370 के बाद का कश्मीर – झूठ और दुष्प्रचार की अति

Ram Puniyani राम पुनियानी, लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

370 के बाद का कश्मीर – झूठ और दुष्प्रचार की अति

कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद से तीन माह बीत चुके हैं (Three months have passed since the removal of Article 370 of the Constitution from Kashmir.)। इस प्रक्रिया में स्थापित विधि को दरकिनार कर, लोकसभा में अपने बहुमत का लाभ उठाते हुए भाजपा सरकार द्वारा यह कदम उठाया गया। इस संबंध में कश्मीर के लोगों की राय जानने का तनिक भी प्रयास नहीं किया गया। इस मुद्दे पर कई तरह के झूठ फैलाए जा रहे हैं। सरदार पटेल को याद करते हुए 31 अक्टूबर को इनमें से दो झूठों का जमकर प्रचार किया गया।

नरेन्द्र मोदी ने इस अनुच्छेद को हटाए जाने के निर्णय को सरदार पटेल को श्रद्धांजलि बताया।

यह दिलचस्प है कि सरदार पटेल, संविधान सभा की उस समिति के सदस्य थे जिसने इस अनुच्छेद को अंतिम रूप दिया था। सरदार पटेल ने ही संविधान सभा में इस अनुच्छेद को संविधान का भाग बनाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था क्योंकि उस समय विदेष मंत्री का कार्यभार संभाल रहे पंडित जवाहरलाल नेहरू अमरीका की यात्रा पर थे।

मोदी और उनके साथी, भारत के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास का विरूपण तो कर ही रहे हैं वे हालिया इतिहास को भी तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री और भारत सरकार के शीर्ष पदाधिकारी यह दावा भी कर रहे हैं कि इसी अनुच्छेद के कारण कश्मीर में आतंकवाद अपनी जड़ें जमा सका है। उनका तर्क यह है कि इस अनुच्छेद को समाप्त कर देने से कश्मीर में आतंकवाद पर नियंत्रण किया जा सकेगा।

आम जनता की याद्दाश्त बहुत लंबी नहीं होती, इसलिए यह याद दिलाना महत्वपूर्ण होगा कि नोटबंदी के समय भी यह दावा बड़े जोरशोर से किया गया था कि इस निर्णय से कश्मीर में अतिवाद का अंत हो जाएगा क्योंकि राज्य में आतंकवाद को नकली नोटों के सहारे प्रायोजित किया जा रहा है। अंततः नोटबंदी के संबंध में अन्य दावों की तरह, यह दावा भी पूरी तरह से झूठा और खोखला साबित हुआ।

कश्मीर में आज जो स्थितियां हैं, वे सबके सामने हैं।

कश्मीर में सामान्य जनजीवन थम गया है, स्थानीय नेताओं को नजरबंद कर दिया गया है और राष्ट्रीय नेताओं को कश्मीर में प्रवेष नहीं करने दिया जा रहा है। कुछ व्यवसायियों ने एनजीओ का बाना पहनकर, यूरोप के दक्षिणपंथी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल को कश्मीर की यात्रा करने के लिए भारत सरकार का निमंत्रण दिलवाया। उनमें से एक, क्रिस डेवीस, ने जब कहा कि वे स्थानीय रहवासियों से अकेले में मिलना चाहेंगे तब उनका निमंत्रण वापस ले लिया गया। जो सांसद भारत सरकार की मंशा के अनुरूप अपने निष्कर्ष देने के लिए तैयार थे केवल उन्हें कश्मीर जाने की इजाजत दी गई। इन सांसदों से अपेक्षा यह थी कि वे मुफ्त की इस यात्रा का आनंद उठाएं और मोदी सरकार को ‘आल इज वेल‘ का सार्टिफिकेट जारी कर दें।

इस बीच, कश्मीर में सुरक्षाबलों की भारी मौजूदगी और इस दावे के बावजूद कि अनुच्छेद 370 को हटाने से राज्य में आतंकवाद का सफाया हो जाएगा, घाटी में आतंकी गतिविधियां जारी रहीं। एक त्रासद घटना में पश्चिम बंगाल के पांच प्रवासी मजदूरों को मौत के घाट उतार दिया गया। इसके पहले, फलों के व्यवसाय से जुड़े कई व्यक्तियों पर हमले किए गए। श्रीनगर के सब्जी बाजार में हुए ग्रेनेड हमले में एक व्यक्ति मारा गया और पन्द्रह घायल हुए।

एक ओर जहां कश्मीर के लोग अपने राज्य का दर्जा घटाकर केन्द्र शासित प्रदेष कर देने से स्वयं को अपमानित महसूस कर रहे हैं वहीं ये दावे किए जा रहे हैं कि कश्मीर के मामले में जो कुछ किया गया है, उससे सरदार पटेल का स्वप्न साकार हुआ है।

इस दावे में कोई दम नहीं है कि भारत सरकार ने कश्मीर में आतंकवाद के एक बड़े कारण को समाप्त कर दिया है। यह दावा न केवल ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है वरन् उसका उद्देश्य केवल यह दर्साना है कि राज्य में भाजपा की नीतियां अत्यंत प्रभावी और सफल सिद्ध हुई हैं।

