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रिस्क लेना सीख रहा है मुसलमान : सपा-बसपा को निरीह मुसलमान ही अच्छे लगते हैं

शाहनवाज आलम 

उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा की लगभग एकतरफा जीत और योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद मुसलमानों पर दो नजरियों से बात हो रही है। पहला नजरिया हिंदुत्ववादी है, जिसकी अभिव्यक्ति आप वास्तविक और वर्चुअल दुनिया में मुसलमानों के खिलाफ मुखर होती हिंसक आवाजों में देख सकते हैं। तो वहीं दूसरा नजरिया इस परिणाम के बाद मुसलमानों के लोकतांत्रिक इदारों में बिल्कुल हाशिए पर पहुंच जाने से चिंतित है। जो उसके मुताबिक लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।

इस तरह इन दोनों विश्लेषणों में मुसलमानों की निरीहिता ही केंद्रीय बिंदु है। लेकिन चूंकि ये दोनों ही विश्लेषण बाहरी नजरिए पर आधारित हैं इसलिए इनमें सच्चाई पूरी तरह नुमायां नहीं है। इसके उलट, उनके अंदर ऐसा बहुत कुछ नया और उत्साहवर्धक घट रह है जिनसे उनमें नई उम्मीदें पैदा होती हैं।

दरअसल मुसलमानों के लिए यह जनादेश बदलते सामाजिक समीकरणों के लिहाज से बिल्कुल ही आश्चर्य में डालने वाला नहीं है। क्योंकि उसे 2014 के लोकसभा चुनाव से काफी पहले से सपा और बसपा के कथित हिंदू सेक्यूलर मतदाताओं के अंदर चल रहे मुस्लिम विरोधी गोलबंदी का अंदाजा था

मसलन, 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले हुए मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा में उसे सपा और बसपा के मूल जनाधारों में उस हिंसा को जायज ठहराने या उसे स्वाभाविक हिंदू प्रतिक्रिया के बतौर देखने या फैजाबाद में यादवों द्वारा मुसलमानों के खिलाफ दशहरा के दिन किए गए हमलों से अंदाजा हो गया था कि आने वाले चुनावों में यह तबका भाजपा के साथ जा सकता है। हालांकि इन जातियों में यह कोई नया रूझान नहीं था, पहले भी ऐसा होता रहा है। लेकिन तब मुसलमान खुलकर सपा और बसपा के जनाधारों के खिलाफ शिकायती मुद्रा में नहीं होता था। उसकी कोशिश होती थी कि वह इन सवालों पर चुप रह कर उन्हें भाजपा के पक्ष में जाने से रोके या उन्हें न्यूट्रल बनाए रखने के लिए खामोश रहे।

लेकिन अगर हम पिछले 10 सालों के मुस्लिम समाज के अंदरूनी जिंदगी में झांकें तो हम पाएंगे कि 2007 से ही बसपा सरकार में आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों की धड़पकड़ से उसके अंदर अपने साथ होने वाली नाइंसाफियों पर किसी रणनीतिक कारण से प्रतिक्रिया नहीं देने और चुप रह जाने की प्रवृत्ति में बदलाव आना शुरू हो गया था। इस बदलाव का केंद्रीय विचार अपने साथ होने वाली नाइंसाफी के अलावा इंसाफ के लिए दूसरों का मुंह ताकने के बजाए खुद आवाज उठाना भी था।

यह कोई सामान्य बदलाव नहीं था। बल्कि 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुलायम सिंह और मायावती जैसे नेताओं द्वारा उनके अंदर बैठा दी गई इस धारणा को तोड़ने की कोशिश इसमें निहित थी कि इन पार्टियों की निगहबानी में वो सुरक्षित हैं और उन्हें खुद राजनीति में आने की कोई जरूरत नहीं है।

यहां यह भी गौरतलब है कि इस नसीहत को मानकर लगभग पूरी तरह गैरसियासी हो चुकी एक पीढ़ी जिसने मुलायम सिंह यादव को ‘मौलाना’ की उपमा दी थी, अब नई पीढ़ी को सपा-बसपा के साथ खड़े रहने का कोई मजबूत तर्क नहीं दे पा रही थी।

