां जो कुछ हुआ वह राष्ट्रीय ख़बरों की सुर्ख़ियों में था. यह अपने आप में बड़ा ही आश्चर्य का विषय है कि लम्बे समय के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक हिस्से ने कासगंज की सांप्रदायिक हिंसा के सच को हम तक पहुँचाया. कासगंज की घटना के एक महीना बीत जाने के बाद ऊपर से देखने पर यह मालूम पड़ता है कि यहाँ का जीवन सामान्य हो चुका है लेकिन यहाँ के लोगों से कुछ देर बात करने के बाद यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि लोग आज भी डर के साए में हैं. बहुत सारे ऐसे मुसलमान जिन्होंने हिंसा के दरम्यान मुस्लिम बाहुल्य बस्तियों में शरण ली थी, वे भले ही अपने घरों में वापस लौट आये हों लेकिन आज भी खौफ से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं. कासगंज के क़ुतुब भाई बताते हैं कि पिछले चार सालों से हमलोग जब कभी हिन्दू बस्तियों में जाते हैं एक डर हमारे अन्दर रहता है और इस घटना ने तो हमारे इस डर को और ज्यादा बढ़ाया है. सामान्य हिन्दू अब मुश्किल से मुसलमानों की दुकान से सामान खरीद रहा है और यही चीज़ मुसलमानों के साथ भी है. सिर्फ अपनी ही कौम को मुनाफा पहुँचाने के पीछे का गतिविज्ञान इस बात पर आधारित है कि जिन लोगों ने हमारे ऊपर हमला किया, उनको हम क्यों फायदा पहुंचाएं. यानी कासगंज के ताने-बाने में एक गहरी दरार पैदा हुई है. एक विश्वास जो पहले से काफी सीमित था और कमजोर हुआ है.

सांप्रदायिक हिंसा की इस घटना ने सिर्फ विश्वास को ही कमजोर नहीं किया है बल्कि यहाँ का व्यापार भी आज की तारीख में पटरी पर नहीं लौट पाया है. यहाँ का किराने का काम, जिस पर हिन्दुओं का ज्यादा नियंत्रण है. लोहे और कपड़े के व्यापार पर मुस्लिम समाज के एक तबके का नियंत्रण ज्यादा है. पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी और अब दंगा. इस बात के पर्याप्त उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं कि सांप्रदायिक हिंसा की कोई भी घटना अप्रत्यक्ष रूप से समाज के दोनों तबकों को कम या ज्यादा प्रभावित करती है. भागलपुर में 1989 में हुए जनसंहार के बारे में यह कहा जाता है कि हिंदुत्व को वित्तीय सहायता देने में वहां के मारवाड़ियों की बड़ी भूमिका थी. लेकिन जब शहर में बुनकर मुसलामानों के खिलाफ हमला शुरू हुआ और उनके पॉवरलूम को निशाना बनाया गया. तो इस घटना के बाद सिर्फ मुस्लिम बुनकर ही तबाह नहीं हुए बल्कि ये लोग जिन मारवाड़ियों के लिए उत्पादन करते थे वह पूरा का पूरा साड़ी और भागलपुरी चादर का व्यापार ही तबाह हो गया. लगभग इसी परिघटना को हम मुजफ्फरनगर में भी देख सकते हैं जहां पर जाटों ने अपने खेतों में काम करने वाले मुस्लिम मजदूरों पर हमला किया और ये मजदूर हमले के बाद गाँव से पलायन कर गए. जब दोनों समुदाय अपनी-अपनी कौम के फायदे (मुनाफे) के बारे में इतने ज्यादा सजग हो गए हों तब हमें यह भी देखना होगा कि इस घटना का सियासी फायदा किसे मिला है.



सांप्रदायिक हिंसा के सियासी व समाजी नफा-नुकसान का सवाल आपस में जुड़ा हुआ है. कासगंज में चन्दन गुप्ता की मौत के बाद जिस तरह से उसकी लाश पर हिंदुत्व ने सियासत की, यह कहा जा सकता है कि इस घटना के बाद हिंदुत्व ने एक बार फिर से अपने विचारों का विस्तार किया है. यह पहला मौका नहीं है जब हिन्दुत्व ने लाश पर सियासत की हो. गुजरात, मुज़फ्फरनगर और अखलाक के हत्यारे की लाशों पर पहले भी सियासत की जा चुकी है और इसी सफल प्रयोग को यहाँ पर भी दोहराया गया है. लेकिन इस घटना का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू हिंदुत्व को काउंटर करने वाली सेकुलर सियासत का राजनैतिक परिदृश्य से पूरी तरह से गायब होना है.  

