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अच्छे दिन हुए पूरे, गुजरात में नहीं चलेगा मोदी का जादू

मनोज कुमार झा

अगले महीने होने जा रहा गुजरात विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा के लिए अग्निपरीक्षा के समान है। वैसे, तमाम मीडिया चैनलों ने चुनाव पूर्व के अपने सर्वे में यह घोषणा कर दी है कि जीत भाजपा की होगी, पर इस पर यक़ीन भाजपा नेताओं को भी नहीं हो रहा है। बढ़ते दबाव को देखते हुए प्रधानमंत्री लगातार वहां दौरे कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल के दौरे भी जारी हैं और उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। गुजरात में राहुल की छवि सुधरती नज़र आ रही है और लोग कह रहे हैं कि अब वे राजनीतिक रूप से परिपक्वता दिखा रहे हैं।

दूसरी तरफ, अमित शाह जैसे भाजपा के रणनीतिकार को कई जगहों पर भारी विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं में भी आशा के अनुरूप भीड़ नहीं जुट रही है। मोदी-मोदी की पुकार मंद पड़ गई है।

दरअसल, गुजरात में भाजपा को लेकर मतदाताओं में जो निराशा की भावना दिखाई पड़ रही है, वह मोदी सरकार की तीन साल में लागू की गई नीतियों का परिणाम है जो शुरू से ही पाखंड और धूर्तता पर आधारित रही।

गुजरात एक ऐसा राज्य है जो लगभग दो दशकों से भाजपा-शासित है। नरेंद्र मोदी कहीं भी विकास के गुजरात मॉडल की ही बात करते हैं। सन् 2014 में केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के पहले उनकी षडयंत्रपूर्ण राजनीति का एकमात्र क्षेत्र गुजरात ही था। वहां उन्होंने जो दंगा-फसाद, सुनियोजित हत्याएं और फर्जी काउंटर करवाए, उसे लेकर पूरी दुनिया में उनकी बदनामी हो गई और अमेरिका जैसे देश ने उन्हें वीज़ा जारी करने से मना कर दिया था। उस समय कोई सोच नहीं सकता था कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन जाएंगे। ये और इनके मुख्य सहयोगी अमित शाह की छवि पूरे देश में बहुत ही खराब थी। ये दंगाइयों के संरक्षक ही नहीं, स्वयं दंगों में शामिल बताए जाते थे। अमित शाह को तो उनके आपराधिक कार्यों के लिए तड़ीपार तक कर दिया गया था। लेकिन कांग्रेस से नाराज वोटरों ने भाजपा के प्रचारतंत्र के जाल में फंस कर और इस मूर्खतापूर्ण बात पर विश्वास करके कि उनके खाते में 15 लाख रुपए आ जाएंगे और यह काला धन पकड़े जाने से संभव होगा, भाजपा को जिता दिया।

मतदाताओं का यह सोचना था कि एक बार भाजपा के नरेंद्र मोदी को आजमा कर देखते हैं, यह भ्रष्टाचार का विरोधी है, लेकिन भाजपा की जीत के पीछे सबसे बड़ा कारक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण था। जीत में इसी की भूमिका थी, साथ में आक्रामक प्रचार जिसके लिए अडानी-अंबानी जैसे उद्योगपतियों ने अपना खजाना खोल दिया था। बावजूद, मत प्रतिशत में भाजपा ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी। विकल्पहीनता के शून्य से यह पैदी हुई, लेकिन सत्ता हाथ में आते ही यह बेकाबू हो गई। इसने जो भी योजनाएं चलाईं, वो कांग्रेस की ही योजनाएं थीं, महज नाम बदल दिया। हर जगह ऐसे-ऐसे मुद्दे खड़े किए, जिससे ख़तरनाक स्थितियां पैदा हो गईं। लव जिहाद से लेकर गो-गुण्डागीरी तक इन्होंने जैसा आतंक मचाया, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया था।

