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संघ कुनबे में मनुस्मृति का चिरस्थायी सम्मोहन

संघ कुनबे में मनुस्मृति का चिरस्थायी सम्मोहन

सुभाष गाताडे

जनाब संभाजी भिडे, जो शिवप्रतिष्ठान संगठन नामक तंजीम के अगुआ हैं और अपने बयानों और कार्रवाइयों से आए दिन सुर्खियों में छाए रहते हैं, वह इन दिनों नए सिरे से सुर्खियों में हैं। आरोप लगा है कि अपने अनुयायियों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने न केवल मनुस्मृति का गुणगान किया बल्कि अग्रणी संतों का भी 'अपमान’ किया। लाजिमी था कि उनके इस संवेदनशील बयान के चलते तत्काल उन्हें 'गिरफ्तार करने’ की मांग उठी और सरकार को भी यह कहना पड़ा कि वह इस मामले की तहकीकात करेगी। जांच जो भी हो अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि इस तहकीकात का क्या नतीजा निकलेगा? दरअसल 85 साल की उम्र के जनाब संभाजी भिडे की अहमियत को इस आधार पर जाना जा सकता है कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 'गुरु’ कहा जाता है  और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस का 'संरक्षक’ कहा जाता है।

मनुस्मृति के प्रति सम्मोहन

मनु के महिमामंडन करने वालों में भिडे अपवाद नहीं हैं। दरअसल मनुस्मृति के प्रति सम्मोहन 'परिवार’ में चौतरफा मौजूद है। अभी पिछले साल की ही बात है (2017) जब संघ के अग्रणी विचारक इंद्रेश कुमार ने ऐतिहासिक महाड सत्याग्रह के 90 वीं सालगिरह के महज 15 दिन पहले जयपुर में एक कार्यक्रम में शामिल होकर मनु और मनुस्मृति की प्रशंसा की थी। सभी जानते हैं कि महाड सत्याग्रह (19-20 मार्च तथा 25 दिसम्बर 1927 को दूसरा चरण) को नवोदित दलित आन्दोलन में मील का पत्थर समझा जाता है जब डॉ. अम्बेडकर ने एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम में हजारों लोगों की उपस्थिति में मनुस्मृति का दहन किया था और मनुस्मृति की मानवद्रोही अन्तर्वस्तु के लिए- जो दलितों, शूद्रों एवं स्त्रियों को सभी मानव अधिकारों से वंचित करती है- उस पर जोरदार हमला बोला था। अपने इस ऐतिहासिक आन्दोलन की तुलना डॉ. अम्बेडकर ने 18 वीं सदी की आखिरी दहाइयों में सामने आई फ्रांसिसी इन्कलाब से की थी, जिसने समूची मानवता की मुक्ति के लिए स्वतंत्रता, समता और बंधुता का नारा दिया था।

अगर हम जयपुर में आयोजित उस आम सभा की ओर लौटें, जिसका आयोजन किन्हीं 'चाणक्य गण समिति’ ने किया था और जिसका फोकस था 'आदि पुरुष मनु को पहचानें, मनुस्मृति को जानें’ तथा कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में साफ लिखा था कि मनुस्मृति ने मुख्यत: 'जातिभेद का तथा जातिप्रथा का विरोध किया’। अपने लम्बे वक्तव्य में इंद्रेश कुमार ने श्रोतासमूह को बताया कि मनु न केवल जातिप्रथा के विरोधी थे बल्कि विषमता की भी मुखालिफत करते थे और अतीत के इतिहासकारों ने जनता के सामने 'दबाव के तहत’ मनु की 'गलत छवि’ पेश की है। उन्होंने मनु को सामाजिक सद्भाव और सामाजिक न्याय के क्षेत्र का दुनिया का पहला न्यायविद भी बताया।

