Home » हस्तक्षेप » आपकी नज़र » लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल : भाजपा की उल्टी गिनती शुरू
BJP Logo

लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल : भाजपा की उल्टी गिनती शुरू

लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल : भाजपा की उल्टी गिनती शुरू

Lok Sabha elections semi-final: BJP countdown begins

राजेंद्र शर्मा

The public turned down the BJP

अगर 2019 के आम चुनाव की पूर्व-संध्या में मोदी-शाह की भाजपा का जनसमर्थन तेजी से उतार पर होने की साफ दीखती हुई सचाई के लिए भी किसी प्रमाण की जरूरत थी, तो पांच राज्यों के विधानसभाई चुनावों में भाजपा को निर्णायक तरीके से ठुकरा कर जनता ने यह सबूत भी पेश कर दिया है। आम चुनाव से पहले हुए इन आखिरी विधानसभाई चुनावों में पांच के पांच राज्यों में जनता ने भाजपा को ठुकराया है। हां! अगर वह मिजोरम में 39 सीटों पर लडक़र, एक सीट हासिल कर किसी तरह से विधानसभा में प्रवेश पाने को इस आधार पर अपने लिए जनता का अनुमोदन मानना चाहे तो बात दूसरी है कि पांच साल पहले के चुनाव में तो इस राज्य में उसको एक भी सीट नहीं मिली थी। इसी प्रकार तेलंगाना में, जहां भाजपा चुनाव में कुल मिलाकर हाशिए पर ही थी, पांच साल पहले के लोकसभा चुनाव के साथ हुए विधानसभाई चुनाव के मुकाबले, उसने चार सीटें गंवा दी हैं और सिर्फ एक सीट के साथ, और भी हाशिए पर सिकुड़ गयी है। हां, संभवत: भाजपा अध्यक्ष तथा योगी आदित्यनाथ के खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक ध्रुवीकरणकारी प्रचार के चलते, वह अपने मत फीसद में गिरावट को लगभग टालने में ही कामयाब रही है।

BJP’s vote in Madhya Pradesh is above 40 percent

बहरहाल, इस चक्र में तीन राज्यों–राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़–में भाजपा के खिलाफ जनता का फैसला, आने वाले चुनाव के लिए अपने संकेतों के लिहाज से खास महत्व रखता है। इन तीनों ही राज्यों में 2013 के विधानसभाई चुनाव की तुलना में भाजपा की सीटों तथा मत फीसद, दोनों में ही उल्लेखनीय गिरावट दर्ज हुई है। मध्य प्रदेश में, उसने 56 सीटें गंवायी हैं और उसके वोट में 2.46 फीसद की गिरावट हुई है। राजस्थान में उसने 89 सीटें खोयी हैं और उसके मत फीसद में 6.13 फीसद की गिरावट हुई है। और छत्तीसगढ़ में भाजपा ने 39 सीटें गंवायी हैं और पूरे 9.04 फीसद वोट गंवाया है। इस तरह इन चार राज्यों में भाजपा ने कुल मिलाकर, 188 विधानसभाई सीटें गंवायी हैं। आम चुनाव के लिए यह भी एक महत्वपूर्ण संकेत है कि इन तीन राज्यों में, एक मध्य प्रदेश में ही भाजपा का वोट 40 फीसद से ऊपर है, जबकि छत्तीसगढ़ में तो उसका वोट 32 फीसद से भी नीचे चला गया है।

2019 के आम चुनाव के आसार के लिहाज से, इन तीनों राज्यों में भाजपा की हार, मोदी-भागवत जोड़ी की अजेयता के मिथक को चूर-चूर करने और इस तरह इस जोड़ी के राज से त्रस्त तबकों में इस जनविरोधी निजाम से निजात मिल सकने का भरोसा पैदा करने के अलावा, दो कारणों से और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पहला तो यही कि इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें थीं, जो इसका इशारा करता है कि देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा का सरकारों में होना, जनता के असंतोष से नरेंद्र मोदी की सरकार को बचाने में बहुत मददगार नहीं होने जा रहा है। दूसरे, हिंदी भाषी क्षेत्र के इन तीनों राज्यों में जनता का भाजपा के खिलाफ हो जाना, इसका इशारा करता है कि पूरे हिंदीभाषी क्षेत्र में, जहां से लोकसभा के आधे से ज्यादा सदस्य चुनकर आते हैं, भाजपा का जनसमर्थन तेजी से घट रहा है। सभी जानते हैं कि यह क्षेत्र संघ-भाजपा की राजनीतिक/चुनावी ताकत का सबसे बड़ा आधार है।

