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Shahnawaz Alam
Shahnawaz Alam शाहनवाज़ आलम

कश्मीर : जिस पर हम सिर्फ झूठ बोलना और सुनना चाहते हैं, शायद हमसे बड़ा शातिर और सैडिस्ट समाज कोई नहीं

Kashmir: On which we just want to lie and listen, no one is more vicious and sedentary than us

कश्मीर अब भारत के लिए एक ऐसा सवाल बन चुका है जिसका सही-सही जवाब कोई नहीं देना चाहता। जब भी किसी सवाल के साथ ऐसा होता है तब उसे पूछने वालों का अपने सवाल के सही होने पर विश्वास और मजबूत होता जाता है। वहीं जवाब से भागने वाला पक्ष कभी सवालों को टालने, कभी उलझाने और यहां तक कि उसके औचित्य को ही खारिज करने की कोशिश करता है। यह प्रयास उसे हर रोज नए-नए झूठ गढ़ने और उसे अपनी जनता में बिकवाने के लिए मजबूर करती है। इस तरह हम कश्मीर का जवाब देने के बजाए एक राष्ट्र के बतौर लगातार सामूहिक रूप से झूठ बोलते हैं, ना सिर्फ कश्मीरियों से बल्कि उससे कहीं ज्यादा खुद से। सत्य मेव जयते को आदर्श बताने वाले हम भारतीयों के लिए कश्मीर के मुद्दे पर अब यही हमारी नियति है, उस पर कोई भी सच हम स्वीकार करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।

मसलन, आज भारतीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा शायद ही यह मानने को तैयार हो कि कानूनी तौर पर कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं है। ऐसा कहने वाला तुरंत शाब्दिक और शारीरिक हमलों का निशाना बन सकता है। यहां तक कि कोई अगर इसके खिलाफ पुलिस में मुकदमा दर्ज करवाना चाहे तो वह भी तुरंत हो जाएगा। कुछ निचली अदालतों के जज इस पर स्वतः संज्ञान भी ले सकते हैं। क्योंकि न तो हमला करने वालों को और ना ही भारतीय दंड विधान की सम्मत धाराओं के तहत मुकदमा लिखने वालों के लिए ही यह जानकारी स्वीकार्य होगी कि भारतीय दंड विधान भारत को परिभाषित करते हुए स्पष्ट तौर पर कहता है ‘‘भारत’’ से जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाए भारत का राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है। हम ऐसे लोगों की बड़ी तादाद में मौजूदगी को भी नहीं नकार सकते जो शायद उस आईपीसी की ही प्रतियां जला दे जिसमें ये ‘राष्ट्र विरोधी’ बात लिखी गई है।

आज जब कश्मीर उपचुनावों में जिसमें 8 लोगों की जान जाने के बाद भी सिर्फ 7 प्रतिशत वोट पड़े हैं और जब झूठ बोलने से इनकार करने वाला हर आदमी यह कह रहा है कि कश्मीर अब भारत से कोसों दूर जा चुका है, तब हमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे एमके नारायण की इस टिप्पणी को जरूर याद करना चाहिए कि ‘अब रोजमर्रा वाली दलीलें काम नहीं आएंगी, बल्कि उनका उलटा असर होगा’ (एड्रेसिंग द न्यू नॉर्मल, 10 अक्टूबर 2016, द हिंदू)।

लेकिन क्या हम अपनी इस राष्ट्रीय आदत से बाज आएंगे?

और क्या ऐसा करना उस झूठे बुनियाद को ही हिलाना नहीं होगा जिसपर हमारी ‘कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है’ या ‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत माता एक है’ जैसी ‘भावना’ टिकी है? मौजूदा भारत में शायद ही इसकी उम्मीद कोई करे।

