कर्नल पुरोहित की रिहाई यानी हिंदू आतंक, आतंक ना भवति

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।
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आखिरकार, मालेगांव बमकांड (Malegaon bomb blasts) के आरोपी, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित (Lt. Col. Srikanth Purohit) की करीब आठ साल, आठ महीने के बाद सेना में वापसी हो गयी। बेशक, यह कहा जा सकता है कि दागी अफसर (Tainted officer) की अभी पूरी तरह से वापसी नहीं हुई है यानी सेना में उसकी स्थिति अभी जस की तस यानी गिरफ्तारी से पहले वाली नहीं हुई है। खासतौर पर सेना की ओर से यह बताया गया है कि पुरोहित को सेना में तुरंत ज्वाइन करने के बाद भी, अभी एक्टिव ड्यूटी पर नहीं रखा जाएगा। लेकिन, तत्काल एक्टिव ड्यूटी न दिए जाने की पर्याप्त से ज्यादा भरपाई, जमानत पर रिहाई के बाद पुरोहित के लिए ‘जान का खतरा’ देखकर, सेना द्वारा उन्हें सशस्त्र एस्कोर्ट दिए जाने से हो जाती है।

याद रहे कि एक मंझले दर्जे के सैन्य अधिकारी के लिए यह वाकई असाधारण सम्मान है। सेना में एस्कॉर्ट (Escort in the army) की सुविधा सिर्फ शीर्ष अधिकारियों को दी जाती है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सब कुछ के बावजूद, कई शर्तों के साथ ही जमानत पर छोड़े गए कर्नल पुरोहित का सेना द्वारा ऐसा ‘स्वागत’, क्या पुरोहित के प्रति और वास्तव में हिंदू आतंकी आरोपितों के पूरे कुनबे के ही प्रति, देश के शासन के ममतामय रुख को ही नहीं दिखाता है?

याद रहे कि सितंबर 2008 के मालेगांव बम विस्फोट की ही आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर (Sadhvi Pragya Thakur) को इससे पहले इसी मई में, राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआइए द्वारा क्लीनचिट दिए जाने के बाद, बांबे हाईकोर्ट ने जमानत पर रिहा कर दिया।

उधर अजमेर शरीफ तथा हैदराबाद मक्का मस्जिद बम विस्फोटों के आरोपी, स्वामी असीमानंद को भी अजमेर मामले में बरी होने के बाद, अन्य मामलों में जमानत पर छोड़ा जा चुका है। इस तरह यह एक निर्विवाद सचाई है कि एक-एक कर हिंदू आतंक के सभी चर्चित आरोपी, जिनके जरिए अजमेर शरीफ, मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रैस तथा मालेगांव विस्फोटों के तार आपस में जुड़ते हैं, जेल से बाहर आ गए हैं।

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बेशक, बांबे हाई कोर्ट के फैसले को उलटते हुए, सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बैंच द्वारा कर्नल पुरोहित को जमानत दिए जाने को, अपने आप में गलत नहीं कहा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ है कि अदालत की एक बड़ी चिंता यह थी कि पुरोहित को जेल में रहते हुए करीब नौ साल होने वाले थे, जबकि इस प्रकरण का न्यायिक फैसले के आस-पास पहुंचना तो दूर, आरोप तय किए जाने की प्रक्रिया भी संपन्न नहीं हुई थी। साफ था कि जमानत न दिए जाने की सूरत में पुरोहित को मामले का फैसला होने से पहले ही, और कई साल जेल में काटने पड़ सकते थे।

जाहिर है कि यह अदलात की न्याय-चेतना को मंजूर नहीं था, जो उचित ही इस आम सिद्धांत से संचालित होती है कि जमानत नियम हो और आरोपी को जेल भेजा जाना अपवाद! बेशक, यह हमारे देश में न्याय प्रक्रिया की कछुआ रफ्तार में छिपे अन्याय का ही सबूत है कि आतंकवाद से संबंधित मामलों में अंतत: निर्दोष करार दिए जाने वाले लोग भी, बारह-बारह, चौदह-चौदह साल जेल में गुजार चुके होते हैं। इसके बावजूद, यह अर्थहीन नहीं है कि साध्वी प्रज्ञा, असीमानंद और अब कर्नल पुरोहित नौ साल बाद ही सही, मामले की सुनवाई पूरी होने से पहले जेल से बाहर आने वाले, आतंकवाद के दुर्लभ आरोपी हैं।

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 वास्तव में इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बैंच के कर्नल पुरोहित को जमानत देने के निर्णय में एनआइए की कारगुजारियों की भी एक निश्चित भूमिका थी। वैसे तो उसी एनआइए ने, जिसने इससे पहले साध्वी प्रज्ञा को उसके खिलाफ ‘कोई साक्ष्य नहीं’ होने की क्लीन चिट देकर छुड़वाया था, सुप्रीम कोर्ट में पुरोहित को जमानत दिए जाने के खिलाफ दलील दी थी। लेकिन, इस प्रकरण की आरंभिक जांच करने वाली एजेंसी महाराष्ट्र एटीएस और बाद में जांच का जिम्मा संभालने वाली एजेंसी एनआइए द्वारा दाखिल की गयी चार्जशीटों में प्रकट अंतर्विरोध ने ही इस मामले में अदालत का मन बनाया था।

