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शिक्षक और लोकतांत्रिक मूल्य : ज्ञान के कब्रिस्तान हैं विश्वविद्यालय

संजीव ‘मजदूर’ झा

शिक्षक और लोकतंत्र के बीच का संबंध जब टूट रहा हो तो समझना चाहिए कि समाज की संस्थानिक हत्या तय है. समाज का लोकतांत्रिक होना तब तक संभव नहीं है जब तक शिक्षा संस्थानों में लोकतांत्रिक मूल्य स्थापित न हो. यह भी स्पष्ट है कि इन संस्थानों में लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने की सर्वाधिक ज़िम्मेदारी शिक्षकों की होती है. जबकि देखा जाता है कि इन मूल्यों के विरोध में सबसे अधिक आज के शिक्षक ही हैं.

राजेन्द्र यादव ने जब लिखा था कि ‘विश्वविद्यालय साहित्य के कब्रिस्तान हैं’ तब शिक्षकों की एक बड़ी जमात ने इसका विरोध किया था. लेकिन वे इस बात पर चिंतन के लिए तैयार नहीं थे कि शिक्षकों की भूमिका किस रूप में होनी चाहिए. जहाँ शिक्षकों की भूमिका पर विचार करने की गुंजाईश नहीं है वहां यह आसानी से महसूस किया जा सकता है कि वहां का उत्पादन किस प्रकार से समाज-विरोधी है. साथ ही जहाँ इस प्रक्रिया को गंभीरता से लेने की आवश्यकता पर ध्यान देने की परंपरा रही है, वहां के छात्रों में सामाजिक-सांस्कृतिक समझ की बारीकियों को साफ़ तौर पर देखा जा सकता है.

विकास और विकृति की क्रमशः सबसे अच्छी और बुरी बात यह होती है कि दोनों का स्वरूपगत परिष्कार होता है. एक का समाज हित में तो दूसरे का ठीक पहले के विपरीत दिशा में. यह काफ़ी दिलचस्प और डरावना होता है जब एक ही संस्था से लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरवी की जाती है और ठीक उसी संस्था के दूसरे उपसंस्थाओं द्वारा उसका विरोध होता है. स्वाभाविक है विकृत भीड़ का विरोध सृजनात्मक नहीं होगा इसलिए विकृति संस्कृति के विरोध में होता है और इसका प्रत्यक्ष हर्जाना समाज को भुगतना पड़ता है. यह तो इसका दिलचस्प पक्ष है लेकिन हैरत भरा पक्ष यह है कि जो भीड़ विकृत है उसे ठीक ठीक इस बात का अहसास ही नहीं कि दरअसल उसका पक्ष सांस्कृतिक है अथवा विकृति के पक्ष में है. वह विकृति को ही संस्कृति मान बैठता है. ऐसे में वह कब अलोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में लोकतांत्रिक मूल्यों का विरोध करने लग जाता है उसे पता ही नहीं चल पाता.

अब यहाँ सवाल यह महत्वपर्ण हो जाता है कि आखिर वे कौन से कारण हैं कि एक ही संस्था के लोग परस्पर एक दूसरे के विरोध में खड़े होते हैं और यह विरोध अंततः लोकतांत्रिक मूल्यों के ख़िलाफ होता है.

यह एक गंभीर समस्या इसलिए भी है कि इन विरोधों का क्रियान्वयन अंततः छात्रों पर होता है और चिंता का विषय यह है कि इन समस्याओं के निर्माण का सूत्र प्रथमतः और अंततः शिक्षकों से जुड़ा होता है. इन्हीं कुछ समस्याओं पर विचार करते हुए पूर्व में मैंने ‘विश्वविद्यालय ज्ञान के कब्रिस्तान हैं’ लिखा था. व्यावहारिक स्तर पर इस आलेख का विरोध निजी तौर पर किया गया जबकि इस विचार का खंडन सामाजिक स्तर पर होना चाहिए था. निजी तौर पर किए जा रहे विरोध अक्सर विचारों के परिपेक्ष्य में खोखले और शिकायती होते हैं जिसका अंतिम उद्देश्य इस बात पर आकर सिमट जाता है कि ‘विश्वविद्यालय में घुसने नहीं देना है’.

वर्तमान पीढ़ी और और पूर्व की पीढ़ी के शिक्षण शैली पर भी हमें विचार करने की आवश्यकता है.

ऐसा नहीं है कि पूर्व की पीढ़ी में समस्याएं नहीं थी. समस्याएं वहां भी थी लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों का गला घोंट वातावरण वैसा नहीं था जैसा कि आज के समय में देखा जा सकता है. आज हमारे पास विचारों की, रचनात्मकता की ऐसी कोई स्थितियां नहीं जिसे हमने स्वयं से परिष्कृत किया हो. न हमारे पास अपनी भाषा है न अपने विचार. जिस दौर में छात्र अपने विचार और दृष्टि सृजित करते हैं उस दौर में छात्रों को एक सीमा के बाहर जाकर चरण वंदना और स्तुति-गान में लीन होना पड़ता है. स्वाभाविक है ऐसे में विचारों का क्षीण होना.

