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पटेल नेहरू छोड़ो मोदीजी, आपके राज में आपके लौह पुरुष अडवाणी कहाँ हैं

ललित सुरजन

जैसा कि हमने पिछले तीन वर्षों में देखा है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चौबीस घंटे सातों दिन चुनाव की मुद्रा में रहते हैं। उनका हर बयान, हर भाषण, देश में हो या विदेश में, मतदाताओं को ध्यान में रखकर ही दिया जाता है। उनके भाषणों में संचारी भाव तो अनेक हैं, लेकिन स्थायी भाव एक ही है और वह है नेहरू विरोध। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उनके वंशजों को दिन में कम से कम एक बार कोसे बिना उन्हें चैन नहीं मिलती। वे नेहरू पर वार करने के लिए नए-नए मुद्दों की तलाश में रहते हैं, फिर बात चाहे सच हो या झूठ, इससे उन्हें फर्क नहीं पड़ता। वे बार-बार सरदार पटेल का कद पंडित नेहरू से ऊंचा करने की कोशिश करते हैं। इस काम को पिछले तीन साल से वे बिना थके करते आ रहे हैं। चाहे वह सरदार सरोवर में सरदार पटेल की विश्व में सबसे ऊंची प्रतिमा लगाने की बात हो या फिर आसन्न चुनाव। उनकी यह टेर बनी रहती है।

हम इस विषय का वस्तुगत विश्लेषण करने का प्रयत्न करेंगे, लेकिन उससे पहले मोदीजी और उनकी पूरी फौज से दो-तीन प्रश्नों के जवाब मांगना चाहेंगे।

अडवानी जी कहां हैं मोदीराज में?

हमारा पहला प्रश्न है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में गृहमंत्री रहे लालकृष्ण अडवानी को उनके दौर में दूसरे लौहपुरुष की संज्ञा दी गई थी। दूसरे शब्दों में उन्हें सरदार पटेल के समकक्ष खड़ा किया गया था। श्री मोदी के राज में अडवानी जी कहां हैं?

यह प्रश्न इसलिए भी उठता है कि गुजरात नरसंहार के बाद जब वाजपेयीजी ने मोदीजी को राजधर्म का पालन करने का निर्देश दिया था तब श्री अडवानी ही थे जिन्होंने मोदी जी की वकालत की थी और उनका मुख्यमंत्री पद बचाने में मदद की थी। हम यह भी देख रहे हैं कि देश में वाजपेयी जी के नाम पर अनेक राष्ट्रीय संस्थान स्थापित हो गए हैं। उनके नाम पर योजनाएं भी चल रही हैं, लेकिन अडवानी जी के नाम को चिरस्थायी बनाने के लिए कहीं कोई प्रयत्न नहीं दिखाई दिए।

नानाजी देशमुख को याद क्यों नहीं किया जाता

यह स्पष्ट है कि नरेन्द्र मोदी की जो राजनैतिक महत्वाकांक्षा है उसमें लालकृष्ण अडवानी के लिए कोई जगह नहीं है। वे कभी वाजपेयी जी के अनन्य सहयोगी रहे होंगे, आज उनकी उपयोगिता शून्य है। मुरली मनोहर जोशी और शांताकुमार जैसे वरिष्ठ नेता भी हाशिए पर हैं।

इसी तरह एक ओर दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर तमाम योजनाएं चल रही हैं, लेकिन नानाजी देशमुख को शायद ही याद किया जाता हो, जबकि जनसंघ और भाजपा को खड़ा करने में उनका सैद्धांतिक, राजनैतिक और रचनात्मक योगदान महत्वपूर्ण रहा है।

हम समझते हैं कि पंडित नेहरू और सरदार पटेल के संबंधों की बात करने से पहले भारतीय जनता पार्टी के लोगों को कुछ आत्मावलोकन भी कर लेना चाहिए। वे जो बार-बार सरदार पटेल की दुहाई देकर पंडित नेहरू को कोसते हैं बहुत से तथ्यों की जानबूझ कर अनदेखी कर देते हैं। नहीं करेंगे तो उनका केस खारिज हो जाएगा।

सबसे पहले इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि सरदार पटेल महात्मा गांधी से मात्र छह वर्ष छोटे थे और पंडित नेहरू से चौदह वर्ष बड़े थे। देश को आजादी मिलने के समय उनकी आयु बहत्तर वर्ष हो चुकी थी, जो कि उस वक्त के पैमानों पर परिपक्व आयु थी। याद रखें कि 1947 में भारत में व्यक्ति की औसत आयु मात्र सत्ताइस वर्ष थी और पचास वर्ष का व्यक्ति वृद्ध कहलाने लगता था। यही नहीं, सरदार पटेल का स्वास्थ्य भी उम्र के चलते इनका साथ नहीं दे रहा था। आज जिस पार्टी में पचहत्तर वर्ष की आयु के स्वस्थ व्यक्ति को पद न देने का सिद्धांत लागू कर दिया हो, वह पार्टी 1947 में एक विरोधी पार्टी के बहत्तर वर्षीय वृद्ध को प्रधानमंत्री न बनाने पर आपत्तियां करें तो यह तर्क विचित्र लगता है और स्वीकार नहीं किया जा सकता।

