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संसद की चौखट पर मत्था टेकने वाले मोदी अब उसे ठेंगे पर रख रहे

Modi, who bowed down on the doorstep of Parliament, is now keeping it on the pedestal

महामानव’ बनना चाहते हैं मोदी !

संसद सत्र को एक हफ्ता से ज्यादा बीत जाने के बाद पीएम आज संसद पहुंचे।

इस बीच उनके पास रॉक कंसर्ट के लिए समय था। उन्होंने रेल हादसे के बावजूद सभा किया। मुंबई से लेकर बंग्लोर तक रौंदते रहे। लेकिन संसद के लिए वक्त नहीं निकाल पाए।

संसद कोई ईंट-गारे का ढांचा नहीं है, वो जनता की सामूहिक भावनाओं की पूंजी है। देश का हर फैसला वहीं से होता है। सरकार पहली और आखिरी बार उसी के प्रति जवाबदेह है। लेकिन नोटबंदी का इतना बड़ा फैसला लेने के बाद भी पीएम संसद को उसके बारे में बताना जरूरी नहीं समझते।

पूरा विपक्ष एक पैर पर खड़ा है, लेकिन मोदी जी को उसकी फिक्र नहीं है।

मैं उन लोगों से इत्तफाक नहीं रखता जो यह मानते हैं कि मोदी संसद का सामना करने से डरते हैं। वो हर कला में माहिर हैं। हर महफिल को अपनी बातों से लूट सकते हैं। जवाब नहीं होगा तो आंसू और भावनाओं का ज्वार उनके पास है। यह उनकी एक पूरी सोची समझी रणनीति थी।

मोदी खुद को एक महामानव के तौर पर पेश करना चाहते हैं। जिसमें एक तरफ भक्त होंगे दूसरी तरफ उनके भगवान। बीच में कोई नहीं होगा। अगर कोई होगा भी तो उसे देशद्रोही, पाकिस्तानी और सिकुलर करार दे दिया जाएगा।

राजनीतिक वैचारिक मोर्चे पर अभी तक ज्ञात साम्यवादी, गांधीवादी, अंबेडकरवादी, उदारपंथी, सेकुलर, प्रगतिशील, बुद्धिजीवी, महिलावादी दूसरी आदि-अनादि सभी श्रेणियां खत्म हो जाएंगी।

इस प्रक्रिया में वो संसद और पूरे विपक्ष को बौना साबित कर देना चाहते हैं।

वह नहीं चाहते कि विपक्ष का कोई नेता उनसे सवाल करे और उसका उनको जवाब देना पड़े। विपक्ष को इस हैसियत लायक वो समझते ही नहीं हैं। इससे उनका कद नीचा हो जाएगा।

मोदी ऐसा कभी नहीं होने देना चाहते हैं।

बाबुल सुप्रियो ने इसी बात को एक दूसरे ही तरीके से जाहिर कर दिया। जब उन्होंने कहा कि अगर बच्चे संसद में विपक्ष का जवाब देने में सक्षम हैं तो डैडी को भला आने की क्या जरूरत है।

यानी मोदी अब सरकार के बाकी हिस्सों समेत, विपक्ष और पूरी संसद से ऊपर हो गए हैं।

यही वजह है कि संसद की चौखट पर कभी मत्था टेकने वाले मोदी जी अब उसे ठेंगे पर रख रहे हैं। और बहुत ज्यादा बवाल होगा तो फिर एक दिन जवाब भी दे देंगे।

मोदी जी के महामानव बनने की पहली शर्त संस्थाओं का खात्मा था। सरकार में आने के साथ ही वो इस काम में जुट गए थे। सबसे पहले उन्होंने इसकी शुरुआत अपनी सरकार से की। जब पूरे मंत्रिमंडल को घुटनों के बल ला दिया और सारी चीजें पीएमओ से संचालित की जाने लगीं। फिर बाकी संस्थाओं को एक-एक कर उनकी हद बतायी गई। या फिर उनके शीर्ष पदों पर ऐसे लोगों को बैठा दिया गया जो इशारों पर नाचने वाले लोग थे।

इस कड़ी में शैक्षणिक से लेकर सांस्कृतिक और राजनीतिक से लेकर संवैधानिक सब संस्थाएं शामिल थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने जब झुकने से इनकार कर दिया तो कई तरीके से उसका अब बदला लिया जा रहा है। अब बारी संसद की है।

यही गुजरात माडल था। जहां विधानसभा से लेकर विपक्ष तक की कोई हैसियत और वजूद नहीं था। अपने तो मुट्ठी में थे ही। जो नहीं माने उन्हें खत्म कर दिया गया या फिर ताकत के बल पर दबा दिया गया।

यह अजीब विडंबना है। संसद चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार की होती है, अब वह सरकार ही उसको नहीं चलने दे रही है। मोदी इसका ठीकरा भी विपक्ष के सिर फोड़ देना चाहते हैं, यह कहते हुए कि उनके लक्ष्यों की राह में विपक्ष सबसे बड़ा रोड़ा है।

ऐसे में जरूरत पड़ने पर उसे ही नहीं संसद को भी दरकिनार किया जा सकता है। अनायास नहीं कुछ लोगों ने विपक्ष और संसद दोनों को मोदी जी के सिरदर्द के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है।

लेकिन इस पूरी कवायद में विपक्ष खुद को असहाय के तौर पर पेश कर रहा है। और सरकार के विरोध में संसद के दायरे से निकलने के लिए तैयार नहीं है। जबकि मोदी सीधे जनता के बीच पहुंच गए हैं।

ऐसे में अगर सरकार को संसद की गौरव और गरिमा का ख्याल नहीं है तो विपक्ष चाह कर भी उसे संसद में रहकर नहीं बचा सकता है।

उसके लिए उसे भी सड़क पर उतरना होगा। और मोदी के समानांतर और उससे ज्यादा जनता की ताकत तैयार करनी होगी। तभी सरकार को झुकाया भी जा सकता है और संसद की गरिमा की बहाली भी हो सकती है।

यह मामला अब सड़क का बन गया है और अगर सरकार ने उसे चुना है तो विपक्ष को उससे पीछे रहने का कोई तुक नहीं बनती, क्योंकि यह विपक्ष की जमीन है। सरकार उसको भी हड़प लेना चाहती है।

लिहाजा विपक्ष को अपनी इस जमीन को न केवल बड़ा करना होगा बल्कि उसको और मजबूत भी करना होगा। जिससे सत्ता को उसके दायरे में नाथा जा सके। वरना सड़क और संसद दोनों पर अगर सत्ता का कब्जा हो गया तो विपक्ष को हवा में फेंकने में उसे देरी नहीं लगेगी। इस मामले में केजरीवाल और ममता बनर्जी की रणनीति ठीक है। यह बात अलग है कि इन मसलों पर उनसे कई सवाल पूछे जा सकते हैं।

महेंद्र मिश्र

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