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मोदी जी, आप देश की भी सरकार चला रहे हैं और जम्मू- कश्मीर की भी, सवालों के जवाब तो देने ही पड़ेंगे

कृष्ण प्रताप सिंह

खुश-खुश पश्चिम एशिया गये प्रधानमंत्री खुश-खुश वापस आ गये हैं। ट्वीट करके बता रहे हैं कि वहां उनका ऐसा भावभीना आतिथ्य सत्कार हुआ कि भुलाये नहीं भूलने वाला। 'भक्त' कह रहे हैं कि संयुक्त अरब अमीरात के अबू धाबी में एक मन्दिर का शिलान्यास करके उन्होंने वहां भारत की ऐसी धमक पैदा कर दी है कि इस यात्रा की बाबत उनसे कुछ और पूछने की जरूरत ही नहीं है। इन भक्तों को मालूम है कि पूछने और बताने की परम्परा में प्रधानमंत्री का महज इतना ही विश्वास है कि वे महीने के आखिरी रविवार को रेडियो पर और कभी-कभी भाषणों वगैरह में अपने मन की कुछ बातें बता देते हैं। कोई 'कुछ और' पूछने चले, चाहे संसद में, चाहे उसके बाहर, तो उस पर ऐसे हमलावर होते हैं जैसे उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम कर देना चाहते हों।

याद कीजिए, अभी कुछ ही दिन पहले देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद आये धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कुछ 'नागवार' पूछ लिया था तो प्रधानमंत्री ने कैसे घुड़ककर चुप करा दिया था उसे। यह तोहमत लगाकर कि देश अभी तक उसके पापों की सजा भुगत रहा है। सोशल मीडिया कुछ भी कहे, उनके कहे में कम से कम इतनी सच्चाई तो थी कि उस पार्टी के पापों ने न सही, काहिली ने उन्हें देश का सोलहवां प्रधानमंत्री बनाया है।

यह विश्वास करने के भी कारण हैं कि प्रधानमंत्री ने यह रास्ता बहुत 'सोच-समझकर' चुना है। वे जानते हैं कि देश में हर 'ऐरे-गैरे’ को सवाल पूछने की आजादी मयस्सर हो जायेगी और वे हर सवाल को कान देने लगेंगे तो होगा कई नाशुक्रे यह पूछने से भी नहीं चूकेंगे कि जब वे देश में नहीं थे, उनकी पार्टी की गोवा सरकार में टाउन एंड कंट्री प्लानिंग मंत्री विजय सरदेसाई ने एक बिजनेस फेस्ट में यह क्यों कहा कि उत्तर भारतीय पर्यटक, जो पर्यटक नहीं, 'धरती की गन्दगी' हैं, गोवा में हरियाणा या कि दूसरा गुड़गांव बना देना चाहते हैं? क्या अब देश में कोई ऐसी व्यवस्था प्रस्तावित की जाने वाली है, जिसमें बोलने व लिखने यानी अभिव्यक्ति की आजादी की तरह कहीं आने-जाने और घूमने-फिरने की आजादी पर भी पहरे लगेंगे, ताकि गोवा जैसे साफ-सुथरे पर्यटन स्थल हाईप्रोफाइल या टॉप एंड पर्यटकों के लिए 'चमचमाते' रह सकें?

ठीक है कि लोगों को पता चल चुका है कि प्रधानमंत्री के कई मंत्रियों को जब भी और जिसको भी उनका मन हो, पाकिस्तान भेजने की धमकी या सलाह देने की लत लगी हुई है। इतना ही नहीं, जो भी तर्क या विवेकसम्पन्न प्राणी सरकारी रीति-नीति से जरा-सी भी असहमति जताता है, जानें कहां से मोटरसाइकिल पर सवार हत्यारे उसे महाप्रयाण पर भेजने के लिए आ धमकते हैं और सरकारें तमाम द्रविड़ प्राणायाम करके भी कानून के लम्बे हाथों को उन तक नहीं पहुंचा पातीं। सो, वे इस सबकी बाबत नहीं पूछेंगे। लेकिन यह तो पूछेंगे ही कि क्यों गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने 'बड़े मियां तो बड़े मियां' वाले मुहावरे को पलटकर खुद को उत्तर भारतीयों से घृणा करने वाले अपने मंत्री से 'बड़ा' सिद्ध कर डाला!