इसीलिए हम पाते हैं कि जब भी हम पर कश्मीर में पत्थर की तरह सवाल मारे जाते हैं तो हमारी सरकार, मीडिया, सेना, राजनीतिक दल सभी लगातार झूठ बोलने लगते हैं कि यह सब पाकिस्तान करवा रहा है, पाकिस्तान इन्हें पत्थर मारने के एवज में रूपए दे रहा है। उनके पत्थरबाजी के बीच ऐसी खबरें हमें सुकून देती हैं। हम उनके पत्थरों का जवाब खुद से झूठ बोल कर देते हैं। इस तरह हर पत्थरबाजी के बाद हम कश्मीर पर पहले से ज्यादा झूठ बोलने और सुनने वाले झुंड में तब्दील होते जाते हैं। जबकि सच्चाई तो यह है कि अब ‘पाकिस्तान ही नहीं खुद अलगाववादी नेतृत्व भी कश्मीरियों के लिए अप्रासंगिक हो चुका है’, यह सवाल वो खुद अपने बूते पर अपनी जान दाव पर लगाकर पूछ रहे हैं। कश्मीर पर किसी भी सिवीलियन राय के बरखिलाफ कथित सुरक्षा सलाहकारों की ही बात मानने की लत के शिकार लोगों को एमके नारायण के इस निश्कर्ष पर जरूर गौर करना चाहिए। (उपरोक्त)

दरअसल, कश्मीर समस्या की जड़ (Root of Kashmir problem) में हमारी सच्चाई से कतराने की प्रवृत्ति सबसे ज्यादा निर्णायक रही है। इसीलिए दुनिया के सबसे खूबसूरत पहाड़ों, नदियों, झीलों और उनके बीच रहने वाले लोगों के इस जिवंत तस्वीर को हमारी नजरों ने एक बनावटी तस्वीर में तब्दील कर दिया है क्योंकि हम धरती के इस सबसे खूबसूरत टुकड़े के मालिकों से नजर नहीं मिला पाते। हम कश्मीर को एक निर्जिव तस्वीर की तरह देखने में ही सुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि बोलने वाली कोई भी शै हमसे सवाल पूछ सकती है, हमारी नैतिकता आंक सकती है। इसीलिए, जब तकरीबन 60 वर्षीय शिकारा वाले हमें डल झील के बीचो-बीच ले जाकर यह बताते हैं कि इसी जगह पर शशि कपूर के ‘परदेसियों से ना अंखियां मिलाना’ गाने की शूटिंग हुई थी, मेरे साथी लक्षमण प्रसाद के यह पूछने पर कि क्या वो वोट देते हैं, वह अचानक सकपका जाते हैं। उन्हें यह समझ में नहीं आता कि कोई भारतीय प्रर्यटक उनसे ऐसे सवाल क्यों पूछ रहा है? क्योंकि वहां लोग पहाड़ और डल झील तो देखने जाते हैं या उनसे ‘मिशन कश्मीर’ फिल्म के एक ऐकशन सीन की शूटिंग स्थल तक तो ले जाने की बात करते हैं, उनसे कोई उनकी दुनिया की राजनीति पर उनकी राय नहीं पूछता। जबकि वहां पर्यटक के बतौर वाले वर्ग के लोग अपने यहां कश्मीर जैसे ‘राष्ट्रीय मुद्दे’ पर सबसे ज्यादा मुखर राय रखने वालों में होते हैं।

ऐसा क्यों होता है, आपके मुताबिक? उनका जवाब था कि वो शायद जानते हैं कि हम वोट नहीं देते, हम आजादी चाहते हैं इसीलिए वो हमसे ऐसे मुद्दों पर बात करने से बचते हैं। वो बस घूम फिर कर चले जाना चाहते हैं। क्या ये सवाल हमें खुद से नहीं पूछना चाहिए कि हम ऐसे क्यों हैं कि ‘आजादी’ की बात करने वालों से हम बात नहीं करना चाहते? क्या सामने वाले के सुख-दुख पर बात किए बगैर, उससे उसकी राय जाने बगैर उसके सामने बैठकर उसके आंखों में तैरते सवालों को, जो हमीं से मुखातिब होती हैं, नजरअंदाज करते हुए हम किसी रोमांटिक गाने की शूटिंग का तस्सवुर भी कर सकते हैं? क्या सवालों से भरी आंखों से चोर की तरह आंख चुराकर पहाड़ों पर जमी बर्फ देखने में मजा है? अगर हम सचमुच ऐसा कर पा रहे हैं तो शायद हमसे बड़ा शातिर और सैडिस्ट समाज कोई नहीं होगा।

