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उप्र : साम्प्रदायिक राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा पर कासगंज ने सब कुछ खोया नहीं है

कासगंज हिंसा : तथ्यांवेषण रपट
सीएसएसएस टीम

पिछले कुछ समय से कौन राष्ट्रवादी है और कौन नहीं, इसे परिभाषित करना बहुत आसान बना दिया गया है। अगर आप वन्देमातरम् का नारा लगाते हैं, तो आप राष्ट्रवादी हैं, अन्यथा राष्ट्रद्रोही, अगर आप गाय को माता मानते हैं तो आप देशभक्त हैं, अन्यथा देश के दुश्मन। ऐसा ही एक नया चलन है मुस्लिम-बहुल इलाकों में हिन्दू श्रेष्ठतावादियों द्वारा शक्ति प्रदर्शन और अपना प्रभुत्व जमाने के लिए मोटर साईकिल रैलियां निकाली जाना। बिहार के भागलपुर में रामनवमी के अवसर पर निकाली गई ऐसी ही एक रैली के बाद साम्प्रदायिक हिंसा हुई थी।

यही कहानी उत्तरप्रदेश के कासगंज में 26 जनवरी, 2018 को दुहराई गई। संकल्प फाउंडेशन नामक एक संस्था के झंडे तले, कासगंज के कुछ युवाओं ने एक मोटरसाईकिल रैली निकाली। वे जब एक मुस्लिम-बहुल इलाके से गुजर रहे थे, तब उन्होंने यह मांग की कि स्थानीय मुस्लिम रहवासियों द्वारा आयोजित झंडा वंदन कार्यक्रम के लिए रखी गई कुर्सियां हटाई जाएं ताकि रैली आगे बढ़ सके। इसके बाद हुई हिंसा में चंदन गुप्ता नामक एक युवक को गोली लग गई और बाद में उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया। एक अन्य युवक नौशाद को भी पैर में गोली लगी। यह हिंसा 28 जनवरी तक जारी रही, जिसके दौरान हिन्दू श्रेष्ठतावादियों के उकसावे और नेतृत्व में मुसलमानों की दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया।

संघ परिवार भगवा झंडा पहराकर कर रहा है तिरंगे का अपमान

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म (सीएसएसएस) का एक तथ्यांवेषण दल, इस हिंसा की जांच करने कासगंज गया। इस दल में सेंटर के निदेशक, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता इरफान इंजीनियर, सेंटर की उप-निदेशक नेहा दाबाड़े व सामाजिक कार्यकर्ता अकरम अख्तर चैधरी, जो अफकार इंडिया फाउंडेशन से जुड़े हुए हैं, शामिल थे। दल ने चंदन गुप्ता और सलीम के परिवारों के अतिरिक्त, स्थानीय दुकानदारों, पत्रकारों, बड्डूनगर इलाके के रहवासियों, जिले के पुलिस अधीक्षक, कांग्रेस नेता शशिलता चौहान, बीएसपी नेता राजीव शर्मा एवं व्यवसायी अनुपम शर्मा से बातचीत की।

दल इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि उत्तरप्रदेश में साम्प्रदायिक राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है। अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के लिए विख्यात यह राज्य, साम्प्रदायिक हिंसा के लिए भी कुख्यात है।

अलग-अलग कथाएं

विभिन्न लोगों से बातचीत के दौरान, कासगंज में दो अलग-अलग कहानियां सामने आईं। पहली कहानी चंदन गुप्ता के पिता सुशील गुप्ता की है। सुशील गुप्ता के अनुसार, संकल्प फाउंडेशन युवाओं का एक संगठन है जो गरीबों को भोजन, कपड़े, कबंल आदि बांटने जैसे परोपकारी कार्य करता है। उनके अनुसार, चंदन गुप्ता भी ऐसी परोपकारी गतिविधियों में हिस्सा लेता था और वह रक्तदान भी करता था। उनके पिता के अनुसार, उसने अब तक तीन बार रक्तदान किया था और तीनों ही बार संबंधित मरीज मुसलमान थे। उन्होंने हिंसा के लिए केवल बड्डूनगर के मुसलमानों को दोषी ठहराया। उन्होंने उस दिन बनाए गए एक वीडियो की मदद से घटनाक्रम का विवरण दिया।