इतना ही नहीं, एनआइए ने ही पुरोहित के खिलाफ पूरे मामले की ही तली यह कहकर खिसका दी थी कि पुरोहित के खिलाफ षडयंत्रकारियों को आरडीएक्स मुहैया कराने का जो आरोप था, एक तरह से वही संदेह के दायरे में आ जाता था।

अभियुक्त सुधाकर चतुर्वेदी के घर से आरडीक्स की रिकवरी ही संदिग्ध हो जाती है क्योंकि आईएनए को संदेह था कि उसे आतंक विरोधी दस्ते यानी एटीएस ने वहां रोपा हो सकता है।

वास्तव में सुनवाई के दौरान अदालत ने इस पर हैरानी भी जतायी थी कि इस तरह आरडीक्स की सप्लाई में पुरोहित की भूमिका पर संदेह उठने के बाद, क्या उसके खिलाफ आरोपों में कुछ भी दम रह जाता है? इसके बाद भी अगर सुप्रीम कोर्ट ने पुरोहित की जमानत की याचिका ठुकरा दी होती, तो ही अचरज की बात होती।

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दूसरी ओर, मोदी राज में एनआइए की इस तरह की भूमिका में भी अचरज की कोई बात नहीं है। याद रहे कि पिछले साल यानी मोदी राज के दूसरे साल में ही मालेगांव मामले से जुड़ी सरकारी वकील, रोहिणी सालियान ने एनआइए के अधिकारियों पर इस मामले में ‘धीमे चलने’ के लिए दबाव डालने के आरोप लगाते हुए, अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

कहने की जरूरत नहीं है कि एनआइए और सरकार की ओर से, इन आरोपों का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया था। उल्टे बाद में एक तरह से सालियान के ही आरोपों को सच साबित करते हुए, एनआइए ने मुंबई की एक अदालत के सामने अंतिम चार्जशीट पेश करते हुए, ‘पर्याप्त साक्ष्य’ न होने के आधार पर न सिर्फ प्रज्ञा ठाकुर तथा पांच अन्य आरोपियों को क्लीन चिट दे दी बल्कि पुरोहित समेत बचे हुए दस आरोपियों के खिलाफ भी ‘अपर्याप्त साक्ष्य’ के आधार पर ही मकोका के कठोर प्रावधानों के उपयोग से हाथ खींच लिया था।

याद रहे कि मकोका के आरोपों में आरोपियों के पुलिस के सामने दिए गए बयान, साक्ष्य के रूप में अदालत में स्वीकार्य होते हैं। यह दिलचस्प है कि इससे पहले खुद एनआइए ने सुप्रीम कोर्ट में साध्वी प्रज्ञा की जमानत की याचिका का विरोध किया था।

अचरज की बात नहीं है कि पुरोहित की जमानत की खबर आते ही हिंदुत्ववादी संगठनों ने ‘हिंदुओं को फंसाने वालों’ के खिलाफ कार्रवाई की मांग का शोर मचाना शुरू कर दिया है। ऐसा शोर मचाने वालों में और रिहाई के बाद पुरोहित का स्वागत करने वालों में अभिनव भारत संगठन भी शामिल है, हिंदू आतंक के उस संजाल का महत्वपूर्ण हिस्सा था, जो 2008 के मालेगांव विस्फोट से शुरू होकर, परत-दर-परत उजागर हुआ था।

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विडंबना यह है कि कर्नल पुरोहित ने एनआइए सामने अपनी सफाई में यह दावा किया है कि मिलिट्री इंटैलीजेंस के एक अफसर की हैसियत से, हिंदू आतंक के संजाल में घुसपैठ कर के उसके इरादों को विफल करने की नीयत से, उसने अभिनव भारत संगठन को खड़ा किया था और अपना औजार बनाया था। पुरोहित के इस दावे से उसका निजी दोष भले ही हल्का हो जाता हो या मिट जाता हो, पर हिंदू आतंक के संजाल की मौजूदगी की तो पुष्टि ही होती है, जो न सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ आतंकवादी हमले संगठित करने का इरादा रखता था बल्कि धर्मनिरपेक्ष भारतीय राज्य को भी पलटने का लक्ष्य लेकर चल रहा था और इसके लिए आतंकी तौर-तरीकों का इस्तेमाल करना चाहता था। इसके बावजूद, सत्ताधारी भाजपा के प्रवक्ताओं ने भी ‘कानून अपना काम करेगा’ में आस्था होने की रस्म अदायगी के बाद, पुरोहित के जमानत पर छूटने को, उक्त हिंदू आतंकी संजाल की मौजूदगी को नकारने के लिए ही इस्तेमाल करने की कोशिश की है।

वास्तव में भाजपा-आरएसएस की जोड़ी के लिए, हिंदू आतंक के मामलों को कमजोर किए जाने का ठीक यही मकसद है। ये मामले आतंकवाद और मुसलमान को समानार्थी बनाने के सांप्रदायिक खेल के आड़े जो आते हैं। लेकिन, इससे भी ज्यादा खतरनाक यह कि इस तरह यह संदेश भी दिया जा रहा है कि भाजपा-आरएसएस राज में आतंक के साथ भी धर्म देखकर सलूक किया जाएगा। हिंदू आतंक, आतंक ना भवति।