जहां उच्च न्यायालय में लगी है मनु की मूर्ति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता द्वारा मनु की खुली प्रशंसा जिस शहर जयपुर में हो रही थी, वह भारत का एकमात्र ऐसा शहर है जहां मनु की मूर्ति उच्च अदालत के प्रांगण में स्थापित की गई है और अम्बेडकर की मूर्ति कहीं अदालत के कोने में स्थित है। मालूम हो मनु की मूर्ति की स्थापना संघ के एक अन्य स्वयंसेवक तथा तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत के कार्यकाल में हुई थी। संविधान के बुनियादी उसूलों से जिनके विचार कतई मेल नहीं खाते उस मनु की मूर्ति को अदालत से हटाने के लिए कई आन्दोलन चले हैं, मगर आज भी वह मूर्ति 'मामला अदालत में विचाराधीन’ है, कहते हुए वहीं विराजमान है।

निश्चित ही मनु को वैधता प्रदान करने, उन्हें महिमामंडित करने का सिलसिला महज मूर्तियों की स्थापना तक सीमित नहीं है, इसने कई रूप लिए हैं।

यह बात बहुत कम लोगों को याद होगी कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर जब सुश्री उमा भारती विराजमान थीं, तब उनकी सरकार ने गोहत्या बंदी को लेकर एक अध्यादेश जारी किया था और इसके लिए जो आधिकारिक बयान जारी किया गया था उसमें मनुस्म्रति की महिमा गाई गई थी (जनवरी 2005)।

गाय के हत्यारे को मनुस्मृति नरभक्षी कहती है और उसके लिए सख्त सजा का प्रावधान करती है। निश्चित तौर पर आज़ाद भारत के कानूनी इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी कानून को इस आधार पर औचित्य प्रदान किया जा रहा था कि वह मनुस्मृति के अनुकूल है। विडम्बना यही थी कि कानून रचने वालों को मनुस्मृति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का ऐलान करने में बिल्कुल संकोच नहीं हो रहा था जबकि वह अच्छी तरह जानते हैं कि मनु के विचार संविधान के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ हैं।

व्यक्तिगत पसंदगी/नापसंदगी की बात अलग आखिर मनुस्मृति के प्रति समूचे हिन्दुत्व ब्रिगेड में इस किस्म का सम्मोहन क्यों दिखता है? समझा जा सकता है कि मनुस्मृति का महिमामंडन जो 'परिवार’ के दायरों में निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है उससे दोहरा मकसद पूरा होता है: वह मनुस्मृति को उन तमाम 'दोषारोपणों से मुक्त’ कर देती है जिसके चलते वह रैडिकल दलितों से लेकर तर्कशीलों के निशाने पर हमेशा रहती आई है।  दूसरे, इससे संघ परिवारी जमातों की एक दूसरी चालाकी भरे कदम के लिए जमीन तैयार होती है जिसके तहत वह दलितों के 'असली दुश्मनों को चिन्हित करते हैं’ और इस कवायद में 'मुसलमानों’ को निशाने पर लेते हैं। वह यही कहते फिरते हैं कि मुसलमान शासकों के आने के पहले जाति प्रथा का अस्तित्व नहीं था और उनका जिन्होंने जम कर विरोध किया, उनका इन शासकों द्वारा जबरदस्ती धर्मांतरण किया गया और जो लोग धर्मांतरण के लिए तैयार नहीं थे, उन्हें उन्होंने गंदे कामों में ढकेल दिया।