हम जानते हैं कि साम्प्रदायिक हिंसा की छोटी सी छोटी घटना भी दो समुदाय के बीच खड़ी दीवार को और ज्यादा मज़बूत करती है. आज़ादी से पहले और कुछ समय बाद भी सियासत में कुछ नेक लोग थे, जो इस तरह की घटनाओं के बाद जाकर वहां पर सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए काम करते थे. गांधी खुद नोआखली की घटना के बाद बंगाल गए थे और कई दिनों तक वहां पर रहे. इसी तरह जब बटवारे के बाद दिल्ली में हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही थी तो गांधी ने उपवास किया था और जिसके प्रभाव स्वरुप हिंसा लगभग समाप्त हो गई थी. बंगाल में हुई हिंसा के बाद लोहिया भी काफी समय तक वहां रहे थे. इसी तरह से हम जेपी का नाम भी ले सकते हैं, जो 1946 में बिहार में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के बाद कई जिलों में जाकर रहे थे और आज़ादी के बाद 1962 में जबलपुर में भयानक दंगा हुआ था तो वहां पर भी जेपी गए थे और बाकायदा कैंप किया था. लेकिन कासगंज की घटना के बाद शायद ही विपक्ष का कोई नेता मुसलमानों के उन परिवारों से मिलने गया हो, जो इस हिंसा के शिकार हुए हैं. वहां पर रहकर सांप्रदायिक सद्भाव के लिए काम करना तो बहुत दूर की बात है. इस तरह के प्रयास अब नागरिक समाज की तरफ से भी लगभग नहीं किये जाते हैं. नागरिक समाज के ज्यादातर लोग हिंसा के बाद वहां पर पहुँचते हैं और अपनी जांच रिपोर्ट को मीडिया में जारी कर देते हैं. जो भविष्य में अकादमिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की जाती है. यानी जो दूरियां दिलों के बीच में पैदा हुईं, उनको पाटने की दिशा में कोई कार्य नहीं किया जाता है. आज़ादी के बाद से ही देश की सेकुलर सियासत के लिए ग्रास रूट लेवल पर सेकुलरिज्म के लिए काम करने को लेकर कोई कंसर्न नहीं दिखता है. उनका मानना है कि समाज के सेकुलराईजेशन के काम को राज्य के द्वारा ही संपन्न किया जाना है. जबकि हिंदुत्व अपने जनाधार के बीच में अपने जनसंगठनों व संस्थाओं के माध्यम से लगातार सक्रिय रहता है. इस ट्रेन्ड को हम बंटवारे के बाद से ही लगातार घटते हुए देख सकते हैं.

उत्तर प्रदेश और केंद्र में हिन्दुत्ववादी सरकार के रहने के वावजूद कासगंज की हिंसा के दरम्यान जिस तरह से एक हिन्दू की मौत हुई, वह स्वाभाविक तौर पर सरकार की हिन्दू क्रेडीबिलिटी पर सवाल खड़े करता है. उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अखलाक की तर्ज़ पर 20 लाख का मुआवजा, हिन्दुओं को यह बताने के लिए पीड़ित परिवार को दिया कि सपा की लॉयल्टी अखलाक के प्रति थी तो हमारी चन्दन गुप्ता के प्रति. इसके बाद जिस तरह से मुसलामानों की गिरफ्तारियां, उनके घरों पर छापेमारी व घर के दरवाज़े पुलिस के द्वारा तोड़े गए, उस समय मीडिया के लोगों का उनके साथ-साथ जाना और इस घटना का वीडियो बनाकर प्रसारित करना यह बताता है कि केवल हिन्दुओं के प्रति जवाबदेह सरकार अपनी कम्युनिटी को पुलिस की इस बर्बरता को दिखाकर उनके अन्दर पल रहे विक्षोभ को शांत करना चाहती है.

कासगंज की घटना का हिंदुत्व पर कितना दबाव था इसका पता इस बात से भी चलता है कि इसी घटना पर एक न्यूज़ चैनल पर संघ का उदारवादी मुखौटा पहनने वाले विचारक और प्रवक्ता राकेश सिन्हा को भी आक्रामक रुख अख्तियार करना पड़ा. उन्होंने बहुत सोच समझकर यह कहा कि जिस दिन हिन्दुओं की तरफ से प्रतिक्रिया होगी मुसलमान इस देश में 15 मिनट तो क्या 15 सेकेंड भी नहीं टिक पायेंगे.