यह भी गौरतलब है कि बिहार में राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन से नीतीश कुमार से साथ भाजपा के गठजोड़ को मिल रही चुनौती को, इसी बीच उपेंद्र कुशवाहा के सत्ताधारी एनडीए तथा मोदी सरकार से नाता तोडऩे ने और बढ़ा दिया है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा पर केंद्रित विपक्षी गठबंधन की चुनौती की संघ-भाजपा कोई वास्तविक काट नहीं निकाल पाए हैं। उल्टे, योगी सरकार में मंत्री राजभर ने ही खुली बगावत का झंडा उठा रखा है। उधर, बहराइच से भाजपा की लोकसभा सदस्य, सावित्री बाई फुले भाजपा तथा उसके राज को दलितविरोधी बताते हुए, बाकायदा भाजपा से नाता तोडऩे का एलान कर चुकी हैं। जाहिर है कि इस पृष्ठïभूमि में अब पांच राज्यों में जनता का भाजपा को ठुकराना, भाजपाविरोधी ताकतों की बढ़ती गोलबंदी को और गति और मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के हमलों को और धार देगा।

अचरज नहीं कि विधानसभाई चुनाव के इस चक्र के बाद भाजपा कम से कम औपचारिक रूप से तो यही दिखाने की कोशिश कर रही है कि इन विधानसभाई चुनाव के नतीजों में, आने वाले आम चुनाव के लिए रुझानों को नहीं पढ़ा जा सकता है, नहीं पढ़ा जाना चाहिए। वास्तव में यह कहना निराधार नहीं होगा कि खुद भाजपा ने पहले ही यह भांप लिया था कि इन पांच राज्यों के चुनाव के नतीजे, उसे अपनी जीत का दावा करने का मौका शायद ही देंगे। इसीलिए, विधानसभाई चुनावों के इस चक्र में, जो आने वाले लोकसभा चुनावों से पहले के चुनावों का आखिरी चक्र था, अपनी तथा आरएसएस की सारी ताकत व संसाधन झौंकने और राम मंदिर समेत अपने सारे हथियार आजमाने के बावजूद, भाजपा के महत्वपूर्ण नेताओं में से शायद ही किसी ने भी चुनावों के इस चक्र को, 2019 के आम चुनाव का ‘सेमी फाइनल’ कहना मंजूर किया होगा। उल्टे न सिर्फ भाजपा के नेता तथा प्रवक्ता आम चुनाव तथा विधानसभाई चुनावों की भिन्नता पर और नरेंद्र मोदी के लिए जनता का अनुमोदन, उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्रियों से काफी ज्यादा होने पर जोर देते रहे थे, बल्कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह जैसे वरिष्ठï भाजपा नेताओं ने एक से ज्यादा मौकों पर यह कहना जरूरी समझा था कि इन विधानसभाई चुनावों को किसी भी तरह से नरेंद्र मोदी की सरकार पर जनमतसंग्रह नहीं माना जा सकता है। इस तरह भाजपा नेताओं ने, इन चुनावों के नतीजों की आंच से मोदी राज को बचाने के उपाय पहले ही करना शुरू कर दिया था।