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उन्होंने बताया कि संकल्प फाउंडेशन ने 26 जनवरी को एक मोटरसाईकिल रैली निकालने का निर्णय लिया। उनका दावा था कि रैली में भागीदारी कर रहे सभी नौजवान अपने हाथों में राष्ट्रध्वज लिए हुए थे। जब रैली बड्डूनगर के वीर अब्दुल हमीद चौराहे पर पहुंची तो युवकों ने पाया कि बीच सड़क पर कुर्सियां रखी हुईं हैं। उन्होंने कहा कि कुर्सियों को हटाकर रैली को आगे जाने के लिए रास्ता दिया जाए। सुशील गुप्ता के अनुसार, वहां झंडा वंदन का कार्यक्रम आयोजित नहीं था, क्योंकि ऐसे कार्यक्रम अमूमन सुबह-सुबह आयोजित किए जाते हैं और उस समय दिन के 10 बज रहे थे। उनके अनुसार, कुर्सियां हटाने की बजाए वहां के लोगों ने रैली में शामिल युवाओं पर पथराव शुरू कर दिया। असहाय युवकों को अपनी गाड़ियां छोड़कर वहां से भागना पड़ा।

जो वीडियो जांच दल को दिखाया गया, उसमें रैली में भाग ले रहे युवक हाथों में भगवा ध्वज दिखाई दे रहे थे। वे बहुत आक्रामक थे और नारे लगा रहे थे। वीडियो में कहीं भी मुसलमान रैली पर हमला करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं।

भाजपा की दंगे की राजनीति : कासगंज का दंगा भाजपा द्वारा प्रायोजित

कासगंज की कांग्रेस नेता शशिलता चौहान ने हिंसा के लिए दोनों समुदायों के युवकों की पुरानी रंजिश को दोषी ठहराया। उनका कहना था कि व्यक्तिगत लड़ाई को साम्प्रदायिक हिंसा का स्वरूप दे दिया गया है। उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त किया कि हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के निर्दोष युवकों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया। परंतु उन्होंने चंदन गुप्ता की मौत के बाद भाजपा सांसद राजवीर सिंह द्वारा 26 जनवरी की शाम को दिए गए भाषण को अत्यंत आपत्तिजनक बताते हुए कहा कि उसके कारण हालात बिगड़े और हिंसा शुरू हुई। राजवीर सिंह ने अपने भाषण में कहा, ‘‘मैं पूरी ताकत के  साथ आपके साथ हूं। जो घटना हुई है उसे भुलाया नहीं जा सकता। मैंने कासगंज में इस तरह का गुस्सा पहले कभी नहीं देखा। इस घटना में ‘हमारे लोगों‘ का कोई दोष नहीं है। यह झगड़ा सुनियोजित था, जिसमें ‘हम में से एक‘ मारा गया है। मुझे यह पता लगा है कि चंदन गुप्ता जो ‘हम में से एक‘ था की जान चली गई है‘‘।

क्या कहते हैं मुस्लिम रहवासी

बड्डूनगर के मुस्लिम रहवासियों का कुछ और ही कहना है। डॉ. आसिफ हुसैन का घर बड्डूनगर में अब्दुल हमीद चौराहे पर ही है और 26 जनवरी को रैली उनके घर के सामने से गुजरी थी। उन्होंने बताया कि इस वर्ष पहली बार झंडा वंदन का कार्यक्रम चौराहे पर आयोजित किया गया था। इसके पहले, मुसलमान गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम स्कूलों आयोजित करते थे। इस साल मुसलमानों ने तय किया कि वे चौराहे पर झंडा फहराएंगे ताकि वे सरकार और लोगों को यह बता सकें कि मुसलमान भी झंडावंदन करते हैं और देषभक्त हैं। इस कार्यक्रम के लिए व्यापक तैयारियां की गईं थीं और एक स्थानीय नागरिक मुफ्ती कुबेब को 9.30 बजे झंडा फहराने के लिए आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम के लिए छोटे से चौराहे पर कुर्सियां लगाई गईं थीं।

