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निजी स्कूल की लूट पर रवीश कुमार को मोदी का खुला पत्र

नोट: इस पत्र को कुछ समय पहले लिखा था और रविश कुमार के मेल पर भेजने के बाद; उनके ब्लॉग पर डालने के लिए ब्लॉग वाले पते पर इस चिठ्ठी को भेजने और फोन से सम्पर्क की कोशिश के बाद; आखिर- मैं इस पत्र को हस्तक्षेप के माध्यम से जारी कर रहा हूँ।

अनुराग मोदी

प्रिय रविश,

एनडीटीवी ने जो स्कूल फीस का मुद्दा एक अभियान के रूप में लिया है – वो, वैसे तो अच्छा है। लेकिन नेशनल सैंपल सर्वे की 71 वें दौर की रिपोर्ट जो ‘भारत में शिक्षा’ के नाम से जनवरी से जून 2014 के आंकड़ों के अनुसार: प्राथमिक स्तर पर ग्रामीण इलाके में 94% और शहरों में 89% छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते; उच्चतर माध्यमिक स्तर पर यह आंकड़े क्रमश: 89% और 80% हो जाते हैं।

यह सरकारी स्कूल मिट रहे हैं – समान स्कूल प्रणाली की परिकल्पना की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।

इसलिए निजी स्कूल की फीस लूट का मुद्दा लगता है सबसे जुड़ा हुआ, मगर आज भी समाज के तीन चौथाई वर्ग का कोई लेना-देना नहीं है- क्योंकि उसका बच्चा आज भी मिटते-सिमटते सरकारी स्कूलों में पढ़ता है।

निज़ी स्कूल लूट करते हैं; क्योंकि: हमने यह ग्रहित धर लिया है कि सरकारी स्कूल – जहाँ कभी देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से लेकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक निकलते थे- अपनी प्रसांगिकता खो चुके हैं। और हम सिद्धांतः यह स्वीकार कर चुके हैं कि शिक्षा एक कमोडिटी है और उसे प्रदान करने का काम कस्बे के सेठ से लेकर अंबानीजी करेंगे; हमारे लिए विवाद सिर्फ उसकी कीमत का रह जाता है।

अनुराग मोदी

इसलिए जिस तरह से हम साबुन से लेकर टूथपेस्ट अपनी लागत से दस गुने दाम में हम बिना किसी विवाद के रोजमर्रा में खरीदते हैं; वैसा ही शिक्षा का धंधा करने वाले चाहते हैं।

देश में जितनी भी पेरेंट्स एसोसिएशन स्कूल की फीस आदि के लिए लडती हैं, उसमें कोई भी यह सवाल नहीं उठाती है: भारत देश, जो अपने संविधान में कल्याणकारी और समाजवादी राष्ट्र की धारणा को अपनाता है, वो शिक्षा के समान अवसर की जवाबदारी राज्य की क्यों नहीं मानता है?

सबकी बस एक ही मांग है- निजी, अंग्रेजी माध्यम वाली उत्तम शिक्षा कम से कम दाम में हमें दी जाए।

यानी देश के मुख्यधारा के लिए शिक्षा की लड़ाई अब उसकी कीमत की लड़ाई में सिमट गई है।

हम यह भूल जाते हैं कि अमेरिका इसलिए ताकतवर नहीं है कि उसके पास हमें बेचने के लिए F16 है और अपने लिए F-32 है, बल्कि वो इसलिए ताकतवर है, क्योंकि घोषित रूप से पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने के बावजूद वहां के 85% सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं- जहाँ सबको शिक्षा के समान अवसर हैं। वो बहुत गुणवत्ता वाले है। वहां निजी स्कूलों की पढाई का खर्चा उठाने के लिए वाकई में अमीर होना जरूरी है।

व्यवस्था ने हमारे निज मानस में यह बैठा दिया है कि अच्छा इलाज और शिक्षा सिर्फ निजी प्रदायकर्ता ही दे सकता है। हम इन सब मूलभूत सामाजिक जरूरतों के मामलों में सरकार की भूमिका भुला से बैठे हैं।

इतना ही नहीं, हमारा सामूहिक मानस, या कहे समाज का मानस – भी ऐसा हो गया है कि कस्बे का जो नगर सेठ बाकी चाहे जितना लूटता था लेकिन अपनी माँ/बाप के याद में वो यदा-कदा स्कूल के लिए जमीन और बड़ी राशि देने की जवाबदारी निभाता था – उसे अपना धर्म समझता था, वो भी अब पैसा कमाने के लिए स्कूल खोलता है।