History of extremism in Kashmir

कश्मीर में अतिवाद का इतिहास, पाकिस्तान की सेना के समर्थन से सन् 1947 में वहां कबाईलियों के आक्रमण के साथ शुरू हुआ। कश्मीर के लोग साम्प्रदायिक तत्वों के द्विराष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वे धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक व्यवस्था के हामी थे और इसलिए उन्होंने भारत सरकार से अनुरोध किया कि वह पाकिस्तान के हमले का मुकाबला करने में कश्मीर की मदद करे। इसके बाद कश्मीर के साथ विलय की संधि पर हस्ताक्षर हुए और अनुच्छेद 370 को संविधान का हिस्सा बनाया गया। इन सभी मुद्दों पर विद्वान अध्येता विस्तार से प्रकाश डाल चुके हैं।

Sheikh Abdullah played an important role in Kashmir’s accession to India.

कश्मीर के भारत में विलय में शेख अब्दुल्ला ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। भारत में साम्प्रदायिक राजनीति के बढ़ते प्रभाव और श्यामाप्रसाद मुखर्जी और उनके जैसे अन्य नेताओं द्वारा कश्मीर को जबरन भारत का अंग बनाए जाने के मुद्दे पर जोर देने के कारण, शेख अब्दुल्ला का भारत से मोहभंग हो गया। अंततः शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया गया और यहीं से कश्मीर के लोगों में भारत के प्रति अलगाव का भाव जन्मा।

अलगाव के इस भाव  और पाकिस्तान के समर्थन और सहयोग से कश्मीर में आतंकवाद बढ़ने लगा। अनुच्छेद 370, कश्मीर को काफी हद तक स्वायत्तता (Autonomy) देता था और इसके चलते राज्य में आतंकवाद के पैर पसारने पर रोक लगी रही। अमरीका द्वारा रूसी सेना से लड़ने के लिए अलकायदा को बढ़ावा देने से भी यह समस्या और बढ़ी। अल्कायदा और उसके क्लोन, रूसी सेना को पराजित करने के बाद कश्मीर में घुसपैठ करने लगे और उन्होंने वहां के अतिवाद को साम्प्रदायिक रंग दे दिया। आज, तीस साल बाद, इस घटनाक्रम को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है।

Terrorism and Lack of development in Kashmir

आवश्यकता तो इस बात की थी कि राज्य में प्रजातंत्र को और मजबूत किया जाता और असंतुष्ट तत्वों के साथ संवाद की राहें खोजी जातीं। निःसंदेह इस संदर्भ में अमरीका के समर्थन से पाकिस्तान द्वारा राज्य में की जा रही कुत्सित हरकतों का भी ख्याल रखा जाना जरूरी होता।

किसी भी समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि हम उसकी जड़ को पहचानें। परंतु दुर्भाग्यवश साम्प्रदायिक तत्वों की हालिया इतिहास की गलत समझ, भारत सरकार की नीतियों की पथ प्रदर्शक बन गई है। कश्मीर में आतंकवाद और विकास के अभाव – दोनों के लिए अनुच्छेद 370 को दोषी बताया जा रहा है।

तथ्य यह है कि कश्मीर के मानव विकास सूचकांक, राष्ट्रीय औसत और कई राज्यों से बहुत बेहतर हैं।

यह तो समय ही बताएगा कि पाकिस्तान, कश्मीर के मामले में क्या रूख अपनाता है और राज्य में सक्रिय अल्कायदा जैसे तत्वों पर किस तरह नियंत्रण किया जाता है। परंतु यह स्पष्ट है कि कश्मीर के लोगों के साथ संवाद के बगैर यह समस्या हल नहीं हो सकती।

कश्मीर में शांति की पुनर्स्थापना और हिंसा का अंत करने का एक ही तरीका है – और वह है प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को और मजबूती देना।

डॉ. राम पुनियानी

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

Kashmir after 370 – Excess of lies and propaganda

About the Author

डॉ राम पुनियानी
Ram Puniyani-Former Professor at IIT Mumbai. प्रोफेसर राम पुनियानी (जन्म 25 अगस्त 1945) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ़ टैक्नोलॉजी, बंबई के साथ सम्बन्धित बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के एक पूर्व प्रोफ़ैसर और पूर्व सीनियर मेडिकल अफ़सर है। उन्होंने 1973 में अपना मेडिकल कैरियर शुरू किया और 1977 से शुरू करके 27 साल के लिए विभिन्न सामर्थ्य में आईआईटी की सेवा की। वह विभिन्न धर्मनिरपेक्ष पहलों से जुड़े हुए हैं और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों के उल्लंघन पर विभिन्न जांच रिपोर्टों का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने एक भारतीय पीपुल्स ट्रिब्यूनल के हिस्से के रूप में भी काम किया है जिसने उड़ीसा और मध्य प्रदेश राज्यों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के उल्लंघन की जांच की थी।