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उन्होंने दल को कई वीडियो भी दिखाए, जो मूलतः सीसीटीवी फुटैज थे। इन वीडियो को देखने से यह पता चलता है कि 10 बजे के आसपास 60 से 70 मोटरसाईकिलों की रैली चौराहे पर पहुंची। मोटरसाईकिलों पर सवार कई युवक भगवा झंडे लिए हुए थे। उन्होंने अत्यंत आक्रामकता से मांग की कि रास्ते से कुर्सियां हटा ली जाएं ताकि रैली आगे जा सके। कार्यक्रम के आयोजकों ने युवकों से अनुरोध किया कि वे कुछ देर रूककर कार्यक्रम में भाग लें और उन्हें यह आश्वासन दिया कि उसके बाद कुर्सियां हटा ली जाएंगी और वे आगे जा सकेंगे। रैली में शामिल युवक उत्तेजक नारे लगा रहे थे जिनमें ‘‘हिन्दुस्तान में रहना होगा तो वंदे मातरम् कहना होगा‘‘ और ‘‘राधे-राधे‘‘ शामिल थे। युवकों ने मांग की कि वहां उपस्थित लोग भी ये नारे लगाएं। उन्होंने ये नारे लगाने से इंकार कर दिया और ‘‘गोड़से मुर्दाबाद‘‘ के नारे लगाए। रैली में शामिल एक युवक ने एक लाठी उठाकर एक स्थानीय रहवासी पर हमला कर दिया। इसके बाद स्थानीय लोगों ने युवकों पर कुर्सियां फेंकीं व वहां और भी लोग इकट्ठा हो गए। यह देखकर युवक डर गए और वहां से भाग निकले और तहसील रोड पर दुबारा एकत्रित हुए।

स्थानीय रहवासियों ने उन मोटरसाईकिलों, जिन्हें युवक वहीं छोड़कर भाग गए थे, के रजिस्ट्रेशन नंबर नोट किए और पुलिस को बुलाकर वह सूची उसे सौंप दी। पुलिस ने ये सभी मोटरसाईकिलें जब्त कर लीं। इसके बाद, तहसील रोड पर इकट्ठा युवकों ने सड़क से गुजर रहे मुसलमानों और उनकी दुकानों पर हमले शुरू कर दिए। अब उनके हाथों में लाठियां और कट्टे थे। इसी हिंसा में चंदन गुप्ता और नौशाद को गोली लगी।

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जब दल, वीर अब्दुल हमीद चौराहे पहुंचा तो उसने पाया कि वह बहुत संकरा है। चौराहे से जुड़ी गलियों में दो मोटरसाईकिलों का भी एकसाथ गुजरना संभव नहीं है। केवल एक मोटरसाईकिल एक दिशा में चल सकती है और उसे भी रास्ते में कई बार ब्रेकक लगाने पड़ेंगे। वहां से किसी भी मोटरसाईकिल का दस किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार से गुजरना मुश्किल है। चौराहे पर रखी कुर्सियों के कारण रास्ता अस्थायी रूप से बंद था। परंतु अगर वहां कुर्सियां न भी रखी होतीं तब भी कोई समझदार व्यक्ति उन पतली गलियों से मोटरसाईकिल रैली निकालने की सोचता तक नहीं। स्पष्टतः वहां से रैली निकालने का एकमात्र लक्ष्य मुसलमानों को डराना या उकसाना था।

पुलिस की भूमिका

इस घटना में पुलिस की भूमिका शर्मनाक थी। पुलिस ने घोर पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया, जो उत्तरप्रदेश सरकार के राजनैतिक एजेंडे के अनुरूप था। कासगंज के पुलिस अधीक्षक ने अत्यंत गैर-जिम्मेदाराना रूख अपनाते हुए कहा कि दंगों को रोकना संभव नहीं था क्योंकि दंगाईयों की संख्या, पुलिस से ज्यादा थी।

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पुलिस की लापरवाही और पक्षपातपूर्ण कार्यवाही के कई उदाहरण हैं। सबसे पहले, पुलिस ने रैली के बारे में पूर्व सूचना होते हुए भी उसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। पुलिस ने स्वीकार किया कि संकल्प फाउंडेशन को रैली निकालने की अनुमति नहीं दी गई थी। पुलिस, रैली में शामिल युवकों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही कर सकती थी क्योंकि उनकी मोटरसाइकिलें पुलिस के कब्जे में थीं। इन मोटरसाईकिलों के रजिस्ट्रेशन नंबर के आधार पर बहुत आसानी से रैली में भाग लेने वाले युवकों तक पहुंचा जा सकता था। परंतु पुलिस ने बिना कोई रिपोर्ट दर्ज किए मोटरसाईकिलें उनके मालिकों को सौंप दीं।