यह नई पीढ़ी कथित सामाजिक न्याय में अपने प्रतिनिधित्व पर सवाल उठा रही थी और यह भी पूछ रही थी कि सेक्यूलरिज्म का बोझा वही अकेले क्यों ढोए। इस तरह उसमें एक नया सियासी वर्ग निर्मित हुआ है जो ‘रिस्क’ लेना सीख रहा है।

इस तरह यह ‘नया मुसलमान’ धर्मनिपेक्षता की नई और बड़ी लकीर खींचने की प्रक्रिया में था और कथित सेक्यूलर राजनीति के पुराने मानकों- मदरसों को वित्तिय सहायता, हज सब्सिडी या उर्दू अनुवादकों की भर्ती, को खारिज कर अपनी शर्तों को मजबूती से रख रहा था। जिसको नजरअंदाज करना आसान नहीं था। मसलन, मायावती ने आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार दिखाए जा रहे दो युवकों के सवाल पर मुसलमानों के आंदोलन के दबाव में जस्टिस निमेष जांच आयोग का गठन किया। ऐसा देश में पहली बार हुआ था। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पहली बार मुसलमान किसी राजनीतिक मुद्दे पर और वो भी एक कथित सेक्यूलर पार्टी के खिलाफ आंदोलन कर रहा था। इस बदलाव को सपा ने भी भांपा और इस ‘नए मुसलमान’ मतदाता वर्ग को रिझाने के लिए उसने आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए मुस्लिम युवकों को रिहा करने, बरी हुए युवकों का पुनर्वास और मुआवजा देने, मुसलमानों में आत्मविश्वास जगाने के लिए राज्य की सुरक्षा बलों में भर्ती के बाबत मुस्लिम बहुत इलाकों में विशेष भर्ती कैम्प लगाने जैसे चुनावी वादे किए।

कहने की जरूरत नहीं कि इनमें से एक भी वादा उसने पूरा नहीं किया, लेकिन मुसलमानों के लिए यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी। इससे पहले किसी भी राज्य में मुसलमानों के वोट पर राजनीति करने वाली किसी पार्टी को ऐसे वादे करने पर वह कभी मजबूर नहीं कर पाया था।

वहीं दूसरी ओर इस ‘नए मुसलमान’ के उदय से परम्परागत ‘सेक्यूलर’ राजनीति के अपने मूल जातिगत जनाधार में भी इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बदलाव आने शुरू हो चुके थे। चूंकि सपा और बसपा ने अपने जातिगत आधारों को मुसलमानों से वोट और नोट लेना तो सिखा दिया था, उनके सवालों पर उन्हें संवेदनशील बनाने या उनके धर्मनिरपेक्षीकरण की कोई प्रक्रिया नहीं चलाई थी। इसलिए मुसलमानों को निरीहता की स्थिति में देखने की उसे आदत हो गई थी। उसे निरीह मुसलमान ही अच्छे लगते थे।

कथित सामाजिक न्याय के जातिगत जनाधारों को अपने अधिकारों की बात करने वाला यह ‘नया मुसलमान’ हजम नहीं हो रहा था। लिहाजा, यही वह समय था जब संघ परिवार और भाजपा के साथ उसका गुप्त चुनावी समझौता हुआ। ‘गुप्त’ इसलिए कि उसने 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमानों को इसकी भनक नहीं लगने दी। वहीं इस ‘नए मुसलमान’ ने इन 10 सालों में सपा और बसपा के साम्प्रदायिक रवैये के चलते भविष्य की योजनाओं के तहत अपनी सामाजिक और राजनीतिक लीडरशिप खड़ी करने का इरादा भी बनाना शुरू कर दिया था। जिसके तहत सामाजिक तौर पर रिहाई मंच, सियासी तौर पर उलेमा काउंसिल, पीस पार्टी खड़ी हुई जिसमें पहले से चली आ रही नेलोपा की लीडरशिप की अक्सरियत थी। वहीं बाद में ओवैसी की एमआईएम भी आई।