जो छात्र पिछली पीढ़ी के शिक्षकों के संसर्ग में रहे हैं उनमें अधिकांश आज भी अपने और संस्थाओं के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्ष करते दिखाई पड़ते हैं. साथ ही जो छात्र आज के शिक्षकों से दीक्षित हो रहे हैं उनमें से अधिकांश लोकतांत्रिक मूल्यों के विपक्ष में खड़े हैं. छात्रों को अलोकतांत्रिक बनाने की प्रक्रिया एक पीढ़ी को ख़राब करना होता है. अगर समाजशास्त्रीय अध्ययन के आधार पर देखा जाए तो यह अपराधों की दुनियां का सबसे गंभीर अपराध है. कहने की आवश्यकता नहीं कि इस अपराध को उन शिक्षकों द्वारा किया जा रहा है जो मूल रूप में शिक्षक हैं ही नहीं. अधिकांश शिक्षक कम पढ़े लिखे और विचारहीन हैं. इसलिए उनके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि छात्रों को किसी ऐसी दुनिया में फंसा कर रखा जाए जो दुनियां वास्तव में कहीं है ही नहीं. लोकतांत्रिक मूल्य हमें दूसरों के अधिकारों का हनन करने से रोकता है. अगर इस बात को शिक्षक अपने पर लागू कर लें तो सैकड़ों शिक्षकों को अपने पद-प्रतिष्ठा से हाथ धोना पड़ जाएगा. ऐसे शिक्षक सत्ता के लिए बड़े कामगार सिद्ध होते हैं क्योंकि इनके रहते छात्रों में एकजुटता और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष की नींव तैयार ही नहीं हो सकती. ये आन्दोलनों के प्रति घृणा का भाव पैदा करते हैं. अव्वल तो यह कि ये आन्दोलनों के ख़िलाफ आंदोलनकारी विरोध की जमीन तैयार करने में भी अपनी भूमिका निभाते हैं.

भारत जैसे गरीब देश में जहाँ आज भी भूख से मरने वालों की संख्या मौजूद है, वहां लाखों की सैलरी लेने वाले शिक्षकों पर सवाल न उठना और शिक्षक दिवस पर चारण-गीत गाना मौजूदा यथार्थ से मुंह फ़ेरने जैसा है.

हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षा अपने आप में एक आन्दोलनकारी और परिवर्तनकारी व्यवस्था है जिससे व्यक्ति में सामाजिक दृष्टि का विकास होता है लेकिन जब इसी परिदृश्य को उलट कर व्याख्यायित करने का उद्द्योग फैलाया जा रहा हो तो स्वाभाविक है कि शिक्षकों की भूमिका पर प्रश्न उठाया जाए.

देखा जाए तो नामवरी शिक्षकों से लेकर लौंडे-नुमा शिक्षकों की एक पूरी जमात है जिन्होंने वर्तमान व्यवस्था के आगे घुटने टेक दिए हैं. उनका यह घुटना टेकना उनकी जिन्दगी में सुख-सुविधाओं की बाढ़ तो अवश्य ला देता है लेकिन वे शायद इसके वीभत्स परिणामों से वाकिफ नहीं होते हैं. वे ये जान ही नहीं पाते हैं कि जिस समाज को बदलने में छात्र-शिक्षक की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है उसे वे स्वार्थों की पूर्ति हेतु नस्लों को बर्बाद कर लगभग ख़त्म करने में गँवा देते हैं. वे यह भी भूल जाते हैं कि हिंदी साहित्य में ही आदि काल से अब तक वे नामवर नहीं याद किये जाते हैं जिन्होंने अपनी महत्वकांक्षा की पूर्ति हेतु व्यवस्था से समझौता कर लिया बल्कि वे आदरणीय कहे जाते हैं जिन्होंने लड़ाई के लिए मार्ग बनाने में अपनी भूमिका अदा की है. इतिहास के न्यायालय में बड़े-बड़े नामवर अक्सर मूक खड़े होते हैं और उनके वजूद को याद रखने वाला कोई नहीं होता है क्योंकि दास कभी इतिहास नहीं लिखा करते और आज के शिक्षक छात्र नहीं दास चाहते हैं.

इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने अपने संस्थाओं को अधिक से अधिक लोकतांत्रिक बनाएं . छात्र शिक्षकों की आइडेंटिटी होते हैं और आइडेंटिटी के वगैर व्यक्तित्व पर गर्व करना हास्यास्पद भी है और गंभीर बिमारी भी.

विश्वविद्यालयों के संदर्भ में दायित्व-बोध की प्रक्रिया से छात्रों को भी मुक्त करके आंकलन नहीं किया जा सकता है. इसलिए छात्रों के संदर्भ में भी यह जरुरी हो जाता है कि वे अपने अपने मूल्य वैचारिक स्तर पर तय करें. ध्यान यह भी रखना चाहिए कि वर्तमान सुविधाओं की कीमत किस रूप में समाज को चुकाना पड़ता है. परिसर में यदि एक पक्ष की भूमिका कमज़ोर हो जाए तो स्वाभाविक रूप से दूसरे पक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. इसमें कोई दो राय नहीं कि आज छात्रों की भूमिका अधिक है, जहाँ उसे व्यक्तिकता के दायरे से हटकर सामाजिक दृष्टि के विकास पर अधिक विचार करने की आवश्यकता है.

शिक्षक दिवस प्रायः वे लोग अधिक मनाते हैं जो चारण पद्धति के हैं जबकि मनाना उन्हें चाहिए जिन्हें सामाजिक हित में शिक्षित किया गया है. ऐसे शिक्षक और ऐसे छात्र ही इस पावन दिवस को मनाने के असल अधिकारी हैं.

मैं ऐसे छात्र और ऐसे शिक्षकों को नमन करता हूँ जिनकी दृष्टि में समाज-हित हमेशा से सर्वोपरि रहा है.

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