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महात्मा गांधी के अंतिम दो दिन एक कुजात गांधीवादी उनका सबसे करीबी था

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hastakshep
23 Mar 2019
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शेष नारायण सिंह
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30 जनवरी के दिन दिल्ली के बिडला हाउस में महात्मा गांधी की हत्या करके नाथूराम गोडसे ने केवल महात्मा गाँधी की ही हत्या नहीं की थी। उसने एक आज़ाद देश के सपने के भविष्य को भी मार डाला था। शासक वर्गो के शोषण के दर्शनशास्त्र के प्रतिनिधि नाथूराम ने उसी हत्या के साथ अन्य बहुत सी विचारधाराओं की हत्या कर दी थी।

महात्मा गाँधी को पढ़ने वाला कोई भी आदमी बता देगा कि महात्मा जी ने कांग्रेस के आर्थिक विकास के उस माडल को नहीं स्वीकार किया था, जिसे स्वतन्त्र भारत के लिए जवाहर लाल नेहरू और उनकी सरकार वाले लागू करना चाहते थे।

महात्मा गाँधी ने साफ़ बता दिया था कि वे गाँव को विकास की इकाई बनाने के पक्षधर थे, लेकिन जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई वाली कांग्रेस के नेताओं के दिमाग में औद्योगीकरण के रास्ते देश के आर्थिक विकास करने के सपने पल रहे थे। गांधी जी ने इस विषय पर बहुत विस्तार से लिखा है। उनकी मूल किताब हिंद स्वराज में तो यह बात साफ़-साफ़ लिखी ही है बाद के ग्रंथों में भी गाँव को विकास की यूनिट बनाने की बात बार बार कही गयी है।

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आज़ादी की लड़ाई तक यानी 1946 तक महात्मा गांधी की हर बात मानने वाले जवाहर लाल नेहरू ने महात्मा जी की आर्थिक विकास की सोच को नकारना शुरू कर दिया था।

भारत के आख़िरी आदमी के विकास की पक्षधर गांधी की राजनीति से इसी दौर में जवाहर लाल नेहरू की विचारधारा ने दूरी बनानी शुरू कर दी थी। कांग्रेस का प्रभावशाली तबका भी इस मामले में नेहरू के साथ था।

गांधी जी एक राजनीतिक पार्टी के रूप में कांग्रेस को खत्म करके बाकी राजनीतिक जमातों को चुनावी मैदान में बराबरी देना चाहते थे। लेकिन उस वक़्त तक कांग्रेस में सबसे अधिक प्रभाव शाली हो चुके सरदार पटेल और जवाहर लाल नेहरू ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया था। आर्थिक विकास की उनकी सोच को भी सही ठहराने वाला कोई भी आदमी जवाहर लाल की पहली मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं था। गांधी जी इस बात से संतुष्ट नहीं थे।

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उधर मुहम्मद अली जिन्नाह की जिद के चलते मुसलमान ज़मींदारों ने पूरे देश में दंगे भड़काने की साज़िश पर अमल करना शुरू कर दिया था।। 1946 के बाद से ही हर उस मूल्य को दफ़न किया जा रहा था जिसको आधार बनाकर आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी। आज़ादी के आन्दोलन के इथोस को कांग्रेस को लोग भूल चुके थे और अगर भूले नहीं थे तो उसे इतिहास के कूड़ेदान के हवाले करने की पूरी तैयारी कर चुके थे।



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इस पृष्ठभूमि में जिन लोगों ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाई थी, महात्मा गांधी उन लोगों पर बहुत भरोसा कर रहे थे। इनमें से एक डॉ राम मनोहर लोहिया थे।

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अगस्त क्रान्ति के दौरान डॉ. लोहिया के काम से महात्मा गांधी अत्यंत प्रभावित हुए थे। उसके पहले डॉ. लोहिया के कई लेख, महात्मा गांधी के अखबार 'हरिजन' में प्रकाशित भी हो चुके थे। गोवा के मामले पर उनका साथ महात्मा गांधी को छोड़कर और किसी बड़े नेता ने नहीं दिया।

स्वतंत्रता के बाद नेहरू सरकार की आर्थिक नीतियां गांधी के विचारों से प्रतिकूल थीं। डॉ. लोहिया का समाजवाद गांधी की विचारधारा के अत्यन्त निकट था। नेहरू सरकार की दशा-दिशा के कारण महात्मा गांधी का नेहरू से मोहभंग हो रहा था और लोहिया की तरफ रूझान बढ़ रहा था।