लेकिन मुझे लगता है कि कश्मीर के मुद्दे पर वहां के लोगों से बात करने से बचना इस झूठ को टिकाए रखने की ही रणनीति का हिस्सा है। क्योंकि जैसे ही आप बात करेंगे आपकी धारणाओं पर आपको धोखा दे देने का दबाव पड़ सकता है। मसलन, बानिहाल से श्रीनगर की दो घंटे की रेल यात्रा में सुबह-सुबह कॉलेज जा रहे छात्रों से बात करके आपकी यह धारणा थोड़ी देर में ही चारों खाने चित्त हो जाने को अभिशप्त है कि कश्मीर के युवाओं को रोजगार चाहिए, आजादी नहीं। उन्हें सिर्फ और सिर्फ आजादी चाहिए। मुझे एक लड़के का फिल्मी अंदाज में दिया गया यह जवाब शायद ही कभी भूले कि वो गुलाम देश में रोजगार पाने से ज्यादा आजाद कश्मीर में बेरोजगार (Unemployed in Azad Kashmir) होना पसंद करेगा। ऐसा कोई भी जवाब सुनकर आप अपनी आजादी की समझ की बुनियाद पर उस खूबसूरत रेल मार्ग के दोनों तरफ पड़ने वाले चिनार के लम्बे-लम्बे दरख्तों और उनके पीछे बर्फ से अपना मुंह ढंक कर खड़े दिलफरेब फलकबोस चोटियों को देख कर खुश या दुखी हो सकते हैं।

लेकिन आजादी किससे? भारत से? पाकिस्तान जैसे फेल्ड, आंतरिक संघर्षों में जूझते देश का हिस्सा बनकर आप क्या पाएंगे?

भारत जैसा भी है एक उभरती हुई महाशक्ति है पाकिस्तान के पास तो न इकॉनॉमी है न रूतबा, आप पाकिस्तान के साथ क्यों जाना चाहते हैं? जब भी कोई भारतीय पत्रकार या मामले में दिलचस्पी रखने वाला यह सवाल किसी कश्मीरी के सामने रखता है तो इसमें पाकिस्तान की नाकाम मुल्क की इमेज भारत का विकल्प मजबूत बनाने की नीयत से इस्तेमाल किए जाने की कोशिश ज्यादा दिखती है। लेकिन आम तौर पर भारतीय मीडिया में दिन भर बजने वाले इन जुमलों पर किसी भी कश्मीरी से थोड़ी खुलकर बात करने के बाद हमारा यह दावं हमें ही मुह चिढ़ा सकता है। मसलन, पाकिस्तान के साथ जाने के पीछे वो आपको कई अकाट्य तर्क दे सकता है। वह कह सकता है कि वह पाकिस्तान के साथ इसलिए खड़ा है कि पाकिस्तान भारत का दुश्मन है। चूंकि, दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है इसलिए हम उसके साथ हैं। दूसरा, भारत से आजादी लेने के बाद हम पाकिस्तान से भी आजादी छीन लेंगे। जब हम भारत जैसे बड़े देश से अपनी आजादी हासिल कर सकते हैं तो पाकिस्तान की क्या हैसियत है कि वो हमें कंट्रोल कर ले।

इन दो ओजपूर्ण और काल्पनिक बुनियादों पर आधारित तर्कों पर अगर आप सवाल उठाएंगे तो वो आपके सामने डिप्लोमेटिक बुनियाद पर भी तर्क रखेगा। और वो ऐसा किसी विश्वद्यिालय की कैंटीन में नहीं बल्कि अनंतनाग के बटपुरा जैसे छोटे से कस्बे की चाय की दुकान पर आपको बताएगा कि पाकिस्तान उसे इसलिए पसंद है कि भारत के मुकाबले उसने ‘आजाद कश्मीर’ के लोगों के साथ किए गए तीनों मुहायदों का सम्मान करना जारी रखा है। वह आपको बताएगा कि वहां आज भी उसके चुने हुए संसद के मुखिया को प्रधानमंत्री माना जाता है, वहां आज भी उसका अपना झंडा है और आज भी वहां के हाईकोर्ट के फैसलों में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट का दखल नहीं है। क्या हमें याद है कि कश्मीर से 370 के तहत हुए हमारे मुहायदे में भी हमने उनसे यही वादे किए थे?

