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भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता की शास्त्रीय आलोचना

भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता की शास्त्रीय आलोचना

मुस्लिम साम्प्रदायिकता के कुछ सूत्र

Some sources of Muslim communalism

आलोक वाजपेयी

जैसे कुछ हिंदुओं (खासकर पढ़े लिखे) के मस्तिष्क में कुछ भरम घुमड़ते रहते हैं, जिनका सच से कोई लेना देना नहीं होता और वो झूठी चेतना से ग्रस्त होने के कारण वास्तविक दुनिया पर ठोस सोच समझ नहीं पाते, वही हाल कमोबेश मुस्लिम बिरादरी में भी है।

मुसलमानों का राज की फर्ज़ी हूक

The fake aching of Muslims rule
इसकी जड़ें इतिहास की झूठी समझ में हैं।

इस तरह के मुस्लिम भी इस झूठ को मानते हैं कि मध्यकाल मुस्लिम काल था। उन्हें लगता है कि भारत में मुसलमानों का शासन था। इससे उनके मन में हूक रहती है कि हाय अब मुसलमानों का राज हिंदुस्तान में नही है। इसी फर्जी हूक ने मुसलमानों के बड़े तबके को (खासकर जो बड़े जमीदार और अमीर थे) अपना अलग मुस्लिम देश पाकिस्तान के लिए प्रेरित किया। यह फर्जी समझ उनकी चेतना में एक फालतू का अभिमान/ अकड़ लायी जिससे साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ने में आसानी हुई। साथ ही वो अपनी जड़ें उन सुदूर स्थित देशों में खोजने लगे जहां से उनका कोई वास्तविक वास्ता नहीं था। ये धार्मिक लगाव से इतर बात थी क्योंकि भाषा संस्कृति, शिक्षा आदि सबने इसे प्रभावित किया और आधुनिक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया बाधित हुई।

झूठा सर्वश्रेष्ठता बोध

False perception

इससे एक झूठ सर्वश्रेष्ठता बोध भी उनमें भरता गया और वो अपने धर्म को दूसरे धर्मों से निराला समझने लगे। धर्म को साबित करने की इच्छा कर्मकांडों में उलझाती है और बाहरी प्रतीकों चिन्हों को ही धर्म का सार समझा जाने लगता है। दूसरे धर्म वालों से खुद को अलग दिखाने की चेष्टाएँ समाज में घुलने मिलने की प्रक्रिया को बाधित करती हैं।

धार्मिक पुस्तक में लिखी बातों का मर्म समझने की बजाए उनमें लिखे तौर-तरीकों को सतही समझ के आधार पर पोंगा पंडिती अंदाज में नकल करने का परिणाम यह हुआ कि वो समाज में एक अजूबे के रूप देखे जाने लगे। दाढ़ी, टोपी, आदि-आदि फैशन के रूप में आ गए बजाय कोई गहरी आध्यात्मिक अनुभूति के।

बहुत निजी मामला है धर्म

चूंकि सभी मशहूर धर्मों में इस्लाम सबसे बाद में आया है, इसलिए उन्होंने ये प्रचार करना और सोचना शुरू कर दिया कि चूंकि ये लेटेस्ट है इसलिए सबसे बढ़कर है। इससे उनका तो कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन दूसरे धर्म वाले उनसे बिदकने लगे। धर्म बहुत निजी मामला है और केवल ईश्वर भाव से जुड़ने का जरिया भर है, रास्ते अलग अलग पर मंजिल एक ही है इस सोच में कमी आती गयी। समाज को समरसता में लाने में ये सोच बाधा है।

इस सबका परिणाम ये हुआ कि अपनी बिरादरी में ही संकुचित होकर coterie में फंसते चले गए और एक हीन भावना ग्रस्त अकड़ की कैद में फंस गए। खुलापन जो कि किसी भी समाज की उन्नति के लिए अनिवार्य है, कम होता गया। साम्प्रदायिकता का एक लक्षण सांस्कृतिक अलगाववाद है उसमें फंस गए।

भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता की कमर अब टूट चुकी है।

प्रगतिशीलता, वैज्ञानिक भाव बोध से यह विलगाव मुस्लिम बिरादरी को बहुत भारी पड़ा है।

अच्छा यह है कि युवा पीढ़ी और बुजुर्ग भी इस तरह की सोच की कमियों को महसूस कर रहे हैं और इसीलिए भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता की कमर अब लगभग टूट चुकी है।

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