भाजपा बताए अडवानी जी के बदले मोदीजी को प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार क्यों घोषित किया

भाजपा के लोग ही बताएं कि उन्होंने अडवानी जी के बदले मोदीजी को प्रधानमंत्री पद के लिए 2013 में उम्मीदवार क्यों घोषित किया था।

यह स्मरणीय है कि पंडित नेहरू महात्मा गांधी के संपर्क में सन् 1915 में ही आकर स्वतंत्रता संग्राम में जुड़ गए थे। जब 1917 में गांधीजी चंपारण गए तब नेहरू जी ने बिहार के अपने मित्रों को गांधी जी की मदद के लिए प्रेरित किया था, जबकि सरदार पटेल दो वर्ष बाद 1917-18 में ही गांधीजी के संपर्क में आए थे।

खैर! यह कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं था, लेकिन हम पाते हैं कि बाद के वर्षों में नेहरू और पटेल दोनों गांधीजी के प्रिय शिष्य बनकर किसानों और आम जनता के बीच में लगातार काम करते रहे। पंडित नेहरू 1929 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए तो अगले वर्ष सरदार पटेल को इस पद से देशसेवा का अवसर मिला। किन्तु यह तथ्य गौरतलब है कि नेहरू 1929 तक देश में युवा हृदय सम्राट के रूप में स्थापित हो चुके थे और उनकी अपील देशव्यापी थी।

हम यह भी देखते हैं कि नेहरू जहां आम जनता के बीच में लोकप्रिय थे वहीं पटेल की छवि संगठनकर्ता के रूप में बन रही थी। नेहरू में एक तरह का उतावलापन था और वे कई बार बारीकियों में नहीं जाते थे, खासकर संगठन के स्तर पर होने वाली उठापटक में उनकी दिलचस्पी बिल्कुल भी नहीं थी। दूसरी ओर पटेल संगठन के कामों में गहरी दिलचस्पी लेते थे। कांग्रेस पार्टी के भीतर उनकी गहरी पकड़ थी। यह एक बिन्दु था जिसको लेकर नेहरू और पटेल के बीच था जिसको लेकर नेहरू और पटेल के बीच टकराव होने का अंदेशा उन्हें जानने वालों के मन में बना रहता था। लेकिन कहना होगा कि सरदार पटेल अपने स्वभाव की गंभीरता के अनुरूप टकराव को टालने का रास्ता निकाल लेते थे और विघ्न संतोषियों के मंसूबे पूरे नहीं होने देते थे।

यह ध्यान रखना भी उचित होगा कि नेहरू एक विराट वैश्विक दृष्टि के धनी थे, जबकि सरदार इस दिशा में बहुत रुचि नहीं लेते थे।

यह श्रेय सरदार पटेल को उचित ही दिया जाता है कि देशी राज्यों के निजीकरण और भारत के संघीय ढांचे को पुष्ट करने में उन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। यह उनकी दृढ़ता थी कि बड़े-बड़े राजे-महाराजे उनके सामने नतमस्तक हो गए। यहां फिर हमें पंडित नेहरू की भूमिका को भी साथ-साथ देखने की आवश्यकता है।

ध्यातव्य है कि देशी रियासतों में राजाओं के खिलाफ वातावरण बन रहा था। जैसे ब्रिटिश इंडिया में जनता स्वतंत्रता की आकांक्षी थी, वैसे ही इन रियासतों के प्रजाजन भी राजशाही से मुक्ति चाहते थे। इस उद्देश्य से कांग्रेस के ही मार्गदर्शन में अखिल भारतीय प्रजामंडल या कि ऑल इंडिया स्टेट पीपुल्स कांफ्रेस का गठन हुआ। पंडित नेहरू 1939 में इसके अध्यक्ष बने और देशी रियासतों में जनता को प्रेरित करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक तरह से पंडित नेहरू और सरदार पटेल इस कार्य में एक-दूसरे के पूरक बने।



यह आरोप द्वेषवश लगाया जाता है कि पंडित नेहरू अथवा उनके वंशजों ने सरदार पटेल की उपेक्षा की। सबसे पहले तो यह समझ लें कि नेहरू प्रधानमंत्री थे और सत्रह साल इस पद पर रहे, जबकि सरदार उपप्रधानमंत्री थे और उन्हें मात्र तीन वर्ष का समय मिला इसलिए दोनों के बीच कोई भी तुलना करना असंगत है।

यह कहना भी गलत है कि कांग्रेस ने सरदार पटेल का नाम भुला दिया। पूरे देश में कांग्रेस द्वारा सरदार के नाम पर स्थापित संस्थान एवं भवन इसके ज्वलंत प्रमाण हैं।

सच्चाई यह है कि दक्षिणपंथी ताकतें 1945-46 से पंडित नेहरू के विरुद्ध वातावरण बनाते आ रही हैं। जो लोग भारत को एकचालकानुवर्ती हिन्दू राष्ट्र और पेशवाई शासन में देखना चाहते हैं वे भला कैसे नेहरू को स्वीकार करें। इसीलिए कभी नेताजी, कभी सरदार, कभी लोहिया को पंडित नेहरू के बरक्स खड़ा करने की कोशिश करते हैं। ऐसा करके वे स्वयं को छल रहे हैं।

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