मोदी ने अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं को खुद के लिए चुनौती मानते हुए दरकिनार कर दिया और दंगों व अन्य असामाजिक गतिविधियों में विश्वस्त साबित रहे अमित शाह को लेकर ही सारे फैसले करने लगे। न काला धन आया, न महंगाई घटी, भ्रष्टाचार क्या मिटता, पार्टी में ही बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी शामिल कर लिए गए और पहले से भी भाजपा में भ्रष्ट तत्व की कम नहीं थे। अपने हर फैसले से मोदी एंड कंपनी ने देश के महज दो उद्योगपतियों अंबानी-अडानी को फायदा पहुंचाया और प्रधानमंत्री पद की गरिमा को नष्ट कर दिया। करदाताओं के पैसे पर विदेशों में मोदी-मोदी करने वाले भाड़े के आदमी जुटाए। हर ऐसा काम किया जो शर्मनाक था, पर सांप्रदायिकता का ज़हर भाजपा-संघ ने इतना फैलाया कि यूपी में इन्हें जीत मिली और खुलेआम मुसलामानों के खिलाफ ज़हर उगलने वाला योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बन गया।

मोदी ने गुजरात को विकास का मॉडल कहा, पर उनके विरोधी उसे हिन्दुत्व की प्रयोगशाला मानते हैं। जहां तक विकास का सवाल है, वहां किसी भी दृष्टि से विकास नहीं हुआ है, विकास का महज शोर मचाया गया है। विकास सिर्फ सांप्रदायिक चेतना का हुआ है जो लंबे समय से राज्य में भाजपा की सत्ता का आधार बना रहा।

नरेंद्र मोदी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, विरोधियों ही नहीं, भाजपा में भी अपने प्रतिद्वन्द्वियों से निपटने के लिए साजिशों का सहारा लेते रहे। पूरी नौकरशाही और पुलिस तंत्र को उन्होंने अपनी साजिशों में शामिल किया।

गुजरात में नरेद्र मोदी की जो राजनीति रही है, वह पूरी तरह विरोधियों के सफाये पर आधारित रही। पर जब ये केंद्र में आए और देश के प्रधानमंत्री बन गए तो गुजरात इनकी प्राथमिकता में नहीं रहा। ये पूरे देश में जहां जाते वहीं का अपने को बताते रहते। इससे जनता को समझ में आने लगा कि यह आदमी नाटक करने में बहुत तेज है। लेकिन जब ये सत्ता में आ ही गए तो जनता बिलबिला कर रह जाने के सिवा और कुछ कर पाने में समर्थ हो गई। इनके और इनके मंत्रियों की मूर्खता और बदमाशी के एक से एक कारनामे सामने आते रहे। ये यही समझते रहे कि जनता ने सदा-सर्वदा के लिए सत्ता हमें सौंप दी है।

नरेंद्र मोदी ने देश के तमाम पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के लिए देश ही नहीं, विदेशों में भी अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं। ये जरा भी नहीं सोचते कि इनके ऐसा करने से देश का अपमान होता है। पर जनता को यह बात बुरी लगती है कि कोई नेहरू और इंदिरा के लिए अपशब्द कहे। पर मोदी और शाह इस बात को नहीं समझते।

शोहदों की भाषा बोलते हैं मोदी

भाजपा के नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और भाजपा अध्यक्ष रह चुके लालकृष्ण आडवाणी यह समझते थे कि क्या बोलना चाहिए और देश का सम्मान किस बात में है। उन्होंने कभी नेहरू और इंदिरा गांधी के लिए अपशब्दों का व्यवहार नहीं किया। पर मोदी शोहदों की भाषा बोलते हैं। इससे जनता का धीरे-धीरे इनसे मोहभंग हो रहा है।