यहां यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि जहां पहले ऐसी किसी भी पार्टी को मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा सपा-बसपा के प्रभाव में भाजपा का एजेंट कह कर खारिज कर देता था, वहीं इस दरम्यान हुए चुनावों में उसने भले इन्हें जीतने लायक वोट न दिया हो लेकिन ऐसे किसी भी तर्क को एक सिरे से नकार दिया। यहां तक कि इस बार भाजपा की प्रचंड जीत के बावजूद मुसलमानों में अपने वोटों के बंट जाने का अपराधबोध बिल्कुल गायब है, जैसा कि ऐसी स्थितियों में पहले होता रहा है। उल्टे इस बार वो सपा और बसपा के हिंदू जनाधार के बंटवारे को भाजपा की जीत का जिम्मेदार मान रहा है। राजनीतिक तौर पर जड़ और नई बहसों और प्रयोगों से बचने वाले इस समाज में आया यह एक अहम बदलाव है।

वहीं अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रहे इस ‘नए मुसलमान’ को सत्तारूढ़ सपा ने कैसे सम्बोधित किया यह समझना कथित सेक्यूलर राजनीति के हिंदुत्ववादी चरित्र को समझने के लिए अहम होगा। सपा ने अपने घोषणापत्र से इन सभी मुद्दों को ही गायब कर दिया। इस तरह उसने अपने हिंदू जातिगत जनाधार को यह संदेश देने की कोशिश की कि वो उसे मुस्लिम हितैषी समझने की गलती ना करे, उस पर भरोसा करे वो अपनी गलती सुधारने को तैयार है। वहीं दूसरी ओर इससे उसने मुसलमानों में विकसित हो रही राजनीतिक चेतना को ही पलट देने की कोषिष की।

जाहिर है, अखिलेश यादव ने ऐसा इसलिए किया कि यह चेतना उनकी सेक्यूलरिज्म की जड़ और यथास्थितिवादी राजनीति को चुनौती दे रही थी। यह ज्यादा सवाल पूछने वाला ‘नया मुसलमान’ ज्यादा प्याज खाने वालों से खतरनाक था।

वहीं इस ‘नए मुसलमान’ में एक और सुखद बदलाव यह दिखा कि उसने मुजफ्फरनगर हिंसा के जिम्मेदार जाटों को बिल्कुल ही वोट नहीं दिया। जबकि अजित सिंह को यह उम्मीद थी कि मुसलमान फिर से जाटों को वोट दे देंगे। यह निर्णय सुखद इसलिए है कि कम से कम मुसलमान एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर पाया जिसके तहत कोई इंसान अपने हत्यारों या जालिम के साथ नहीं खड़ा होता। यानी सामने वाले के अपनी सुविधानुसार सेक्यूलर और कम्यूनल होने के परम्परागत एकाधिकार को मुसलमानों ने खारिज कर दिया।

यानी उसने भाजपा को रोकने के नाम पर अपनी मानवीय गरिमा से समझौता नहीं किया। अपनी गरिमा और स्वायत्ता को हर हाल में बचाए रखने की जिद ही लोकतंत्र में नई सम्भावनाओं को जन्म देती है। 2017 का मुसलमान, इन सम्भावनाओं से भरपूर है जो भविष्य की किसी भी सेक्यूलर राजनीति को अब वास्तव में पहले से ज्यादा सेक्यूलर होने पर मजबूर करेगा। मुसलमानों के लिए यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है।

(शाहनवाज आलम का यह लेख मूलतः हस्तक्षेप पर March 30,2017 11:41 को प्रकाशित हुआ था, उस समय लेखक रिहाई मंच के प्रवक्ता थे। लेखक अब कांग्रेस के नेता हैं, लेकिन उनके लेख में उठाए गए सवाल आज भी प्रासंगिक हैं। बहस के लिए लेख का पुनर्प्रकाशन)

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