मनुस्मृति और अम्बेडकर

आज ऐसे आलेख, पुस्तिकाएं यहां तक किताबें भी मिलती हैं जो मनुस्मृति के महिमामंडन के काम में मुब्तिला दिखती हैं। प्रोफेसर केवी पालीवाल की एक किताब, 'मनुस्मृति और अम्बेडकर’ इसका एक दिलचस्प उदाहरण पेश करती है। किन्हीं 'हिन्दू रायटर्स फोरम’ द्वारा प्रकाशित (मार्च 2007, नई दिल्ली) इस किताब के लेखक की हिन्दुत्व वर्चस्ववादी फलसफे के साथ नजदीकी साफ दिखती है। प्रस्तुत फोरम द्वारा प्रकाशित किताबों में से 20 से अधिक किताबें इन्हीं प्रोफेसरसाब की लिखी हैं। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रत्यक्ष/अपरोक्ष जुड़े समझे जानेवाले सुरुचि प्रकाशन (दिल्ली) से भी इनकी कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। यहां 'मनुस्मृति और अम्बेडकर’ शीर्षक प्रस्तुत किताब की प्रस्तावना का एक हिस्सा उद्धृत किया जा सकता है जिसका शीर्ष है 'ये पुस्तक क्यों?’ ( पेज 3) जिसमें लिखा गया है- यह पुस्तक उन लोगों के लिए लिखी गई है जिन्हेें यह भ्रम है कि स्वयंभू मनु की मनुस्मृति हिन्दू समाज में आज व्याप्त जात-पांत, ऊंच-नीच और छुआछूत का समर्थन करती है। इसका दूसरा उद्देश्य इस भ्रम को भी दूर करना है कि मनु, शूद्रों और स्त्रियों के विरोधी और ब्राह्मणवाद के समर्थक हैं। इसका तीसरा उद्देश्य आधुनिक युग के समाज सुधारक और दलित नेता डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति के सम्बन्ध में फैलाई गई भ्रांतियों को भी सप्रमाण दूर करना है।

प्रस्तावना में यह भी बताया गया है कि किस तरह डॉ. अम्बेडकर ने 'मनुस्मृति के विषय में वेद विरोधी मैक्समुलर द्वारा सम्पादित और जार्ज बुहलर द्वारा अंग्रेजी में अनूदित मनुस्मृति के आधार पर लिखा जिसके कारण उन्हें अनेक भ्रांतियां हुईं।’

प्रस्तावना के मुताबिक मनुस्मृति के कुल 2,865 श्लोकों में से लगभग 56 फीसदी श्लोक मिलावटी हैं और किन्हीें डॉ. सुरेन्द्र कुमार के हवाले से बताया गया है कि उन्होंने इन 'मिलावटों’ को ध्यान में रखते हुए 1985 में एक 'विशुद्ध मनुस्मृति’ तैयार की है।

डॉ. केडी पालीवाल के मुताबिक,

'यदि यह विशुद्ध मनुस्मृति, डॉ. अम्बेडकर के लेखन से पहले, 1935 तक, अंग्रेजी में सम्पादित हो गई होती, और वर्णों की भिन्नता को अम्बेडकर स्वाभाविक मान लेते, तो मनुस्मृति का विरोध न होता (देखें, पेज 5)।

क्या यह कहना सही होगा कि डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति का गलत अर्थ लगाया था क्योंकि वह कथित तौर पर संस्कृत भाषा के विद्वान नहीं थे, जैसा कि डॉ. पालीवाल कहते हैं निश्चित ही नहीं। ऐसी बेबुनियाद बातें उस महान विद्वान तथा लेखक के बारे में कहना- जिसकी अपने निजी पुस्तकालय में हजारों किताबें थीं, जिन्होंने कानून के साथ-साथ अर्थशास्त्र की भी पढ़ाई की थी तथा जिन्होंने विभिन्न किस्म के विषयों पर ग्रंथनुमा लेखन किया- एक तरह से उनका अपमान करना है। अगर हम महज उनके द्वारा रची गई विपुल ग्रंथसम्पदा को देखें तो पता चलता है कि वह इस तरह अलग-अलग खंडों में बंटी है, जिसका प्रकाशन सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय की तरफ से किया गया है।