हिंदुत्व के पास सिर्फ बहुत सारे मुखौटे ही नहीं हैं बल्कि बहुत सारे मुद्दे भी हैं. हर मुखौटा एक अलग मुद्दे से ताल्लुक रखता है. हिंदुत्व लगातार नए-नए मुद्दे गढ़ भी रहा है. इन प्रमुख मुद्दों में गौ हत्या, लव जेहाद, पाकिस्तान, आतंकवाद, आबादी बढ़ाने का मसला और क्रिकेट आदि हैं. हो सकता है कि कोई हिन्दू सारे मुसलमानों को आतंकवादी न मानता हो या फिर लव जेहादी न मानता हो लेकिन अंततः वह इस बात पर हिंदुत्व के साथ खड़ा हो सकता है कि हाँ सभी मुसलमान पाकिस्तान के क्रिकेट मैच जीतने पर खुश होते हैं.

हिंदुत्व ने इस देश के हिन्दुओं के सामने बहुत सारे विकल्प रखे हैं और किसी न किसी विकल्प के साथ बहुसंख्यक समुदाय हिंदुत्व के सुर में सुर मिलाता ही है. हिंदुत्व अपनी मुस्लिम विरोधी राजनीति के तहत इन मुद्दों का लगातार विस्तार कर रहा है और 2014 के बाद उसने इन सभी के साथ नए नए मुद्दों पर काफी आक्रामकता के साथ काम किया है. जैसे पिछले ही साल जब पाकिस्तान ने भारत को हराकर चैंपियन्स ट्राफी का फाइनल क्रिकेट मैच जीता था. उसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में मुसलमानों की गिरफ्तारियां हुईं थीं और ये गिरफ्तारियां हिंदुत्व की सोची-समझी रणनीति के तहत हुईं थीं. आज़ादी के बाद से ही उसने इस बात के लिए जनमत बनाया कि पाकिस्तान के मैच जीतने के बाद मुसलमान खुशियाँ मनाते हैं. अब जब उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार कायम हुई तो उन्होंने इस फसल को आसानी के साथ काटा.

इसी तरह से कासगंज में तिरंगा यात्रा निकालने का मकसद खुद को तिरंगे के साथ जोड़ने के साथ ही मुसलमानों को गद्दार घोषित करना है. पिछले कुछ सालों में 26 जनवरी और 15 अगस्त को भारतीय राज्य की तरफ से आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों की गिरफ्तारी होना एक आम परिघटना बन चुकी है. इन गिरफ्तारियों का मकसद यह सन्देश देना है कि इस देश का मुसलमान देश के संविधान और आज़ादी को नहीं मानता है. जाहिरा तौर पर हिंदुत्व मुसलमानों को देशद्रोही बताने के इस पवित्र काम से अपने आपको अलग नहीं रख सकता है जबकि केंद्र और राज्य दोनों जगह पर उसकी अपनी सरकार कायम हो. कासगंज में इस प्रयोग को दोहराया गया और आसानी से इस बात को प्रचारित किया गया कि देश के मुसलमान राष्ट्रवाद के प्रतीक तिरंगे को नहीं मानते हैं. कश्मीर के बारे में तो पहले ही इस तथ्य को स्थापित किया जा चुका है और इसी के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाली खबर अब बहुत सामान्य हो चुकी है कि मुसलमानों ने पाकिस्तानी झंडा फहराया या पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी की.

सांप्रदायिक हिंसा की किसी भी घटना में मुसलमानों की आस्था के केंद्र यानी मस्जिदों को निशाना बनाया जाना अब एक सामान्य परिघटना का रूप ले चुका है. कासगंज में भी दो मस्जिदों को जलाने की घटना सामने आई है. इसका रिश्ता बेशक उस इतिहास बोध से है जिसे इस देश की बहुसंख्यक अवाम के अन्दर हिंदुत्व ने पैदा किया है और जिसका लक्ष्य हिन्दुओं के ऊपर हुई मध्ययुगीन हिंसा का प्रतिशोध लेना है. यह इतिहास बोध इस बात की तरफ भी इशारा करता है कि साझी संस्कृति और साझी विरासत वाली बातों से इस देश का बहुसंख्यक तबका बहुत दूर जा चुका है. बंटवारे के बाद या ख़ासतौर पर राम जन्म भूमि आन्दोलन के बाद देश में कितनी मजारों और मस्जिदों को नुकसान पहुँचाया गया इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है.