आप कह सकते हैं कि कश्मीरियों के पाकिस्तान के प्रति आकर्षण की एक बड़ी वजह हमारी वादा फरामोशी है।

इसी तरह हम इस अर्धसत्य में भी अब जीने के आदि हो गए हैं कि कश्मीर से हिंदुओं को, जिन्हें मैं नहीं समझ पाता हूं कि क्यों ‘पंडित’ कहा जाता है, जबकि वहां अन्य हिंदू जातियां भी हैं, पूरी तरह से भगा दिया गया। ये एक सच्चाई है लेकिन पूरी तरह आधी अधूरी सच्चाईयों को प्रचारित कर हम क्या हासिल करना चाहते हैं?

हमने ये क्यों नहीं स्वीकार किया और अपनी अवाम को बताया कि जब कश्मीरी हिंदुओं को वहां से पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी आंदोलन ने उन्हें उनके घरों से भागने के अल्टिमेटम दिए और राज्यपाल जगमोहन ने बिना स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व को विश्वास में लिए उन्हें वहां से भागने की रातों-रात विशेष व्यवस्थाएं कीं तब भी बहुत से मुसलमानों ने इसका विरोध किया था, लेकिन जगमोहन नहीं माने थे।

क्या ये सवाल नहीं बनता कि अगर कश्मीर भारत का हिस्सा है और उसके मुताबिक उसकी सम्प्रभुता पर हमला हो रहा था, तब आबादी के एक हिस्से को वहां से हटा कर आपने दूसरे हिस्से को क्या पाकिस्तान के समर्थक के बतौर प्रचारित करने के लिए छोड़ दिया था? क्या ये एक दूरअंदेशी भरे राजनीतिक अपराध की साजिश का हिस्सा था जिससे इस सवाल को पूरे देश में एक हिंदू-मुस्लिम साम्प्रदायिक समस्या के बतौर पेश किया जाना था? जिससे हिंदू वर्णव्यवस्था के सबसे शीर्ष पायदान पर माने जाने वाले ब्राह्मणों के मुसलमानों द्वारा उत्पीड़न के प्रचार की आड़ में ब्राह्मणवाद के अधीन वर्णागत हिंदू राजनीतिक एकता को मजबूत करना था?

क्या कमंडल और मंडल के उस दौर में ऐसा कमंडलवाद ने इसे मंडलवाद के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करने के लिए किया? और क्या ऐसा करके कमंडलवाद ने ब्राह्मणवाद के उत्तर भारतीय संकिर्णता में उदार कश्मीरी पंडितों को नहीं ढालने की कोशिश की जबकि इनके विपरीत वे अपने नॉनवेज खान-पान से लेकर बोली और भाषा में भी उत्तर भारतीय हिंदुओं से बहुत दूर और कश्मीरी मुसलमानों से बहुत करीब थे?

इसीलिए जब कोई 20 वर्षीय ‘पत्थरबाज’ आपसे यह पूछता है कि वे क्यों चले गए, उन्हें अपने घर में रहना चाहिए था, उनके सारे पवित्र स्थल यहां हैं, हमारी तरह जूझना चाहिए था, तब आपके पास कोई तार्किक जवाब इसके अलावा नहीं रह जाता कि ‘वो स्थिति उनके रहने लायक नहीं रह गई थी।’

लेकिन ये तर्क भी उसके यह पूछ देने पर असहाय हो जाता है कि क्या हमारे रहने लायक वो वक्त था?’

