हारे हुए राष्ट्रविरोधी राष्ट्रवाद की हुंकार भर रह गए हैं मोदी

Modi go back

हारे हुए राष्ट्रवाद की हुंकार भर रह गए हैं मोदी जी। मोदी-शाह गिरोह जिस राष्ट्रवाद को इस चुनाव के केंद्रीय विमर्श में लाने के लिए यहाँ वहां फिफियाये घूम रहा है उसका चरित्र राष्ट्रविरोधी राष्ट्रवाद‘ का उभर कर सामने आ रहा है।

बीते पांच साल से सत्ता के शीर्ष पर बैठे नरेंद्र मोदी के भाषणों में जिन विषयों को वरीयता दी जा रही है उनका ठीक से विश्लेषण करने पर आप पाएंगे कि वे देश की अधिकांश आबादी के बड़े सरोकारों की उपेक्षा के उपाय हैं।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि आतंकवाद और उसको पाकिस्तान की पनाह भी भारत की एक समस्या है लेकिन ऐसा कोई कारण नहीं है कि सिर्फ इस बात के लिए हाहाकार मचाती बेरोजगारी और मंहगाई को अनदेखा कर दिया जाए या नोटबन्दी और जीएसटी के अपरिपक्व फैसलों से हुई तवाही से मुंह मोड़ लिया जाए !

पाक व आतंक के रिश्ते का हौवा इसलिए खड़ा किया जाए कि उसकी आढ़ में जनता दिनों दिन दुर्गति की खाई में धकेल दी जाए और अडानी-अम्बानियों एवं बीजेपी नेताओं के खजाने दिन दूने रात चौगुने भरते चले जाएं !

सर्वोपरि इस राष्ट्रवाद के राष्ट्रद्रोही चरित्र को यूँ भी देखिये कि देश के नागरिकों के बीच इसने वैमनस्य को बढ़ाया है और राष्ट्रद्रोह के कानून का हद दर्जे दुरुपयोग करते हुए सरकार की असफलता पर ऊँगली उठाने वाले हर शख्स को देशद्रोही कहकर आधी से ज्यादा आबादी को देशविरोधियों की श्रेणी में रख दिया है।

जो राष्ट्रवाद राष्ट्र के नागरिकों को एकता के सूत्र में बांधने की जगह बिखराव का रास्ता दिखाये, जो राष्ट्रवाद अपने नागरिकों में समता न्याय और समृद्धि की बजाय उनके शोषकों को पोषित करे, नरेन्द्र मोदी उस राष्ट्रवाद की आवाज हैं और अब जबकि देश उनसे 2014 के वायदों का हिसाब मांग रहा है नरेंद्र मोदी ज्यादा शातिराना तरीके से उसी राष्ट्रवाद की आड़ में छुप रहे हैं क्योंकि देश के लोग समृद्ध नागरिकों के साथ समृद्ध भारत चाह रहे हैं।

राष्ट्रविरोधी राष्ट्रवाद पराजित हो रहा है और नरेंद्र मोदी की चीख पुकार उसी का आर्तनाद है ।

मधुवन दत्त चतुर्वेदी