जिन पर्रिकर ने रक्षामंत्री रहते कभी अपना कोई डर अभिव्यक्त नहीं किया, मुख्यमंत्री बनते ही लड़कियों (गौर कीजिए, लड़कों नहीं, सिर्फ लड़कियों) के बीयर पीना शुरू करने से डरने लगे? और क्यों उनके इस आशय के बयान के बाद बहुत-सी लड़कियां सोशल मीडिया पर बियर पीते हुए खींची अपनी तस्वीरें डालने लगीं? फिर ऐसा क्या हुआ कि जिन युवाओं को प्रधानमंत्री बड़े-बड़े सपने (आप चाहें तो 'सब्जबाग' कह लें) दिखाते नहीं अघाते, पर्रिकर ने उन्हें कड़ी मेहनत से जी चुराने और लोवर डिवीजन क्लर्क की नौकरियों की कतारें लंबी करने वाला करार दे डाला? वे उन्हें आलसी और कामचोर नहीं तो और क्या सिद्ध करना चाहते थे? अब हमारे युवक ऐसे ही कामचोर हैं, तो पकौड़ा बनाने को कौशल विकास का हुनर साबित करने से भी उन्हें क्या हासिल होगा? मध्य प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल का यह कथन कैसे सार्थक होगा कि पकौड़ों के धंधे में शुरू के दो साल तक भले ही कम सफलता मिले, तीसरे साल पकौड़े वाला रेस्तरां और आगे जाकर होटल का मालिक बन सकता है?

फिर इस तरह सवाल में से सवाल निकलते गये तो क्या प्रधानमंत्री व उनकी सरकार की नाकामी तक नहीं जा पहुंचेंगे? युवक सरकार से यह नहीं पूछेंगे कि निभा नहीं सकती थी तो उसने हर साल दो करोड़ नौकरियों का वायदा किया ही क्यों था? दो साल तक पकौड़े बेचकर कोई रेस्तरां का मालिक बन सकता है तो पीढ़ियों से रेहड़ियों-पटरियों पर ऐसा करने वाले अब तक प्रधानमंत्री जैसे सूटेड-बूटेड क्यों नहीं हो गये?

तब तो यह सवाल भी बनेगा ही कि पकौड़े बनाने और बेचने के कौशल विकास से युवाओं का भविष्य निर्माण हो सकता है तो आगे सरकार का तमाम शिक्षण संस्थानों पर चाय-पकौड़ा निर्माण प्रशिक्षण केंद्रों को तरजीह देने का इरादा है या नहीं? कौन जाने, इसके जवाब में प्रधानमंत्री हां कह दें तो कोई सुझाव देने लगे कि उन्हें मौसम के पूर्वानुमान के लिए उपग्रहों आदि वैज्ञानिक साधनों व उपायों पर निर्भर करने के बजाय मध्यप्रदेश के सीहोर से विधायक रहे भाजपा नेता रमेश सक्सेना की इस सीख का प्रचार करना चाहिए कि अगर किसान हर गांव में प्रतिदिन एक घंटा हनुमान चालीसा का पाठ कर लिया करें तो बेमौसम बारिश और ओलों के प्रकोप से बच सकते हैं!

सवालों का सिलसिला और बढ़ा तो कोई आगे बढ़कर यह भी क्यों नहीं पूछने लगेगा कि प्रधानमंत्री जी, जब आप पश्चिम एशिया यात्रा की खुमारी उतार रहे हैं, आतंकवादी हमारी धरती की जन्नत में कहर क्यों बरपा किये हुए हैं? आप तो कहते थे कि आपकी पैलेटगनों, नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक ने उनकी कमर तोड़कर रख दी है। फिर ऐसा क्या हुआ कि वे, ताबड़तोड़ न भी कहें तो, एक के बाद एक हमले करने लगे? अब वे निर्दोषों की ही जानें नहीं ले रहे, हमारे सैनिकों को भी शहीद किये दे रहे हैं। जिस सेना को आपने वहां अरसे से अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा की सुरक्षा का जिम्मा सौंप रखा है, क्यों अब आतंकवादियों को उसका भी किंचित खौफ नहीं रहा? क्यों वे सीधे उनके शिविरों में घुसकर लाशें गिरा रहे हैं?