जिस समाज में यह माना जाता था कि शिक्षा और ईलाज मुफ्त देने पर ही प्रभावी होता है; लोग यह कहते थे- फलां की दवा असर करती है, क्योंकि वो दवाई पैसे के बदले बेचता नहीं है। वहां अब नगर सेठ पर शिक्षा के लिए दान के लिए उस तरह की सामाजिक छवि का दबाव नहीं है। और अगर वो गलती से वैसा कर भी देगा, तो बिना तामझाम के उसके खैराती स्कूल में कोई नहीं आएगा।

इस मामले में सिर्फ नगर सेठ की मानसिकता बदली है ऐसा नहीं है- देश के बड़े-बड़े सेठ भी यही सोचते हैं। अब उन्होंने भी बड़े-बड़े लाखों रुपए महीने फीस वाले स्कूल खोल दिए हैं।

इस तरह से शिक्षा का बाज़ार बनने से सिर्फ अभिभावकों पर फीस का बोझ भर नहीं बढ़ा है, बल्कि इससे हमारे व्यापक समाज में उथलापन और अलगाव भी बढ़ा है।

आज गाँव से लेकर शहरों तक के सरकारी स्कूलों में सिर्फ दलित, आदिवासी, मुस्लिम और अन्य गरीब बच्चे और लडकियां भर रह गई हैं।

हमारे समय में नगरपालिका के स्कूल में हमारे साथ साथ समाज के हर वर्ग के बच्चे पढ़ते थे – हमने उनके घर देखे थे, हमारी उनसे थोड़ी बहुत दोस्ती भी थी; यानी कुल मिलाकर, हमे समाज की एक समझ थी। लेकिन, निजी स्कूल में पढने वाले हमारे बच्चों को वो समझ नहीं है। बल्कि, यह कहें तो बेहतर होगा कि सरकारी स्कूलों के इन बच्चों के प्रति निजी स्कूल के बच्चों में एक तिरिस्कार और नीचेपन की भावना है। आरक्षण की योजना और धर्म विशेष के प्रति रोष भी है – क्योंकि जब यह बच्चे इस सबके बारे में कोई दुष्प्रचार सुनते है, तो उसके बारे में इन बच्चे के अनुभव या कोई मानस मने कोई ऐसे दोस्त का चेहरा नहीं होता है जो एक विरोधी दलील या अफसाने को समझने में मदद करे। बल्कि, इन स्कूलों में जो कुछ दलित और मुस्लिम समाज के बच्चे होते हैं, वो भी पीयर ग्रुप, या हिन्दी में कहें तो अपने साथियों के विचारों के दबाव में खुद अपने वर्ग के बारे में हीनभावना से देखने लगते हैं। मेरा अपना लड़का – जिसका बाप पैदाइश से हिन्दू और माँ मुस्लिम है – के साथ यही हुआ।

इसलिए निजी स्कूलों की फीस की लड़ाई एक तात्कालिक मुद्दा भर हो सकता है, लेकिन यह स्थाई ईलाज नहीं है। बल्कि, आने वाले समय में नगर सेठों के इन निजी स्कूलों को कम्पनियां खरीद लेंगी, तो समस्या और बढ़ेगी।

आज एक छोटे-छोटे से कस्बे में अच्छे निजी स्कूल की लागत 10 करोड़ रुपए से कम नहीं है – दूसरा इसकी एक चालू-लागत है। इसलिए इन सेठों के लिए अब इन स्कूलों को आर्थिक दबाव और उपर से सरकार के कसते नियम के बीच चलाना फायदे का सौदा नहीं लग रहा है।

एक बार बड़ी कंपनी आएगी, तो फिर वो नियमों के बीच से रास्ता निकालने की ताकत रखेगी और पेरेंट्स की ताकत भी कमजोर होगी।

अब सवाल यह है कि आगे का रास्ता क्या है?