आज़ादी के बाद देश साम्प्रदायिकता के संकट में फंस गया तो शांति और सद्भाव कायम करने में डॉ. लोहिया ने गांधी का सहयोग किया। इस प्रकार वे गांधीजी के करीब आ गये थे। इतने क़रीब कि गांधी ने जब लोहिया से कहा कि जो चीज़ आम आदमी के लिए उपलब्ध नहीं उसका उपभोग तुम्हें भी नहीं करना चाहिए और सिगरेट त्याग देना चाहिए तो लोहिया ने तुरन्त उनकी बात मान ली।

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महात्मा जी से लोहिया के विचार इतने मिल रहे थे कि लगता था कि आज़ादी के बाद लोहिया ही गांधी की राजनीति के वारिस बनेगें।

ऐसा सन्दर्भ देखने को मिला लगता है कि आज़ादी के बाद की भारत की राजनीति पर फिर से विचार की ज़रूरत जितनी आज है उतनी कभी नहीं थी।

"भारतीय पक्ष" नाम के एक कोष में लिखा है कि 28 जनवरी, 1948 को गांधी ने लोहिया से कहा, मुझे तुमसे कुछ विषयों पर विस्तार में बात करनी है। इसलिये आज तुम मेरे शयनकक्ष में सो जाओ। सुबह तड़के हम लोग बातचीत करेंगे। लोहिया गांधी के बगल में सो गये। उन्होंने सोचा कि जब बापू जागेंगे, तब बातचीत हो जाएगी। लेकिन जब लोहिया की आँख खुली तो गाँधी जी बिस्तर पर नहीं थे। बाद में जब डॉ. लोहिया गांधी से मिले तब गांधी ने कहा,

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"तुम गहरी नींद में थे। मैंने तुम्हें जगाना ठीक नहीं समझा। खैर कोई बात नहीं। कल शाम तुम मुझसे मिलो। कल निश्चित रूप से मैं कांग्रेस और तुम्हारी पार्टी के बारे में बात करूँगा। कल आख़िरी फैसला होगा।"

यानी 29 जनवरी के दिन डॉ लोहिया उन्हें वादा करके आये कि 30 तारीख को बात करने के लिए आ जायेंगें।



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लोहिया 30 जनवरी, 1948 को गांधी से बातचीत करने के लिए टैक्सी से बिड़ला भवन की तरफ बढ़े ही थे कि तभी उन्हें गांधी की शहादत की खबर मिली। एक ठोस योजना की भ्रूण हत्या हो गयी।

बापू अपनी शहादत से पहले अपने आख़िरी वसीयतनामे में कांग्रेस को भंग करने की अनिवार्यता सिद्ध कर चुके थे। उस समय उन्होंनें ऐसा स्पष्ट संकेत दिया था कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान अनेकानेक उद्देश्यों के निमित्त गठित विविध रचनात्मक कार्य करने वाली संस्थाओं को एकसूत्र में पिरोकर शीघ्र ही एक नया राष्ट्रव्यापी लोक संगठन खड़ा किया जायेगा। डॉ. लोहिया की उसमें विशेष भूमिका होगी। इस प्रकार बनने वाले शक्तिपुंज से बापू आज़ादी की अधूरी जंग के निर्णायक बिन्दु तक पहुंचाना चाहते थे।

डॉ लोहिया के जीवन के इस पक्ष के बारे में जानकारी की कमी है। ज़ाहिर है कि अब इस विषय पर भी सोचविचार किया जाना चाहिए कि अगर महात्मा जी और लोहिया की वह मुलाक़ात हो गयी होती तो हमारे देश का इतिहास बिलकुल अलग होता।

इस बात की पूरी संभावना है कि महात्मा गांधी की राजनीति और उसमें होने वाले संघर्ष के असली वाहक डॉ राम मनोहर लोहिया ही होते। लेकिन वह मुलाक़ात नहीं हो सकी और कांग्रेस से अलग होकर डॉ लोहिया और उनके साथियों ने जो राजनीतिक रास्ता चुना वह समाजवाद का था।

आज़ादी के बाद के लोहिया के सारे काम पर नज़र डालें तो समझ में आ जाएगा कि उनकी मान्यताएं भी लगभग वही थीं जिनके लिए महात्मा गाँधी ने आजीवन संघर्ष किया।

