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भाजपा के दबाव में गठबंधन तोड़ा मायावती ने!

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hastakshep
07 Jun 2019
New Update
वर्तमान दलित राजनीति मुद्दाविहीनता का शिकार

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नई दिल्ली, 07 जून 2019 : जिस पार्टी को गठबंधन से ठीकठाक फायदा हुआ हो। ऐसा क्या हो गया कि उसकी मुखिया ने गठबंधन तोड़ दिया। वह भी दूसरी पार्टी में कमियां निकाल कर। यह वही बहुजन समाज पार्टी- Bahujan samaj party (बसपा) है जो गत लोकसभा चुनाव 2014 (Lok Sabha Elections 2014) में खाता भी न खोल पाई थी और इन चुनाव में 10 सीटें हासिल हो गई। फिर भी पार्टी की अध्यक्ष मायावती सपा कैडर यादवों पर भितरघात का आरोप लगा रही हैं। वह भी तब जब सपा को उसकी आधी ही सीटें मिली हैं। इसे क्या कहा जाए ?

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कहीं ऐसा तो नहीं है कि मायावती (Mayawati) आय से अधिक संपत्ति वाले केस में मोदी सरकार के दबाव में आ गई हैं। जो बसपा उप चुनाव नहीं लड़ती थी वह इस बार बड़े उत्साह से ये चुनाव लड़ने जा रही है, वह भी गठबंधन तोड़कर। तो यह माना जाए कि यह सब उप चुनाव में भाजपा को फायदा दिलाने के लिए हो रहा है।

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भले ही सपा और बसपा का गठबंधन (SP and BSP combine) लोकसभा चुनाव में कुछ करामात न कर पाया हो पर 2022 के विधानसभा चुनाव (2022 Uttar Pradesh assembly elections) में पासा पलटने से आशंकित भाजपा ने मायावती पर शिकंजा कस दिया हो।

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दो राय नहीं कि न केवल मायावती बल्कि उनके भाई आनंद ने उनके मुख्यमंत्रित्व काल में अकूत संपत्ति अर्जित की है। लोकसभा चुनाव में भी मायावती का भाजपा पर कम और कांग्रेस पर ज्यादा मुखर होना भी भाजपा का दबाव दिखाई दे रहा था।

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यदि लोकसभा चुनाव 2019 (Lok Sabha Elections 2019) में उत्तर प्रदेश के प्रदर्शन पर गौर करें तो सबसे अधिक फायदे में बसपा ही रही है। जहां अखिलेश यादव को दलित वोटबैंक के ट्रांसफर न होने पर नाराजगी जताते हुए नाराज होना चाहिए था, वहीं उल्टे मायावती ने उनकी पार्टी की कमी निकाल दी।

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इन परिस्थितियों में मायावती का सपा पर आक्रामक होना अखिलेश यादव का जरूरत से ज्यादा लचीला रवैया अपनाना रहा है।

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होना यह चाहिए था कि जब मायावती ने सपा के कट्टर वोटबैंक यादवों पर भितरघात का आरोप लगाकर अपने दम पर विधानसभा चुनाव उप चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। तभी अखिलेश यादव को अपने वोटबैंक का बचाव करते हुए मायावती पर आक्रामक हो जाना चाहिए था। अभी भी विधानसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन की आस उन्होंने नहीं छोड़ी है।

बात लोकसभा चुनाव में बसपा और सपा के वोट की करें तो उत्तर प्रदेश में जिन 10 सीटों पर बसपा को जीत मिली है, उनमें से 6 सीटें हैं ऐसी हैं जहां समाजवादी पार्टी गत लोकसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर रही थी। इसे अखिलेश यादव की दरियादिली कहें या फिर राजनीति का कम अनुभव कि उन्होंने ये सभी सीटें बसपा के खाते में डाल दी। ये सब सीटें मुस्लिम और यादव वोटबैंक से प्रभावित रही हैं, जो सपा का माना जाता है।

जमीनी हकीकत यह है कि भले ही मायावती गठबंधन के खराब प्रदर्शन के लिए समाजवादी पार्टी और उसके यादव वोटबैंक को ठहरा रही हों पर गठबंधन ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में भी सबसे अधिक फायदा बसपा को ही मिला है।

एक बसपा ही पार्टी है, जिसकी सीटें इन चुनाव में अन्य पार्टियों की अपेक्षा बढ़ी हैं। सपा उतनी ही और भाजपा और कांग्रेस को गत लोकसभा चुनाव से कम सीटें मिली हैं।

गठबंधन होते ही भाजपा को रोकने के लिए समाजवादी कार्यकर्ता पुराने गिलवे-शिकवे भूल गये थे। बसपा का सपा से दोगुनी सीटें लेने का मतलब यह है कि समाजवादियों का पूरा वोटबैंक बीएसपी को ट्रांसफर हुआ है। जबकि दूसरी ओर चुनाव परिणाम आने के बाद समाजवादी पार्टी के नेताओं को ऐसे भी कई पत्र मिले हैं, जिनमें अंदरूनी रूप से सपा को वोट न देन की बात कही गई थी। इसे गेस्ट हाउस कांड का बदला लेना बताया जा रहा था।

2017 के विधानसभा चुनाव में जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा का रिकार्ड अच्छा रहा। उस क्षेत्र में अखिलेश यादव ने बसपा और रालोद सीटें दे दी। जिसका परिणाम यह रहा कि बिजनौर सीट पर बीएसपी के मलूक नागर चुनाव जीते। जबकि गत लोकसभा चुनाव में वह तीसरे स्थान पर रहे थे।

ऐसे ही नगीना सीट से बसपा के गिरीश चंद्रा चुनाव जीते, जो गत लोकसभा चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे थे। दोनों सीटों पर जाट, यादव और मुस्लिम मतदाताओं की वजह से बसपा ने जीत मानी गई।

ऐसी ही स्थिति अमरोहा, श्रावस्ती, लालगंज, गाजीपुर की भी रही। गत लोकसभा चुनाव में यहां पर समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन बसपा से बेहतर था। इस बार गठबंधन का पूरा वोट बसपा के खाते में चला गया।

मायावती वही कर रही हैं जिसके लिए वह जानी जाती हैं। अखिलेश यादव गलत फहमी में हैं कि बहन जी उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना देंगी।

दरअसल मायावती दलितों के वोटबैंक के बल पर सत्ता की मजा लूटती आई हैं। यही वजह रही कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में युवा दलित नेता के रूप में उभर कर आये चंद्रशेखर आजाद को वह पचा नहीं पा रही हैं।

यह वही मायावती हैं जो कभी उप चुनाव नहीं लड़ती हैं। 2018 में जब फूलपुर और गोरखपुर के बाद कैराना उपचुनाव हुआ तब भी मायावती ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे। गठबंधन में मायावती ने अखिलेश यादव को कई बार राजनीति में बच्चा बताया। मतलब वह उन्हें नौसीखिया साबित करने की कोशिश कर रही थी। ऐसे में उन्हें मुख्यमंत्री बनने में कैसे सहयोग करेंगी।

राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी नरेद्र मोदी और अमित शाह लंबा खेल खेल रहे हैं। उन्हें आने वाले समय में ममता बनर्जी और मायावती से खतरा महसूस हो रहा है। इसलिए वह इन दोनों को पूरी तरह से घेरने में लगे हैं।

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