हमें आगे का रस्ता ढूढने के लिए अपने आजादी के आन्दोलन में जाना होगा, जब मुफ्त शिक्षा देना समाज के अनेक वर्गों ने अपनी जवाबदारी माना।

उदाहरण के लिए, मुंबई में अंग्रेजों व्दारा स्थपित 200 साल से ज्यादा पुरानी ‘मुंबई एजुकेशन सोसाइटी’ से लेकर 1918 में दादर में पहला गर्ल्स स्कूल स्थापित करने वाली ‘इन्डियन एजुकेशन सोसाइटी’ है, तो 1945 डॉ आम्बेडकर व्दारा स्थापित ‘पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी’ भी ।

यहाँ ऐसा कोई वर्ग यह समाज नहीं है, जिसने अपनी एजुकेशन सोसाइटी स्थापित ना की हो- जैसे, साउथ इंडियन, कन्नड़, गुजराती, खालसा आदि। यहाँ के हर रहवासी छेत्रों में क्रिश्चियन मिसनरी के स्कूल हैं। कमाल की बात यह है- यह आज भी सबसे उत्तम है और यहाँ अनेको की फीस (जिन्हें सरकार ग्रांट देती है) इतनी कम है कि आपको सहसा विश्वास नहीं होगा।

मैं इसे अपने उदाहरण से समझाता हूँ- जब हमें अपने राजनैतिक और समाजिक काम के चलते म. प्र. के हरदा में जान का खतरा बहुत नजदीक और साफ़-साफ़ दिखने लगा तब हमने अपने बच्चे- पलाश- को 2007 में मुंबई भेज दिया। वो वसई के जिस क्रिश्चियन मिशनरी के स्कूल में पढ़ा, वहां तो फीस कुछ 200 रु. माहवार थी, जो हर हाल में म. प्र. के निजी स्कूलों से आधी भी नहीं थी। लेकिन जब म. प्र का खतरा वसई पहुंचकर यथार्थ में बदल गया- 2009 में शमीम पर जानलेवा हमला हुआ; 118 टांके आए, तो हमें मजबूरी में मुम्बई, चेम्बूर में टाटा सामजिक विज्ञान संस्थान के कैंपस में आकर रहना पड़ा; जहाँ हाल में शमीम पढ़ाने लगी थीं।

हम म. प्र से मुंबई की फीस का तुलना कर मन ही मन बहुत डर रहे थे। लेकिन, जब पता किया, तो मालूम हुआ यहाँ का बेहतरीन स्कूल, ओ. एल. पी. एस. – जो सरकार की आर्थिक मदद से चलने वाल क्रिश्चियन मिसनरी स्कूल है, जहाँ कभी राजकपूर के लड़के ऋषि कपूर पढ़े थे ; और, जो स्कूल आज भी हर पैसे वाले माँ-बाप की भी पहली पसंद है। वहां की फीस थी- 9 वी कक्षा में 9 रु. प्रतिमाह मात्र और दसवीं में 10 रु.। लेकिन, इस तरह की एजुकेशन सोसाइटी और स्कूल आजादी के बाद खुलना बंद से हो गए- इसलिए, आपको मुंबई के बाहरी नए बसे उपनगरों में इस तरह के स्कूल बहुत कम मिलेंगे।

मुंबई में भी बढ़ती जनसँख्या और इन एजुकेशन सोसाइटी के स्कूलों की संख्यां नहीं बढ़ने से अनेक निजी स्कूल खुले हैं। इसके साथ ही, मुम्बई शहर में भी समाज के कुलीन वर्ग के लोगों ने अपने ऐसे स्कूल बना लिए हैं – जो पहले सिर्फ महाबलेश्वर और डलहौजी जैसी जगहों पर थे –जहाँ लाख रु. माहवार तक की फीस है।

हमें भी यह समझना होगा कि निजी स्कूल की लूट धीरे-धीरे बढ़ रही है, क्योंकि उसके मुकाबले सरकारी शिक्षा की व्यवस्था अब ठप सी हो गई है। और सरकार पर कुछ प्रभाव डाल सकने वाला वर्ग मूलत: यह मान चुका है कि निजी स्कूल ही अच्छी शिक्षा दे सकते हैं; यहाँ उसके बच्चे को समाज के छोटे माने जाने वाले वर्ग के साथ पढाई नहीं करना होगी। वो समाज में दो तरह की स्कूल व्यवस्था के समर्थक हैं। और उसके मानस और राजनैतिक समाजिक जीवन में कहीं भी यह बात नहीं है कि राज्य ‘समान स्कूल प्रणाली’ लागू करे- जहाँ एक चपरासी से लेकर कलेक्टर और मजदूर से लेकर सेठ के बच्चे को एक जैसी पढाई के अवसर मिले।

इसलिए जब-तक समान स्कूल प्रणाली की लड़ाई जोर नहीं पकड़ेगी, तब तक निजी स्कूलों की लूट भी नहीं रुकेगी। और इससे अभिभावकों की आर्थिक लूट के साथ समाज में दुराव भी बढ़ेगा।

अनुराग मोदी

समाजवादी जन परिषद

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