Home » समाचार » देश » महान संघर्ष समिति ने दिया नारा- अपनी एकता बनाना है, जंगल पर अधिकार पाना है

महान संघर्ष समिति ने दिया नारा- अपनी एकता बनाना है, जंगल पर अधिकार पाना है

समिति ने कोयला खदान रद्द होने और कोयले से मुक्ति की दूसरी वर्षगांठ मनायी

अमिलिया, 31 मार्च 2017। महान संघर्ष समिति द्वारा आयोजित वनाधिकार सम्मेलन में आज महान वन क्षेत्र के करीब 20 गाँव के सैंकड़ों लोग शामिल हुए और जंगल पर अपना अधिकार जताया।

समिति में शामिल ग्रामीणों ने सरकार द्वारा वन अधिकार कानून 2006 को कमजोर करने की कोशिशों का विरोध करते हुए यह मांग रखी कि महान वन क्षेत्र में शामिल सभी गाँवों को इस कानून के तहत जंगल पर कानूनी अधिकार दिये जायें।

सम्मेनल में महान वन क्षेत्र में स्थित अमिलिया, बुधेर, सुहिरा, बरवां टोला, पिढ़रवा, बंधौरा, सेमुहा, खैराही, नगवां, बंधा सहित करीब 20 गांवों के सैंकड़ों ग्रामीण शामिल हुए।

सम्मेलन की शुरुआत ग्रामीणों ने जंगल के रक्षक डीह बाबा की पूजा से की।

सम्मेलन में शामिल महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने जंगल और उससे जुड़े अपने रिश्ते पर बनी पारंपरिक लोकगीतों और लोकनृत्य के माध्यम से अपनी खुशी को व्यक्त किया। लोकगायक कृपानाथ यादव ने महान संघर्ष समिति के पिछले सात साल की लड़ाई को गीतों के माध्यम से लोगों के बीच रखा। वहीं बनारस से आये युवा कलाकारों की टोली ने भी गीत गाए।

सम्मेलन में आए कार्यकर्ताओं ने महान जंगल को बचाने की अपनी लड़ाई को याद किया और कोयले से प्राप्त बिजली के नुकसान पर भी चर्चा की।

महान संघर्ष समिति के सदस्य कृपानाथ यादव ने जन सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा,

“महान जंगल में प्रस्तावित कोयला खदान के खिलाफ लड़ते हुए हमने लगातार धमकियों, गैरकानूनी गिरफ्तारी और छापेमारी का सामना किया। हमें गर्व है कि हमारे आंदोलन का ही नतीजा है कि सरकार को हमारी बात माननी पड़ी और महान कोल ब्लॉक को निलामी सूची से बाहर करना पड़ा। अब हम सरकार से मांग करते हैं कि वन क्षेत्र के आसपास बसे गाँवों को वनाधिकार कानून के तहत सामुदायिक वनाधिकार दिया जाए। आगे भी हम किसी भी परिस्थिति में कोयला खदान को आवंटित नहीं होने देंगे और जंगल का विनाश होने से बचायेंगे।”

इस आंदोलन में शुरुआत से शामिल महान संघर्ष समिति की कार्यकर्ता और ग्रीनपीस की सीनियर कैंपेनर प्रिया पिल्लई ने कहा,

“महान संघर्ष समिति की जीत ने पूरे देश में चल रहे जन आंदलनों को नयी ऊर्जा दी है। यह जीत पूरी दुनिया में चल रहे जीवाश्म ईंधनों के खिलाफ अभियान में स्थानीय समुदाय द्वारा हासिल एक बड़ी जीत के तौर पर उल्लेखित है। अब हम सरकार के साथ मिलकर चाहते हैं कि वनाधिकार कानून के तहत महान वन क्षेत्र में लोगों को सामुदायिक वनाधिकार दिया जाये।”