एफआईआर भी इस तरह से लिखी गईं जिससे दोषियों का बचाव किया जा सके। हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों के खिलाफ लिखाई गई एफआईआर में आरोपियों के नाम दर्ज हैं परंतु जिन एफआईआरों के फरियादी मुस्लिम हैं, उनमें कोई नाम नहीं दिया गया है। यहां तक कि जिन दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया, उनके और उनके मालिकों के नाम तक एफआईआर में दर्ज नहीं हैं। जाहिर है कि इससे जांच और अभियोजन की प्रक्रिया बहुत कठिन हो जाएगी।

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जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उनमें से अधिकांश निर्दोष मुसलमान हैं। ये वे लोग हैं जो उस समय सड़कों पर थे, जब पुलिस गिरफ्तारियां कर रही थी। कुछ हिंसा के बाद अपनी दुकानें बंद करने आए थे तो कुछ दूध जैसी ज़रूरी  चीजें खरीदने बाजार में निकले थे। एक मुस्लिम युवक, जिसे गिरफ्तार किया गया है, शारीरिक दृष्टि से 70 प्रतिशत विकलांग है। एक बुजुर्ग को भी गिरफ्तार कर लिया गया और जब वे जेल में थे, तब उनकी पत्नी गुजर गईं। उनके विरूद्ध गंभीर धाराओं जैसे हत्या, दंगा करने आदि के अंतर्गत मुकदमे दर्ज किए गए हैं। बहुत कम हिन्दुओं के नाम एफआईआर में हैं और अधिकांश आरोपियों को ‘अज्ञात‘ बताया गया है।

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सलीम, जिसे चंदन गुप्ता की मौत के मामले में प्रमुख आरोपी बनाया गया है, के पास इस बात का ठोस सुबूत है कि वह उस समय घटनास्थल पर नहीं था। उसके भाई शमीम ने तथ्यांवेषण दल को एक वीडियो दिखाया जिससे ऐसा लगता है कि सलीम, जो कासगंज का प्रतिष्ठित व्यापारी है, 26 जनवरी को 10 बजे एक स्कूल में झंडावदन कार्यक्रम में मौजूद था। अन्य दुकानदारों ने भी यह कहा कि सलीम एक शरीफ आदमी है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि सुशील गुप्ता ने अपने बेटे की मौत के 13 घंटे बाद एफआईआर दर्ज करवाई, जिसमें सलीम समेत 20 मुस्लिम रहवासियों को आरोपी बनाया गया, जबकि सलीम उस समय वहां था ही नहीं। इससे ऐसा लगता है कि गुप्ता को कुछ लोगों ने सिखाया-पढ़ाया होगा ताकि निर्दोष नागरिकों को फंसाया जा सके। यह आश्चर्यजनक है कि चंदन को गोली लगने के बाद उसे अस्पताल ले जाने की बजाए पुलिस थाने ले जाया गया। और मजे की बात यह है कि उस समय कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई।

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निष्कर्ष

इस घटना से कई सबक सीखे जा सकते हैं। मुस्लिम-बहुल इलाके से मोटरसाईकिल रैली निकालने का लक्ष्य यही था कि मुसलमानों को यह दिखाया जा सके कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद वे द्वितीय श्रेणी के नागरिक बन गए हैं और उन्हें असमानता और घृणा का सामना करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। राज्य, पीड़ितों को अपराधी बता रहा है और अपराधियों की रक्षा कर रहा है। ऐसा करने से हिंसा को और बढ़ावा मिलेगा। दल की यह सिफारिश है कि इस हिंसा में राजवीर सिंह के भाषण की भूमिका की जांच की जाए। यह भी जरूरी है कि नागरिक संगठन विभिन्न समुदायों के बीच बेहतर आपसी समझ विकसित करने के लिए आगे आएं और उनके बीच संवाद को प्रोत्साहन दें। दल को यह देखकर संतोष हुआ कि इस हिंसा ने क्षेत्र में साम्प्रदायिक विद्वेष और ध्रुवीकरण को गहरा नहीं किया है। अधिकांश हिन्दुओं की सहानुभूति उन मुसलमानों के साथ है, जिन्हें आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। कासगंज ने सब कुछ खोया नहीं है।(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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