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मॉब लिंचिंग को दुर्घटना साबित करने पर आमादा है योगी पुलिस

लखनऊ, 5 अक्टूबर 2017।  उत्तर प्रदेश में अब मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर पुलिस पर्दा डाल कर दुर्घटना साबित करने पर तुली रहती है। जबकि योगी सरकार में बुलंदशहर से लेकर शाहजहांपुर तक मॉब लिंचिंग जारी है।

यह गुज़री 19 सितम्बर की घटना है। मोटरसाइकिल सवार नबी अहमद पुत्र सलामत और अजमत उल्ला पुत्र सलीमुल्ला निवासी ग्राम गौसनगर क़स्बा, थाना जलालाबाद, शाहजहांपुर शाम 6 बजे कटरा से लौट रहे थे। तभी साइकिल सवार ग्राम अतिवारा निवासी सुनील पुत्र ध्यानपाल अचानक उनके सामने आ गया और तीनों गिर गए। अपना इलाका होने के चलते सुनील की आवाज़ पर आसपास के चार-पांच लोग लाठी-डंडे से लैस होकर आ धमके और उन्होंने बिना कुछ जाने-समझे दाढ़ी-टोपी के आधार पर सांप्रदायिक गालियां बकते हुए मोटर साइकिल सवारों को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। भीड़ भी तमाशबीन बनी रही। आख़िरकार,उन्हें 108 नंबर एम्बुलेंस से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, नगरिया जलालाबाद और फिर वहां से जिला अस्पताल ले जाया गया। नाजुक हालत के चलते नबी अहमद को बरेली के सिद्धि विनायक अस्पताल रेफर कर दिया गया जहां उनकी मृत्यु हो गई।

अगले दिन 20 सितम्बर को शरीफ अहमद पुत्र नबी अहमद ने थाना प्रभारी, जलालाबाद को इसकी लिखित सूचना देनी चाही लेकिन प्रभारी ने उसे लेने से इनकार कर दिया। उल्टे शिकायतकर्ता पर दबाव बनाया और अपने मन से लिखी दूसरी तहरीर पर उसका हस्ताक्षर भी ले लिया जिसमें मोटरसाइकिल सवारों पर हुए इरादतन और घातक हमले का कोई वर्णन नहीं था। इसमें वारदात को सामान्य सड़क दुर्घटना का रूप देने की कोशिश की गई। इसी तहरीर के आधार पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 279, 337, 338, 304ए, 427 के तहत सुनील और चार अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।

यह अलग बात है कि अस्वीकार कर दी गई मूल तहरीर और पोस्टमार्टम रिपोर्ट असली कहानी बयां करती है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि नबी अहमद के सर और शरीर के दाईं ओर की सभी अंतड़ियों टूटी हुई पाई गईं। छाती पर 29 सेंटीमीटर लंबे और 17 सेंटीमीटर चौड़े नीले पड़ गए निशान के अलावा चेहरे, घुटनों और कोहनियों पर कई चोटें मिलीं। दूसरे मोटरसाइकिल सवार अजमत उल्ला को भी गंभीर चोटें आईं। घटना के दस दिन बाद भी अजमतुल्ला बिस्तर से नहीं उठा सके हैं, पसलियों पर लगी गंभीर चोटों के दर्द से बेहाल हैं।

मतलब कि पहली तहरीर में दर्ज आरोप प्रथम दृष्टया सही नज़र आते हैं जिसमें इरादतन लाठियों से मोटरसाइकिल सवारों पर हमला करने और जान से मारने की कोशिश करने की बात है। इस आधार पर आरोपियों के खिलाफ भ।द।स। की धारा 302 लगाया जाना अनिवार्य था। लेकिन दूसरी तहरीर के आधार पर दर्ज प्राथमिकी में तथाकथित सड़क दुर्घटना को अंजाम देने में सुनील के अलावा बाकी चार व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट नहीं है।

यह प्राथमिकी पूरे मामले को पलटने और आरोपियों को बचाने की चालाकी भरी कोशिश है। पुलिस की मंशा साफ़ है कि आरोपी सुनील और उसके हमलावर साथियों की जगह मृत मोटरसाइकिल चालक नबी अहमद को ही अपराधी साबित कर दिया जाए। यह असली कहानी को दबाने, झूठी और कमज़ोर कहानी के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने और इस तरह आरोपियों को संरक्षण देने का सीधा मामला है।  



जलालाबाद का दौरा करने के बाद अवामी कौंसिल के महासचिव असद हयात कहते हैं कि वाहनों के टकरा जाने की घटनाएं होती रहती हैं। इस पर कहासुनी या गाली-गलौच भी हो जाती है और जो कभी मारपीट में भी बदल जाती है। लोग भी बीच-बचाव करने पहुंच जाते हैं। ऐसा बहुत कम होता है कि हिंसा पाशविकता का रूप धर ले। दुर्भाग्य से इस मामले में यही हुआ। पीड़ितों की दाढ़ी-टोपी ने उनके मुसलमान होने की पुष्टि कर दी और बस इसी आधार पर हमलावर उन्हें सांप्रदायिक गालियां बकते और ललकारते हुए उन पर टूट पड़े। जैसे कि मुसलमान की यह हिम्मत कि हमसे टकरा जाये?

पिटाई से दोनों बेहोश हो गए। लगभग 6 घंटे बाद बरेली अस्पताल में नबी अहमद की मृत्यु हो गयी और गंभीर रूप से घायल अज़मत को कई दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिली। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार नबी अहमद के जिस्म पर 11 चोटें पायी गयीं। सुनील को मामूली चोट आई। उसकी और उसके साथियों की अभी तक गिरफ़्तारी नहीं हुई है।

उन्होंने कहा कि लाठियों से दोनों मुसाफिर बेतरह पिटे और एक का तो इलाज के दौरान दम ही टूट गया। लेकिन पुलिस ने योगी सरकार और अपना भी रिकार्ड अच्छा रखने के लिए धारा 304 ए (गैर इरादतन क़त्ल) के अंतर्गत मुक़दमा दर्ज किया,302 के अंतर्गत नहीं।

मृतक नबी अहमद के परिजनों और घायल अजमतउल्ला से मिलने के बाद रिहाई मंच के नेता राजीव यादव ने कहा कि नबी अहमद को जितनी क्रूरता से सांप्रदायिक तत्वों ने अपना शिकार बनाया उससे कहीं अधिक क्रूरता का परिचय पुलिस ने दिया। इस वीभत्स घटना को मामूली दुर्घटना की शक्ल दी और उससे कहीं ज्यादा योगी सरकार के इस दावे को बनाए रखने का आपराधिक झूठ रचा कि सूबे में मॉब लिंचिंग का कोई मामला नहीं हुआ। नबी अहमद की लाश के फोटोग्राफ और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता लगता है कि उसके साथ वहशियाना सुलूक हुआ। पुलिस ने इस बर्बरता के पीछे खड़ी सांप्रदायिक नफ़रत की जानबूझ कर अनदेखी की। उसे बताना होगा कि मामूली घटना में इतनी उग्र प्रतिक्रिया भला कैसे हो सकती है।

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