मोहभंग का एक कारण ये भी है कि न तो काला धन पकड़ा गया, खातों में 15 लाख क्या आता, महंगाई इतनी बढ़ी कि ग़रीब तो ग़रीब, मध्यम वर्ग भी पिस गया। इधर, अपने चहेते उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए बिना-सोचे समझे मोदी और इनकी मूर्ख मंडली ने नोटबंदी जैसा घातक कदम उठआ दिया जिससे पहले से ही मंद पड़ी अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। नोटबंदी इतना ख़तरनाक क़दम था कि इसके परिणामस्वरूप बैंकों की लाइनों में सैकड़ों लोग मारे गए, नोटबंदी लागू होने के चार महीने के भीतर 50 लाख नौकरियां चली गईं। छोटे उद्योग और व्यवसाय ठप हो गए। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन इन लोगों की मूर्खता को भांप कर पहले ही जा चुके थे। जी-हजूरी करने वाला रिजर्व बैंक का जो गवर्नर उनके बाद आया, उसके वश में कुछ भी नहीं था। वह सीधा मोदी और शाह के इशारे पर काम करता था। मोदी और शाह कोई अर्थशास्त्री नहीं हैं, अर्थशास्त्री तो पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह थे। उन्होंने नोटबंदी को संगठित वैधानिक लूट बताया।

कुछ आलोचकों ने नोटबंदी को मोदी सरकार का सबसे बड़ा घोटाला बताया है, जिस पर से पर्दा तब हटेगा जब ये सरकार अपदस्थ होगी। देसी मीडिया मोदी सरकार की आलोचना करने से बचता रहा है, पर विदेशी मीडिया ने नोटबंदी की कड़ी आलोचना की और इसे अर्थव्यवस्था के लिए घातक कदम बताया। पर मोदी जी ने उनका मजाक उड़ाया। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्रियों ने जब मोदी की नोटबंदी की आलोचना की तो चाय बेचने वाले की छवि बना कर खुश होने वाले मोदी ने उनका भी मजाक उड़ाया। इसके बाद, मानो नोटबंदी कम थी, उन्होंने जीएसटी लागू कर के हर स्तर के व्यापारियों की कमर ही तोड़ दी।

नोटबंदी भी बड़े उद्योगपतियों के पक्ष में थी और जीएसटी भी, पर मोदी जी यह भूल गए कि करोड़ों लोगों को जब सीधी परेशानी का सामना करना पड़ेगा तो उनसे जवाब जनता मांगेगी नहीं, देगी। सीधा नहीं, चुनाव में जवाब देगी।

नोटबंदी और जीएसटी का आत्मघाती असर पूरे देश के साथ गुजरात में भी पड़ा है। व्यापारी त्राहिमाम कर रहे हैं। ये व्यापारी चुनाव में मोदी जी को मजा चखा सकते हैं। दूसरी तरफ, पाटीदार हैं जो भाजपा से असंतुष्ट हैं। भाजपा सरकार ने उनका दमन करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। जब मोदी जी को लगा कि गुजरात चुनाव में उन्हें लेने के देने न पड़ जाएं तो उन्होंने जीएसटी में सुधारों की घोषणा की और टैक्स कम किए।

पर मामला सिर्फ जीएसटी का ही नहीं है। कई मुद्दे हैं। लोगों को अब समझ में आ रहा है कि भाजपा का जिता कर के और उसमें भी मोदी को प्रधानमंत्री बना कर उन्होंने ग़लत किया है।

भाजपा गुजरात में हर तरह से डैमेज कंट्रोल के उपायों में लगी है, ताकि उसे चुनाव में सफलता मिल सके। क्या होगा, अभी कुछ कहना संभव नहीं है, पर इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि अब मोदी का जादू खत्म होता जा रहा है। गुजरात में उसे बहुत ही कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ेगा। लोगों में कांग्रेस के प्रति जो रुझान बढ़ता दिखाई दे रहा है, वह आने वाले दिनों में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती पेश करेगा। लेकिन यही वक़्त है जब तमाम सेक्युलर दलों को इस यह सोचना होगा कि हर तरह से देश को विनाश के गर्त में ले जा रहे भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए और जनता को जनतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल करने के लिए एक व्यापक मोर्चा बनाकर नये आंदोलनों की शुरुआत की जाए। 

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