प्रिया ने आगे कहा,

“आज दुनिया भर में लोग जीवाश्म ईँधन और कोयला जैसे गंदे ऊर्जा स्रोतों से मुक्ति माँग रहे हैं। पूरी दुनिया में 12 मार्च से 31 मार्च तक लोग सड़कों पर उतर कर जीवाश्म ईँधन के खिलाफ विरोध कर रहे हैं। इंधन के जीवाश्म स्रोत न सिर्फ स्थानीय समुदाय के लिये नुकसानदेह है बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से भी खराब साबित हुए हैं। आज पूरा देश कोयला आधारित विद्युत प्लांट की वजह से होने वाले वायु प्रदूषण से गंभीर संकट में है। इसलिए सरकार को भी सोचना चाहिए कि वो स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने पर ज़ोर दे और स्थानीय समुदाय की जीविका के साथ-साथ शहरी लोगों और पूरे देश की हवा को साफ बनाने की रणनीति बनाये।”

भारत में वनाधिकार कानून लागू करने की प्रक्रिया काफी धीमा है। अभी तक सिर्फ 3 प्रतिशत गाँव और समुदाय को ही जंगल पर अधिकार मिल सका है। वहीं दूसरी तरफ सरकार चाह रही है कि जंगल को खनन संबंधी कार्यों के लिये आसानी से कॉर्पोरेट को दे दे।

सम्मेलन को बेचनलाल साह, रविशेखर, एकता सहित कई अन्य समाजिक कार्यकर्ताओं ने संबोधित किया।

वन अधिकार कानून के अनुसार निम्न अधिकारों को मान्यता देता है:

1.      हर गाँव का जो जंगल होगा, उसमें क्या होगा वो ग्रामसभा तय करेगी।

2.     13 दिस्मबर 2005 तक वनभूमि पर काबिज लोगों को उस जमीन का पट्टा।

3.    इस कानून की धारा 3 (ग) जंगल में महुआ, आचार और तेंदुपत्ता से लेकर बांस जैसे लघु वनऊपज पर ग्रामसभा का पूरा अधिकार।

4.     शिकार छोड़कर अंग्रेजों के आने के पहले से जंगल में निस्तार, पूजा, तीर्थ आदि के जो भी अधिकार थे उनके मान्यता मिलेगी।

5.    ऐसे गाँव जो वनभूमि में बसे है और सरकार के सूची में नहीं है या पुराने खेड़े जहाँ से लोग भागे या भगाया गया, वो बसाया जा सकते है।

6.   जहाँ वनभूमि से लोगों को 2005 के पहले बिना नोटिस के हटाया गया है। जैसे वनग्रामों में लाइन सरकाकर, उस जंगल जमीन पर वापस अधिकार मिल सकता है। या कोई योजना के नाम बिना पुनर्वास हटाया गया है ।

7.    वनग्रामों को राजस्व ग्राम में बदला जा सकता है।

8.     बिना लोगों की मर्जी और लोगों को सेंक्चुरी और नेशनल पार्क से नहीं हटा सकते।

वन अधिकार कानून की धारा 5 के अनुसार ग्रामसभा को यह अधिकार होगा :

1.       वो यह देखे की ऐसी कोई भी कार्यवाही ना हो, जो उसमें रहने वाले लोगों, जीव-जंतु और पेड़ पौधे और नदी आदि के लिए खतरा ना बने। और ऐसी कोई भी गतिविधी को रोकेगा जो इन्हें नुकसान पहुंचाए। मतलब ग्रामसभा  ऐसी किसी भी परियोजना को इजाज़त ना दे, जो उसे, जंगल और नदी नालों को तथा जंगल के जीवजन्तु को नुकसान पहुंचा सकती है। यह ध्यान रखे, इसी आधार पर उडीसा के नियामगिरी के आदिवासीयों ने 50 हजार करोड़ की वेदांत मीनिंग कंपनी का काम रोक दिया।

2.     गाँव का जंगल, नदी-नाले, जीव-जंतु और आदिवासी की परम्परा और जैव-विविधता (याने हर तरह के पेड़-पौधे) की सुरक्षा हर-कीमत पर करेगा।

3.     जंगल उसके जानवर, और पर्यावरण की रक्षा। नदी-नालों में जहाँ से पानी आता है, उस जगह के उचित सुरक्षा।

About हस्तक्षेप

Check Also

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: