भारतीय संविधान के जनाजे को ढोने वाले मोदी जी लोकतंत्र की चिता सजाने की तैयारी में !!!

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पिछले तीन दिनों के भीतर तीन बड़ी घटनाएं तीन अलग-अलग सूबों में हुई हैं। भोपाल में सिमी सदस्यों का फर्जी एनकाउंटर। दिल्ली में पूर्व सैनिक राम किशन ग्रेवाल की खुदकुशी और उसके विरोध से निपटने का पुलिस का तानाशाही रवैया। और लखनऊ में मानवाधिकार कार्यकर्ता राजीव यादव पर बर्बर पुलिसिया हमला।

तीनों घटनाएं अलग-अलग होते हुए भी एक ही तरह के संकेत दे रही हैं। और वो संकेत बहुत गहरे हैं। अगर हम और आप उसे देखने और समझने की कोशिश करें।

आम दिनों में क्या यह संभव है कि एक मुख्यमंत्री को उसके ही सूबे में हिरासत में ले लिया जाए और 8 घंटे बैठाए रखा जाए?

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी के नेता को दो-दो बार हिरासत में लेकर एक थाने में डाल दिया जाए? और थाने में एक कांस्टेबल उससे जुबान लड़ाए? उसकी गिरफ्तारी भी एक सामान्य बस में हो।

आपातकाल में भी ऐसा नहीं हुआ था। और तमाम बदले के मंसूबों के बावजूद जनता सरकार भी इंदिरा गांधी के साथ ऐसा नहीं कर सकी थी। लेकिन मोदी साहब वह सब कुछ कर रहे हैं, जो आज तक किसी ने भारतीय राजनीति में सोचा भी नहीं होगा। उन्होंने संविधान को ताख पर रख दिया है। और अब उन्होंने तंत्र को अपनी मर्जी से चलाने का फैसला ले लिया है।

दरअसल यह एक बड़ी घटना को दबाने के लिए उससे बड़ी घटना कर देने की रणनीति का हिस्सा है।

सर्जिकल स्ट्राइक का असर कम होता दिखे, तो भोपाल एनकाउंटर कर दो। एनकाउंटर का पर्दाफाश होता दिखे, तो दिल्ली की एक सामान्य घटना को असामान्य बना दो।

ये सब घटनाएं उन्हें किसी भी तरीके से नुकसान नहीं पहुंचाती हैं, क्योंकि ये उनके बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं। लिहाजा उसमें मददगार साबित हो रही हैं।

दरअसल ये पूरे देश और समाज को एक हिंसक रास्ते पर ले जाना चाहते हैं।

इनका मकसद देश में नफरत, घृणा, द्वेष और हिंसा का ऐसा माहौल बनाना है। जिससे समाज भीतर से अनगिनत खांचों और हिस्सों में बंट जाए। और फिर इतना कमजोर हो जाए कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता ही खत्म हो जाए। फिर इनके लिए अपने मनमुताबिक काम करना आसान हो जाएगा।

कुछ लोग अगर विरोध करते हैं। तो उन्हें इतना डरा दिया जाए कि वो विरोध के बारे में सोचना बंद कर दें। राहुल गांधी और केजरीवाल की गिरफ्तारी को इसी नजरिये से देखने की जरूरत है। इसके जरिये यह संकेत दिया जा रहा है कि अगर इनके साथ ऐसा सलूक किया जा सकता है। तो आम आदमी यानी हमारी और आपकी क्या विसात है?

अनायास नहीं सरकार और पुलिसिया तंत्र के आगे दूसरी सभी संस्थाएं बौनी दिख रही हैं। कहीं से कोई आवाज नहीं उठ रही है।

भोपाल जैसे प्रथम दृष्ट्या फर्जी एनकाउंटर पर सब मौन साधे हुए हैं। एनआईए और मानवाधिकार आयोग सरकार के तोते हैं। कुछ दिनों बाद वहां से मनचाही रिपोर्ट आ जाएगी। फिर सारा मामला रफा-दफा।

सर्वोच्च न्यायिक संस्थाओं ने इतने बड़े अन्याय को अपनी खुली आंखों से देखा है। मजाल क्या कि वो मामले का संज्ञान ले लें।
देश भर में एक उन्माद का माहौल पैदा किया जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि समाज को सांप्रदायिकता के चरस में डुबो दिया जाए।

अनायास नहीं सच, झूठ और न्याय-अन्याय के बीच की लकीरें मिटती जा रही हैं।

राष्ट्रवाद को पहले देश तक लाया गया। फिर सरकार तक। और अब एक व्यक्ति पर लाकर सीमित कर दिया गया है। मोदी के विरोध का मतलब है राष्ट्रदोह।

अगर अभी भी किसी को कुछ असामान्य नहीं दिख रहा है। तो उसे जरूर अपनी मनःस्थिति के बारे में विचार करना चाहिए।
भारतीय संविधान के जनाजे को ढोने वाले मोदी जी लोकतंत्र की चिता सजाने की तैयारी में हैं। इसको लेकर किसी को भ्रम नहीं रहना चाहिए।
आमतौर पर माना जा रहा था कि यह सब कुछ कार्यकाल के आखिरी दौर में होगा। वह भी चुनाव जिताने के लिए या फिर देश को चुनाव से दूर ले जाने के लिए। लेकिन बीच मझधार में सरकार का यह रौद्र प्रदर्शन कुछ बड़े खतरनाक संकेत दे रहा है। हालांकि वह क्या होगा? कैसा होगा? किस रूप में होगा? इसके बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। लेकिन यह सौ फीसद सच है कि वह लोकतंत्र का गला घोंटने वाला होगा।

राष्ट्रवाद अंधराष्ट्रवाद के रास्ते फासीवाद की तरफ बढ़ेगा।

आपातकाल तो बगैर घोषणा के ही लागू है। अब उसे फांसीवाद की सीढ़ी के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा।

राजीव यादव वाली घटना बहती गंगा में हाथ धोने जैसा है।
राजीव सूबे की सरकार और उसकी पुलिस की आंख की किरकिरी बने हुए थे। और भोपाल एनकाउंटर ने उन्हें सबक सिखाने का मौका दे दिया।
सपा के मौलाना मुलायम से उदार हिंदू अखिलेश में हुए इस बदलाव को समझने की जरूरत है। और आखिरकार ये घटनाएं बीजेपी के बड़े प्रोजेक्ट में मददगार साबित होती दिख रही हैं।

रही-सही कसर एनडीटीवी पर एक दिन की पाबंदी लगाकर पूरी कर दी गई है। मोदी जी ने अभी कल ही मीडिया की साख गिरने पर चिंता जताई थी। और आपातकाल को हर दिन याद करने की नसीहत दी थी।

अब पाबंदी आपातकाल को याद करने के लिए लगाई गई है। या फिर इसे आहट के तौर पर देखा जाए। तय करना आपको है।

लेकिन सच यही है कि आपातकाल को छोड़कर आजादी के बाद किसी सरकार की मीडिया को इस तरह से निर्देशित करने की हिम्मत नहीं पड़ी। अगर कोई फिर भी अघोषित आपातकाल की बात से इनकार करे तो फिर उसकी बुद्धि की बलिहारी ही है।
लेकिन एक जगह संघ और मोदी गफलत में हैं।
यह बात किसी से नहीं छुपी है कि उनके राजनीतिक पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी नहीं की थी। डर इस कदर था कि माफीनामा और समर्पण ही उनका इतिहास है। आपातकाल तक में उनका यही रवैया था।

इन डरे हुओं को ताकत सत्ता देती है, वरना उनका जीवन छुपने, भागने, मांफी मांगने और समर्पण में ही बीता है। और दूसरी तरफ आजादी की लंबी विरासत है। और उससे प्रेरणा लेने वाले लोग हैं। और वो देश और लोकतंत्र के सामने किसी भी संकट पर अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए तैयार हैं। वो किसी रहमोकरम के मोहताज भी नहीं हैं। और उन्हें किसी सत्ता और उसकी गोली से डराया भी नहीं जा सकता है।

महेंद्र मिश्र

दिग्विजय का मोदी पर प्रहार- मोदी जी का महात्मा गॉंधी प्रेम तो केवल मुखौटा है |

Modi ji, who carries the funeral pyre of the Indian Constitution, is preparing to decorate the pyre of democracy.