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जानिए, क्यों हो सकती है उत्तर प्रदेश में मायावती की वापसी?

 

संदीप पाण्डेय      

 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव से छह माह पहले ऐसा माना जा रहा था कि मुकाबला बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच होगा। किंतु भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष दया शंकर सिंह द्वारा बसपा प्रमुख मायावती को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी से भाजपा को नुकसान हुआ। इस समय प्रदेश में सत्तसीन समाजवादी पार्टी दौड़ से बाहर दिखाई पड़ रही थी।

        फिर एक नाटकीय घटनाक्रम के चलते अखिलेश यादव ने अपने आप को पूर्ण मुख्यमंत्री और पार्टी के सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित कर लिया। पहले लोग कटाक्ष करते थे कि उत्तर प्रदेश में साढ़े चार मुख्यमंत्री हैं, जिसमें अखिलेश को सिर्फ आधा ही माना जाता था। बाकी चार थे उनके पिता मुलायम सिंह यादव, उनके चाचा शिवपाल यादव, उनके दूसरे चाचा राम गोपाल यादव व पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान।

ऐसा माना जा रहा था कि चूंकि मुलायम सिंह सार्वजनिक रूप से शिवपाल के साथ खड़े थे, इसलिए अखिलेश और शिवपाल के बीच चुनने की बात आई तो पार्टी कार्यकर्ता शिवपाल के साथ रहेंगे। किंतु अखिलेश इन अटकलों को गलत साबित करते हुए आज सपा की ओर से मुख्य मंत्री पद के निर्विरोध व मजबूत दावेदार हैं और शिवपाल ही नहीं मुलायम भी हाशिए पर पहुच गए हैं। इस तरह एक सत्तीसीन मुख्य मंत्री ने मौन तख्तापलट कर अपने को सभी प्रकार के दबावों से मुक्त कर लिया है।

        जनता में एक संदेश यह गया कि यह सारा नाटक मुलायम सिंह द्वारा बड़ी कुशलतापूर्वक निर्देषित किया गया जिससे उनके पुत्र के लिए पार्टी के अंदर व बाहर से आ रही सभी चुनौतियों को समाप्त किया जा सके। अखिलेश अपनी सबको खुश करने वाली लेकिन कमजोर छवि से उबर कर एक परिपक्व नेता के रूप में उभरे हैं।

दूसरा इस नाटक को चूंकि संचार माध्यमों ने काफी जगह दी तो अपने प्रतिद्वंदी द्वारा आपार धन खर्च कर किए जा रहे प्रचार अभियान का भी उन्होंने मुकाबला किया।

        इस विवाद के बीच ही अखिलेश के कई बार कहा कि यदि सपा और कांग्रेस का गठबंधन होता है तो वे आसानी से तीन सौ से ऊपर सीटें ला सकते हैं।

आमतौर पर एक बड़ी पार्टी किसी छोटी पार्टी से गठबंधन की बात नहीं करती। अब इसके पीछे रणनीतिकार प्रशांत किशोर थे अथवा उनकी यह समझ कि उनके साथ आने से मुस्लिम के लिए बसपा के बजाए उनको चुनना आसान हो जाएगा, अखिलेश यादव व राहुल गांधी ने गठबंधन कर ही लिया।

        अब भाजपा तीसरे स्थान पर पहुंच गई। सवाल सिर्फ यह रह गया कि पहले स्थान पर बसपा रहेगी अथवा सपा-कांग्रेस गठबंधन। मुसलमानों ने इस दफा भाजपा को हराने के लिए बसपा को चुना है। सपा में चल रही उठापटक और आखरी समय तक गठबंधन की स्थिति स्पष्ट न होने से उसे नुकसान हुआ है।

मायावती ने भी मुसलमानों को साथ लेने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा है कि इस बार सरकार बनाने के लिए वे भाजपा का साथ नहीं लेंगी। सम्भव है कि यदि बसपा को सरकार बनाने के लिए पूर्ण बहुमत न मिले तो कांग्रेस सपा के साथ अपना गठबंधन तोड़ बसपा को समर्थन दे दे।