जब कांग्रेस के सत्ताधीशों से महात्मा गांधी निराश हो गए थे तो उनको लगा था कि डॉ राम मनोहर लोहिया ही उनकी राजनीतिक सोच के हिसाब से आज़ाद भारत के भविष्य को डिजाइन कर सकते हैं। लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था।

1947 के बाद की जो कांग्रेस है उसमें महात्मा गांधी की राजनीति का कोई पुछत्तर नहीं नज़र आता। महात्मा गांधी ने छुआछूत को खत्म करने के लिए आज़ादी के आंदोलन को एक हथियार माना था, लेकिन 1947 के बाद हम साफ़ देखते हैं कि डॉ बी आर आंबेडकर की दलितों के लिए आरक्षण की योजना को संविधान में डालने के अलावा कुछ नहीं हुआ। हाँ यह भी सच है कि जवाहरलाल नेहरू ने डॉ आंबेडकर की संवैधानिक सोच का समर्थन किया। लेकिन इस सीन से कांग्रेसी नदारद थे। सरकारी तौर पर जाति आधारित छुआछूत को मिटाने और सामाजिक समरसता की स्थापना का कोई प्रयास नज़र नहीं आता।



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गांधी के नाम पर अपना कारोबार चलाने वाली कुछ संस्थाओं ने मंदिर आदि में प्रवेश जैसी कुछ सांकेतिक कार्यवाही की लेकिन कहीं भी गंभीर राजनीतिक क़दम नहीं उठाये गए।

महात्मा गांधी ने साफ कहा था कि कल कारखानों के मालिक उद्योगपति का रोल एक ट्रस्टी का होगा लेकिन जिस तरह की औद्योगिक नीति बनी, सार्वजनिक संपत्ति की मिलकियत के जो नियम बने उसमें महात्मा गांधी कहीं दूर दूर तक नज़र नहीं आते। सारा का सारा कंट्रोल पूंजीपति के हाथ में दे दिया गया। मजदूरों के कल्याण के लिए जो नीतियां बनीं उसमें भी उद्योगपति का पलड़ा भारी कर दिया गया। अपने देश की श्रम नीतियां मजदूरों के शोषण का हथियार बनीं।

महात्मा जी का सबसे प्रिय विषय था, ग्रामीण भारत का समुचित विकास लेकिन कृषि नीतियां ऐसी बनायी गयीं जिसमें कहीं भी गाँव में रहने वाले किसान की भलाई का कोई स्थान नहीं था। इस देश में शुरू से ही खेती को उस रास्ते पर विकसित किया गया जिसके बाद किसान का रोल राष्ट्रीय विकास में केवल मतदाता का होकर रह गया।

इस देश में नेहरू के वारिसों ने जिस तरह की कृषि नीति को महत्व दिया उसमें किसान को केवल उतना ही सुविधा दी जाती है जिसके बाद वह शहरी आबादी के लिए भोजन का इंतज़ाम करता रहे, और सत्ताधारी पार्टी को वोट देता रहे।



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महात्मा गांधी ने कहा था कि पंचायतों का रोल भारत के ग्रामीण जीवन में सबसे ज्यादा होना चाहिए। लेकिन सरकार ने ऐसी नीतियों बनाईं कि आज देश में वकीलों और उनके दलालों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार हो गया है। ग्रामीण भारत में ऐसा कोई परिवार नहीं बचा है जिसने कोर्ट के फेरी न लगायी हो। ज़ाहिर है कि महात्मा गांधी के हर सपने को सत्ताधारी दलों ने नाकाम किया है।

ऐसा लगता है कि अगर 29 जनवरी 1948 की सुबह डॉ लोहिया और महात्मा गांधी की बातचीत हो गयी होती तो शायद डॉ लोहिया कुजात गांधीवादी न होते। बहुत बाद में उन्होंने सरकारी और मठी गांधीवादियों से परेशान होकर अपने आपको और अपने साथियों को कुजात गांधीवादी कह दिया था लेकिन अगर गांधी जी ने उनको कांग्रेस से अपनी निराशा से विधिवत परिचित करा दिया होता तो इस बात में दो राय नहीं होनी चाहिए कि डॉ राम मनोहर लोहिया ने महात्मा जी की इच्छा को पूरा किया होता और महात्मा गांधी की विरासत को कांग्रेस और कांग्रेसी सत्ता की फाइलों में गुम होने से बचा लिया होता।।

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