लेकिन आज जब यह आधा झूठ एक पूरे सच में तब्दील कर दिया गया है तब झेलम नदी के स्रोत माने जाने वाले वेरीनाग झील जिसे मुगल बादशाह जहांगीर ने 1620 में संवारा था, पर खड़े होकर यह जानना किसी के लिए भी आश्चर्यजनक हो सकता है कि वहां बीचो-बीच स्थित प्राचीन मंदिर न सिर्फ साबूत खड़ा है बल्कि ताला लगे गेट के अंदर रखी मूर्ति भी पिछले 27-28 सालों से उसी तरह अपने पूजने वालों के लिए मुंतजिर है जिस तरह आखिरी बार उसके उपासकों ने उसे वहां से भागने से ऐन पहले देखा होगा।

कश्मीरी मुसलमानों की हिंदू विरोधी लोकप्रिय छवि को चुनौती देते इस मंजर को स्वीकार करके आप अपनी पसंदीदा धारणाओं को बदलने की कितनी छूट दे सकते हैं और कितनी नहीं, यह सोचते हुए जब आप वहां से डुरू की ओर जाते हैं तब रास्ते में उजाड़ पड़े अधजले मकान आपको अपनी तरफ सिर्फ इस वजह से ज्यादा आकर्षित नहीं करते कि ये पलायित कर चुके हिंदुओं के घर हैं। बल्कि इसलिए ज्यादा आकर्षिेत करते हैं कि मुसलमान पड़ोसियों ने अपने घरों से लगे हिंदुओं के इन घरों को इसलिए जला दिया कि इन खाली घरों को आतंकी छुपने और मोर्चा लेने के लिए जब इस्तेमाल करते थे, तब सेना की क्रॉस फायरिंग की जद में उनके रिहाइशी घर भी आ जाते थे। हो सकता हो कश्मीर के दूसरे इलाकों में ऐसा नहीं हुआ हो, लेकिन अगर इन अपवादों को जानबूझकर छुपाने के बजाए हकीकत को बयान किया गया होता तो हम शायद आज कश्मीर पर ज्यादा बेहतर स्थिति में होते।

लेकिन शायद भारत को, जिसके बारे में मेरे कश्मीरी मेजबान की राय थी कि वह कश्मीर के बंटवारे के बाद 1947 में ही मर गया है और अब जो बचा है वह इंडिया है, ऐसा नहीं करना था और आगे भी नहीं करना है। इसीलिए उसकी कोशिश कश्मीरी हिंदुओं को वापस कश्मीर बुलाकर स्थानीय मुस्लिम आबादी से दूर अलग कॉलोनियों में बसाने की है। जिसका विरोध कश्मीर के चुनावी और अलगाववादी दोनों ही तरह के नेतृत्व कर रहे हैं।

संघ परिवार के घोषित समर्थक जगमोहन द्वारा राज्यपाल के बतौर मिश्रित आबादी में रहने वाले हिंदुओं को पहले मुसलमानों के बीच से निकलने के लिए प्रेरित करने के ढ़ाई दशक बाद फिर से बसाते हुए भी उन्हें मुसलमानों से अलग-थलग रखने की कोशिश को हिंदुत्ववादी राजनीति के एक चक्र के मुकम्मल हो जाने की घोषणा के अलावा और क्या समझा जा सकता है? उनको निकाले जाने से उन्हें दुबारा बसाए जाने की योजना तक 2 सांसदों से 282 तक पहुंच जाने के बावजूद कश्मीरी हिंदुओं के लिए भाजपा के पास उन्हें कश्मीरी मुसलमानों से अलग-थलग रखने के सिद्धांत में कोई बदलाव न आना यह समझने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वो विस्थापन स्वाभाविक से ज्यादा राजनीतिक था?

दरअसल, कश्मीर के नाम पर खुद अपनी आवाम से लगातार बोले जाने वाले झूठ ने पिछले 6 दशकों में एक ढांचागत रूप अख्तियार कर लिया है, जिसे व्यवस्थागत वैधता भी हासिल है। इसीलिए इस झूठ का इस्तेमाल बहुत सारे बड़े झूठों को छुपाने और बहुत सारी झूठों को सच बनाने के लिए ढ़ाल की तरह किया जाता है।

शाहनवाज आलम

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