राहुल गांधी कह चुके हैं कि वे मायावती का दलित नेता के रूप में सम्मान करते हैं।

       सपा-कांग्रेस गठबंधन से ज्यादा बसपा के जीतने की सम्भावना इसलिए है कि सपा के खिलाफ यह आरोप है कि उसने मुज्जफरनगर दंगों को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जिसमें मुसलमानों को निशाना बनाया गया।

अखिल भारतीय मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलीमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि गुजरात 2002 और मुज्जफरनगर 2013 में कोई अंतर नहीं था। करीब 50,000 मुसलमानों को मुज्जफरनगर इलाके में दंगों के दौरान अपने गांव छोड़ने पड़े जहां आज तक वे लौट पाने की स्थिति में नहीं हैं।

        अखिलेश यादव साम्प्रदायिक और आपराधिक घटनाओं को रोक पाने में असफल रहे जिनमें से कुछ में तो उनकी सरकार के मंत्री तक शामिल थे। इस तरह कानून और व्यवस्था बनाए रखने के मामले में वे नाकाम रहे। हां, घटना घट जाने के बाद पीडि़तों को दिल खोल मुआवजा देने में वे बड़े मुस्तैद दिखाई पड़े। उन्हें इतिहास में मुआवजा मुख्य मंत्री का खिताब दिया जाएगा। यहां तक कि उन्होंने ऐसे-ऐसे लोगों को दिल-खोल कर सम्मानित किया जो उन्हीं की सरकार के आदेषों की धज्जियां उड़ा रहे थे। लखनऊ के सबसे बड़े व्यवसायिक विद्यालय सिटी मांटेसरी ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत अपने विद्यालय में गरीब बच्चों के दाखिले के आदेश की खुलकर अवहेलना की और उ.प्र. सरकार ने विद्यालय की माल्किन भारती गांधी को रानी लक्ष्मी बाई पुरस्कार से नवाजा।

2015-16 में न्यायालय के ओदश के बाद सिटी मांटेसरी ने 31 बच्चों, जिनके दाखिले का आदेश हुआ था, में से 13 वाल्मीकि बच्चों को दाखिला दिया और 2016-17 में 58 बच्चों को दाखिला देने से फिर मना कर दिया।

        दूसरी तरफ भाजपा से लोग नोटबंदी के कारण काफी नाराज हैं।  उ.प्र. कोई गुजरात नहीं, जहां लोगों के पास कोई विकल्प नहीं और वे नरेन्द्र मोदी को चुपचाप सहने के लिए तैयार हों।

उ.प्र. में रु. 500 व 1000 के नोट बंद हो जाने से बैंकों के बाहर लम्बी कतारों और बार-बार बैंकों के चक्कर लगाने से लोगों को अपमान सहना पड़ा है। फिर नोटबंदी से जो हासिल होना था – काले धन पर रोक, आदि, वह कुछ हुआ नहीं।

नरेन्द्र मोदी, उनकी पार्टी और उनके मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मुस्लिम विरोधी भूमिका जग जाहिर है। फिर नरेन्द्र मोदी की यूनाइटेड अरब अमीरात व कतर के अमीरों से खास नजदीकी कुछ संदेह खड़े करती है।

        उ.प्र. में अखिलेश यादव व केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के मामूली उपलब्धियों वाले शासन के परिणामस्वरूप जनता मायावती को मौका देना चाहती है। मायावती ने पूर्व में दिखाया है कि कानून और व्यवस्था ही नहीं बल्कि साम्प्रदायिक हिंसा पर भी वे कड़ा रुख अपनाती हैं। यह बात आज मायावती के पक्ष में जा रही है और वे सरकार बना पाने की सबसे मजबूत दावेदार नजर आ रही हैं।

 

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