मनुस्मृति के बारे में डॉ. अम्बेडकर की अपनी समझदारी उनकी अधूरी रचना 'रेवोल्यूशन एण्ड काउण्टररेवोल्यूशन इन एन्शंट इंडिया’ ( प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति) में मिलती है। यहां इस बात का उल्लेख करना समीचीन होगा कि बुनियादी तौर पर उन्होंने इस मसले पर सात अलग-अलग किताबों की रचना करना तय किया था, मगर उस काम को वह पूरा नहीं कर सके थे। यह ग्रंथमाला डॉ. अम्बेडकर के इस बुनियादी तर्क के इर्दगिर्द संकेन्द्रित होनेवाली थी जिसके तहत उन्होंने बौद्ध धर्म के उभार को क्रांति माना था और उनका साफ मानना था कि ब्राह्मणों द्वारा संचालित प्रतिक्रांति के चलते अन्तत: बौद्ध धर्म की अवनति हुई।

डॉ. अम्बेडकर के मुताबिक मनुस्मृति एक तरह से  'हिन्दू समाज जिस भारी सामाजिक उथल-पुथल से गुजरा है उसका रेकार्ड है।’ वह उसे महज कानून की किताब के तौर पर नहीं देखते हैं बल्कि आंशिक तौर पर नीतिशास्त्र और आंशिक तौर पर धर्म के तौर पर भी देखते हैं। अब प्रबुद्ध समुदाय के एक हिस्से की मनुस्मृति के बारे में राय बदल रही हो, मालूम नहीं, लेकिन डॉ. अम्बेडकर इसके लक्ष्यों के बारे में स्पष्ट हैं और इसी वजह से मनुस्मृति को वह ''प्रतिक्रांति का दस्तावेज’ कहते हैं। इस बात की अधिक चर्चा नहीं हुई है कि किस तरह डॉ. अम्बेडकर ने -मनु जिसने नीत्शे को प्रेरित किया, जिसने फिर हिटलर को प्रेरित किया- इनके बीच के विचारधारात्मक अपवित्र लिंक को उजागर किया था।और यह बात भी आम है कि हिटलर और मुसोलिनी ने संघ और हिन्दु महासभा के मनुवादियों को प्रेरित किया- फिर चाहे सावरकर हों या मुंजें हो या हेडगेवार या गोलवलकर हों।

डॉ. अम्बेडकर के मुताबिक अपनी किताब 'एण्टी क्राइस्ट’ में नीत्शे ने मनुस्मृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी और यह भी कहा था कि वह तो महज मनु के रास्ते पर चल रहे हैं। 'जब मैं मनु की कानून की किताब पढ़ता हूं, जो अतुलनीय बौद्धिक और बेहतर रचना है, यह आत्मा के खिलाफ पाप होगा अगर उसका उल्लेख बाइबिल के साथ किया जाए। आप तुरंत अन्दाजा लगाएंगे कि उसके पीछे एक सच्चा दर्शन है, हर तरफ शैतान को सूंघनेवाला यहुदी आचार्यों और अंधश्रद्धा का घालमेल नहीं है- वह किसी तुनकमिजाज मनोविज्ञानी को भी सोचने के लिए कुछ सामग्री अवश्य देता है।’

अम्बेडकर ने इस बात पर जोर दिया था कि किस तरह नात्सी, 'अपनी वंश परम्परा नीत्शे से ग्रहण करते हैं और उसे अपना आध्यात्मिक पिता मानते हैं। नीत्शे की एक मूर्ति के साथ खुद हिटलर ने अपनी तस्वीर खिंचवाई थी; वह इस उस्ताद की पांडुलिपियां अपने खास संरक्षकत्व में रखता है; नीत्शे के लेखन के चुने हुए उद्धरणों को- नई जर्मन आस्था के तौर पर- नात्सी समारोहों में उद्धृत किया जाता है।’

अब इन तमाम विवरणों के बाद अब शायद मनु, नीत्शे, हिटलर और हिन्दुत्व वर्चस्ववादी फलसफे के बीच के रिश्तों को ढूंढना अब आसान हो जाए।

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