कहीं यह कश्मीर की सारी जनता को आतंकवादी मानकर फैलाये गये उद्वेलनों का ही अंजाम तो नहीं है? आप देश की भी सरकार चला रहे हैं और जम्मू- कश्मीर की भी। दावोस में कह आये हैं कि जितनी देश की जनसंख्या नहीं, उससे ज्यादा मतदाताओं ने आप को चुना है। जनता द्वारा आपको अपना 'इतना अगाध' विश्वास सौंपने के बावजूद आपको ऐसा कोई रास्ता क्यों नहीं सूझ रहा, जिस पर चलकर आप हमारी कश्मीरी जन्नत को जहन्नुम में बदलने से बचा सकें? आप चार साल से प्रधानमंत्री हैं। कितने दिनों तक दूसरों के पाप गिनाकर अपनी जिम्मेदारियों से बगलें झांकते रहेंगे? प्राय: हर हमले के बाद आप शोक-संदेश जारी करते हैं, आपके गृहमंत्री उच्चस्तरीय समीक्षा बैठकें करते हैं और रक्षामंत्री कहती हैं कि पाकिस्तान को हमलों की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। उनकी बात मान लेते हैं। लेकिन पाक जब चुकायेगा, तब चुकायेगा, हम जो लगातार चुका रहे हैं, वह कीमत अभी भी छोटी लगती है आपको? एक के बदले दस सिर काट लाने की बात करते थे, तब तो वह बड़ी क्यों दिखती थी!

आपकी मुख्यमंत्री कहती हैं कि जम्मू-कश्मीर में खूंरेजी रोकने का पाकिस्तान से बात करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है और आप हैं कि उस रास्ते पर जाना ही नहीं चाहते। देश इससे क्या समझे? ठीक है कि आप इस वक्त की बात करेंगे तो माना जायेगा कि वाकई आतंकित हो गये हैं। तब आपके उस 56 इंच के सीने का कोई मतलब ही नहीं रह जायेगा, जिसकी आपसे ज्यादा आपके भक्तों को फिक्र है। लेकिन आप यह क्यों नहीं समझते कि वहां बिगड़ी हुई बात घुड़कियों और दर्पोक्तियों से बननी होती तो कब की बन जाती! इसके विपरीत वहां न सैन्यशिविर सुरक्षित हैं, न सीआरपीएफ, न अस्पताल, न सैनिक व सुरक्षा बल और न नागरिक। इन सबका जीवन संकट में हैं। गोलीबारी से हलाकान लोगों को घर छोड़ने पड़ रहे हैं, स्कूल बंद हैं और सामान्य जनजीवन अस्तव्यस्त।



फिर भी आपकी जमात के आक्रामक बयान आपकी राजनीतिक व प्रशासनिक क्षमता से मेल क्यों नहीं खा रहे? उड़ी हमले के बाद गठित लेफ्टिनेंट जनरल कैंपोस कमेटी ने सैन्य शिविरों की पेट्रोलिंग, बंकरों के रखरखाव, साजोसामान की किल्लत और सुरक्षा में कमजोरियों की जो जानकारियां दी थीं, क्या उन्होंने भी आंखें नहीं खोली हैं? खोली होतीं तो आपका पितृसंगठन यह व्यर्थ की डींग नहीं ही हांकता कि जरूरत होने पर वह तीन दिनों में ही 'स्वयंसेवकों की सेना' खड़ी कर सकता है। खोली होतीं तो आप भी समझते कि देश की रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी स्थितियां उन्हें राजनीतिक रंग देने, लोगों को संकुचित राष्ट्रवाद के नारों में भरमाने और नये उद्वेलनों की नर्सरी खोलने से नहीं संभलतीं।

इसके लिए समूचे देश को साथ लेकर निष्ठा, ईमानदारी व सूझबूझ से ठोस कदम उठाने पड़ते हैं, राजनीतिक पहलें करनी पड़ती हैं। समझना पड़ता है कि हमारे जैसे लोकतंत्रों में इजाजत न देने, दबाने और अनसुनी करने से सवाल न मरते हैं, न कम होते हैं। उलटे नये पैदा होते और बढ़ते हैं-ज्यादा जोर से पूछे जाते हैं। इसलिए बेहतर रास्ता यह है कि खुमारी से बाहर आयें और सवालों की अनसुनी छोड़ उनका सामना करने की आदत डालें।

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