लेकिन, इसका मतलब यह हर्गिज नहीं है कि इन चुनाव नतीजों में स्पष्ट दिखाई दे रहे अपने खिलाफ बढ़ते जन-असंतोष की काट करने के लिए, संघ-भाजपा अपनी कार्यनीति निकालने में कोई कोताही होने देंगे। उल्टे सारे संकेत तो इसी के हैं, आसार देखकर संघ-भाजपा ने पहले ही न सिर्फ यह कार्यनीति तय कर ली है बल्कि उस पर अमल करना भी शुरू कर दिया है। संक्षेप में यह कार्यनीति है, सांप्रदायिक धु्रवीकरण की। इसकी एक झलक, विधानसभाई चुनाव के इस चक्र में खुद प्रधानमंत्री के स्तर तक से, चुनाव को राम मंदिर समर्थकों और मंदिर विरोधियों के बीच चुनाव में तब्दील करने की कोशिश किए जाने में देखने में मिल चुकी है। योगी आदित्यनाथ को, नरेंद्र मोदी के बाद भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक के रूप में पेश किए जाने और भाजपाशासित तीनों राज्यों में विकास के दावों को भूलकर, चुनाव प्रचार को मुख्यत: हिंदुत्ववादी लामबंदी में तब्दील किए जाने तक, इस चुनावी कार्यनीति की दूसरी अनेक अभिव्यक्तियों को करीब सभी प्रेक्षकों ने दर्ज किया है।

तमाम आसार इसी के हैं कि यहां से आगे, 2019 के आम चुनाव तक बढ़़ते पैमाने पर तथा ज्यादा से ज्यादा खुल्लमखुल्ला तथा उग्र तरीके से, बहुसंख्यकवादी लामबंदी की इसी कार्यनीति का सहारा लिया जा रहा होगा। यह इसके बावजूद है कि उर्जित पटेल को रिजर्व बैंक के गवर्नर के पद से हटने के लिए मजबूर करने के बाद, मोदी सरकार के लिए रिजर्व बैंक के संचित कोष के अच्छे-खासे हिस्से पर कब्जा करने का रास्ता खुल गया है और इन तीन लाख करोड़ रु0 के करीब के संसाधनों के बल पर यह सरकार अपने अंतिम चार-पांच महीनों में किसानों तथा अन्य मेहनतकश तबकों की नाराजगी को कम करने के लिए, सिर्फ बड़े-बड़े वादों तथा घोषणाओं से आगे, खुले हाथ से कुछ खर्चे भी जरूर करेगी।

फिर भी, वह इन उपायों से अपने चार साल के राज से मेहनतकश जनता की नाराजगी को दूर करने की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकती है और इसलिए वह हिंदुत्व की दुहाई को और खासतौर पर राम मंदिर की दुहाई को ही, अपनी चुनावी कार्यनीति के केंद्र में जगह देने जा रही है।

मतगणना से सिर्फ दो दिन पहले, राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में राम मंदिर के निर्माण की ही मांग को लेकर विहिप द्वारा आयोजित ‘धर्म सभा’ ने, जिसके सबसे प्रमुुख वक्ताओं में आरएसएस में नंबर-दो माने जाने वाले, भैयाजी जोशी भी शामिल थे, हिंदुत्ववादी दुहाई की इस कार्यनीति के रूपाकार को काफी स्पष्टï कर दिया है। सभी जानते हैं कि यह किसी अलग-थलग आयोजन का मामला नहीं था। इससे पहले, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा तेलंगाना के विधानसभाई चुनावों से ठीक पहले, 25 नवंबर को अयोध्या में तथा नागपुर समेत देश के कई अन्य प्रमुख केंद्रों में भी, राम मंदिर की ही मांग को लेकर, ऐसी ही गोलबंदियों का आयोजन किया गया था। यह सिलसिला, देश के दूसरे अनेक हिस्सों में इसी मांग पर सभाओं के आयोजन के साथ, जनवरी के आखिरी तथा फरवरी के पहले दिन, विशाल संत सम्मेलन तक जाएगा और अंतत: कुंभ के साथ इसे जोड़ दिया जाएगा।

याद रहे कि इस सिलसिले की और इसकी आक्रामक बहुसंख्यकवादी भाषा तथा स्वर की शुरूआत, आरएसएस सरसंघचालक, मोहन भागवत के इस साल के अपने विजयदशमी संबोधन में इसकी मांग उठाए जाने के साथ हुई थी कि मोदी सरकार को ही कानून बनाने के जरिए, अयोध्या में विवादित स्थल पर मंदिर बनवाने का रास्ता बनाना चाहिए। इसके बाद, अध्यादेश जारी करने या संसद से कानून पारित कराने की मांगों को तेज करने का सिलसिला तो शुरू हुआ ही, इसके साथ ही फौरन तथा उनका मनचाहा फैसला सुनाने को तैयार नहीं होने के लिए, सुप्रीम कोर्ट को बढ़ते पैमाने पर निशाने पर लिया जाने लगा। वास्तव में इसका सुप्रीम कोर्ट पर दबाव बनाने से भी ज्यादा उपयोग, हिंदुओं के साथ उनके ही देश में न्याय न किए जाने तथा उनकी भावनाओं का निरादर किए जाने का, नैरेटिव प्रचारित करने और इसके माध्यम से, उग्र तथा हमलावर हिंदुत्ववादी गोलबंदी किए जाने के लिए था।