बिहार के छपरा जिले में 2016 में हुई सांप्रदायिक हिंसा में तकरीबन 60 मस्जिदों और मजारों को नुकसान पहुँचाया गया था. जिसपर कोई चर्चा राष्ट्रीय मीडिया में नहीं दिखती है.

हिंदुत्व भले ही बाबरी मस्जिद की जगह राम का आलीशान मंदिर बनाने में अभी तक कामयाब न हुआ हो लेकिन देश के कई मजारों के ऊपर बजरंग बली के मंदिरों को बनाने में वह जरुर कामयाब हो चुका है.

भागलपुर में इस समय का सबसे भव्य और चहल-पहल वाले मंदिर को एक मजार को ध्वस्त करके ही बनाया गया है. जहाँ पर सबसे ज्यादा चढ़ावा सेठों और नव मध्यम वर्ग की तरफ से आता है, जिस पर इस देश की सेकुलर सियासत ने चूं तक नहीं की है. भागलपुर का यह मंदिर अभी तीस वर्ष की आयु भी पूरी नहीं कर पाया है लेकिन इसके प्राचीनतम होने के दावे भी किए जाने लगे हैं. आज भले ही अयोध्या में राम के भव्य मंदिर को लेकर किये जाने वाले मोबिलाइजेशन में हिंदुत्व की कोई दिलचस्पी नहीं रह गयी है. लेकिन वह आसानी के साथ किसी भी शहर में मस्जिदों को तोड़ने के लिए राम भक्तों को इकठ्ठा कर सकता है.



हिंदी के मशहूर कवि गोरख पाण्डेय की एक कविता है, ‘इस साल दंगा बहुत बड़ा था, खूब हुई थी खून की बारिश, अगले साल अच्छी होगी फसल मतदान की’. यह कविता चुनावी राजनीति और साम्प्रदायिकता के गठजोड़ को उजागर करती है. लेकिन कासगंज की हिंसा और अब पांचो साल चलने वाली सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं यह भी बताती हैं कि साम्प्रदायिकता और चुनावी राजनीति के बीच जो रिश्ता हुआ करता था, साम्प्रदायिकता अब उससे आगे बढ़ चुकी है. देश के तमाम सारे हिस्सों में होने वाली सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं यह भी बताती हैं कि हिंदुत्व ने देश के अधिकाँश हिस्सों में संस्थागत दंगा प्रणाली (इस सिद्धांत का विकास मशहूर राजनैतिक वैज्ञानिक पॉल आर ब्रास ने किया था जिसे उन्होंने Structural riot system का नाम दिया था) का विकास कर लिया है. अब यह उनके ऊपर निर्भर करता है कि वो दंगा करना चाहते हैं या नहीं. सेकुलर सियासत की अब वो हैसियत नहीं रह गयी है कि उसे रोक सके.

किशन पटनायक ने अपने एक लेख में महत्वपूर्ण घटना की तरफ इशारा किया है. बाबरी मस्जिद के विध्वंस से पहले कई सारे सेकुलर नेता अटल बिहारी बाजपेई से मिले थे और उन्होंने उनसे इस बात का वचन लिया था कि बाबरी मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. हम सब जानते हैं कि बाजपेई ‘राजपूत’ नहीं थे जो अपने वचन पर कायम रहते. यह घटना यह बताती है कि 1990 के दशक में ही सेकुलर सियासत अपनी ताकत को खो चुकी थी.

कासगंज के मुसलमानों को इस घटना के बाद यह कहते सुना जा सकता है कि कासगंज को एक ‘धब्बा’ लग गया है. इस धब्बे को उन इलाकों के मुसलामानों के जहन में भी जाकर टटोला जा सकता है जहाँ पर बंटवारे के बाद पहली मर्तबा सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हो रही हैं. इन इलाकों में रहने वाला हर मुसलमान जानता है कि इस धब्बे के लिए अंततः उसे ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा और इसका खामियाजा भी आने वाले समय में उसे ही भुगतना होगा.

शरद जायसवाल, लेखक सामाजिक कार्यकर्ता व महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में सहायक प्रोफेसर हैं।

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