इसलिए, अचरज की बात नहीं है कि 25 नवंबर के आयोजनों में नागपुर में खुद भागवत ने और अयोध्या में आरएसएस के प्रतिनिधि ने, न सिर्फ इसका एलान कर दिया कि अब अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा नहीं की जाएगी, बल्कि 6 दिसंबर 1992 जैसा आंदोलन फिर से खड़ा करने का रास्ता भी सुझा दिया। युवाओं को आश्वस्त कर दिया गया कि अब वे कुछ भी कर सकते हैं। अचरज नहीं कि दिल्ली में आयोजित धर्म संसद में आए लोगों का एक उल्लेखनीय हिस्सा, पुराने नारों के अलावा, एक नया नारा लगा रहा था–एक धक्का और दो, बाबरी मङ्क्षस्जद तोड़ दो। पिछले ही हफ्ते बुलंदशहर में कथित गोरक्षकों द्वारा पुलिस इंस्पैक्टर की गोली मारकर हत्या किए जाने समेत जो कुछ हुआ और योगी सरकार ने जिस तरह इस कांड में संलिप्त बजरंग दल, विहिप आदि के नेताओं को बचाने की कोशिश की है, इस हिंदुत्ववादी गोलबंदी की दिशा का ऐसा ही एक और संकेतक है।

          साफ है कि छीजते जनाधार की भरपाई के लिए संघ-भाजपा, सांप्रदायिक गोलबंदी का ही ज्यादा से ज्यादा सहारा लेंगे। राम मंदिर, इस गोलबंदी का मुख्य नारा होने जा रहा है।

अचरज नहीं होगा कि संसद के बाहर आरएसएस, विहिप आदि द्वारा की जा रही गोलबंदी के साथ सुर मिलाकर, संसद के वर्तमान सत्र में निजी प्रस्तावों समेत विभिन्न तरीकों से इस मुद्दे को गरमाने तथा भाजपा को मंदिर की मांग से ज्यादा से ज्यादा जोडऩे की चालें चली जाएं। जाहिर है कि इस गोलबंदी को साफ तौर पर नरेंद्र मोदी की भाजपा के लिए समर्थन से जोड़े रखने का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है। रामलीला मैदान के संत सम्मेलन से नरेंद्र मोदी को दी गयी यह धमकी इसी का सबूत है कि, मंदिर बनाए बिना मोदी को कुर्सी से नहीं उतरने देंगे। लेकिन, पांच राज्यों के चुनाव के नतीजे इसका भी तो इशारा कर रहे हैं कि संघ-भाजपा का यह पैंतरा, 2019 में उन्हें कामयाबी नहीं दिला पाएगा। लेकिन, उनके पास अपने बिखरते जन समर्थन को बचाने का, इसके सिवा दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है। नरेंद्र मोदी के हवाई वादों पर विश्वास करने के लिए तो जनता किसी भी तरह से तैयार नहीं है।

क्या यह ख़बर/ लेख आपको पसंद आया ? कृपया कमेंट बॉक्स में कमेंट भी करें और शेयर भी करें ताकि ज्यादा लोगों तक बात पहुंचे

कृपया हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

 

About राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

Check Also

Ajit Pawar after oath as Deputy CM

जनतंत्र के काल में महलों के षड़यंत्रों वाली दमनकारी राजशाही है फासीवाद, महाराष्ट्र ने साबित किया

जनतंत्र के काल में महलों के षड़यंत्रों वाली दमनकारी राजशाही है फासीवाद, महाराष्ट्र ने साबित …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: