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Amit Shah Narendtra Modi

वाह मोदीजी वाह, जो स्वायत्तता नागालैंड के लिए दवा, वही कश्मीर के लिए जहर हो गयी?

अचरज नहीं कि मोदी-शाह जोड़ी के संविधान की धारा-370 (Article 370 of the constitution) को व्यावहारिक मायनों में खत्म ही कर देने की धमक, सुदूर उत्तर-पूर्व के राज्यों में और खासतौर पर नागालैंड (Nagaland) में सुनाई दी है। बेशक, शेष भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण (Full integration of Jammu and Kashmir with rest of India) के कथित रूप से सरदार पटेल के अधूरे सपने को पूरा करने के दावे के साथ, जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली संविधान की उक्त धारा (The said section of the Constitution giving special status to Jammu and Kashmir) को खत्म किए जाने और जम्मू-कश्मीर राज्य के ही तोड़े जाने तथा उसका दर्जा राज्य से घटाकर केंद्र-शासित क्षेत्र का किए जाने ने, पूरे देश को चौंकाया है।

और जाहिर है कि इन कदमों के लिए इस अभागे राज्य पर पूरी तरह से लॉकडाउन थोपे जाने का, जिसमें पूरे बारह दिन के बना ढील दिए जाने की शुरूआत ही हो रही थी, देश भर ने ही नहीं, शेष दुनिया ने भी नोटिस लिया है।

बहरहाल, इसकी चर्चा जरा बाद में, फिलहाल तो इस पर गौर किया जाए कि कश्मीर से जुड़े इस तमाम घटनाक्रम की पृष्ठ भूमि में और स्वतंत्रता दिवस की ऐन पूर्व-संध्या में देश के दूसरे छोर से आयी एक खबर ने सब को और भी चौंकाया है। यह खबर, नागालैंड में तथा अन्य नगा आबादी वाले इलाकों में भी, 14 अगस्त को और नगा राष्ट्रीय झंडा ध्वज फहराकर, बड़े पैमाने पर 73वां नगा स्वतंत्रता दिवस मनाए जाने की थी। इस मौके पर हर जगह ‘नगा राष्ट्रीय गीत’ भी गाया गया।

बेशक, विभिन्न नगा संगठन हर साल ही यह ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाते आए हैं। 1947 में नगा विद्रोहियों ने स्वतंत्रता की घोषणा की थी और उसी दिन को ‘नगा स्वतंत्रता दिवस(Naga Independence Day) के रूप में मनाया जाता रहा है।

बहरहाल, जैसाकि मीडिया में आयी अधिकांश खबरों में दर्ज किया गया, इस साल जितने बड़े पैमाने पर और लोगों की जितनी बड़ी हिस्सेदारी के साथ यह स्वतंत्रता दिवस मनाया गया, वैसा पिछले अनेक वर्षों में नहीं हुआ था।

इन्हीं खबरों के अनुसार, इसके लिए बहुत हद तक यह एहसास भी जिम्मेदार था कि धारा-370 को खत्म करने वाली मोदी सरकार से, नगा जन की स्वायत्तता तथा पहचान के लिए खतरा बढ़ गया है।

तो क्या यह माना जाए कि जिस समय कश्मीर को एक तरह से कैद कर के, उस पर ‘एक विधान, एक निशान’ का आरएसएस का पुराना एजेंडा थोपा जा रहा है, ठीक उसी समय उत्तर-पूर्व में ‘अलग निशान’ का शोर जोर पकड़ रहा है।

इसमें इतना और जोड़ लें कि कम से कम मौजूदा शासन ने, इस तरह नागालैंड का स्वतंत्र झंडा फहराए जाने का, व्याहारिक मानों में कोई विरोध नहीं किया था। हां! रस्मी तौर पर प्रशासन द्वारा यहां-वहां इस स्वतंत्रता दिवस के आयोजकों को सूचित जरूर कर दिया गया था कि यह ‘राष्ट्र ध्वज’ नहीं है!

बहरहाल, मुद्दा सिर्फ यही नहीं है कि जिन्हें जम्मू-कश्मीर में अलग ‘‘निशान’’ राष्ट्रीय एकीकरण (National integration) में बहुत भारी बाधा लगता था, उन्हें भी नागालैंड के अलग निशान पर वैसी ही आपत्ति क्यों नहीं है? याद रहे कि नगा अलगाववादियों के साथ समझौता वार्ता (Negotiations with Naga separatists) रुक-रुक कर 22 बरस से चलती आ रही थी और इस वार्ता के सफलतापूर्वक नतीजे तक पहुंच जाने का एलान करते हुए, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही, 2015 के अगस्त के महीने में, अब तक भारत से स्वतंत्रता के नारे पर ही सशस्त्र लड़ाई चलाते आए, एनएससीएन (आइएम) ग्रुप के साथ, समझौते की रूपरेखा पर दस्तखत किए गए थे।

बहरहाल, असली मुद्दा यह भी नहीं है कि उसमें तथा अंतत: होने जा रहे समझौते में, अलग नगा ध्वज की नगा संगठनों को मांग को, जिसके माने जाने की इस बीच खबरें आयी थीं, अंतत: स्वीकार भी किया जाता है या नहीं! आखिरकार, मोदी राज की अब पहचान ही बन गयी खास शैली में, जिसकी निशानी अति-केंद्रीयकृत तथा अपारदर्शी निर्णय प्रक्रिया है, चार साल पहले धूम-धड़ाके के साथ हुए उक्त समझौते के ब्यौरे, अब तक देश तथा जनता के लिए तो गोपनीय ही बने हुए हैं। और इसी शैली के एक और पक्ष के रूप में, जिसे मोदी राज की ‘निर्णायकता’ के रूप में पेश किया जाता है, उक्त वार्ताओं में केंद्र सरकार के वार्ताकार की भूमिका में रहे के एन रवि को, अब नागालैंड का राज्यपाल बनाकर ही बनाकर भेज दिया गया है, ताकि उक्त समझौता प्रक्रिया का निश्चित नतीजे तक पहुंचना सुनिश्चित करना सुगम हो।

फिर भी, इस सब में दर्ज करने वाली खास बात यह है कि केंद्र सरकार के कश्मीर धमाके के बाद, राज्यपाल की हैसियत से के एन रवि को, भारत के स्वतंत्रता दिवस के अगले ही दिन, नगा जन को सार्वजनिक रूप से यह भरोसा दिलाना बहुत जरूरी लगा था कि नागालैंड के ‘विशेषाधिकारों’ को कमजोर किए जाने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

धारा-370 के हटाए जाने के बाद, उत्तर-पूर्व के राज्यों को ऐसे ही अनेक विशेषाधिकार देने वाली धारा-371 (ए) के भी खत्म किए जाने की शंकाओं को दूर करने की कोशिश में, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि की हैसियत से राज्यपाल, रवि ने भरोसा दिलाया कि यह पवित्र वचन है जो भारत सरकार ने नगा जन को दिया है और यह भी कि 371, धारा-370 की तरह ‘अस्थायी’ नहीं है!

मोदी सरकार द्वारा बैठाए राज्यपाल के नाते, रवि ने 16अगस्त के अपने अभिनंदन समारोह में बेशक इस तरह के निराधार दावे भी किए कि धारा-370 और धारा-371 (ए) में कोई समानता ही नहीं है और इन दो अलग-अलग धाराओं के बीच समानता खोजने वाले या तो भ्रमवश ऐसा कर रहे हैं या शरारतन, आदि। फिर भी, यह स्वत: स्पष्ट  था कि वार्ताकार से राज्यपाल बने रवि को, इसका खतरा नजर आ रहा था कि केंद्र का कश्मीर धमाका, कहीं नागालैंड में बड़ी मेहनत के साथ बनी समझौते की सहमति पर पानी ही नहीं फेर दे। इस सिलसिले में उन्होंने यह रेखांकित करना भी जरूरी समझा कि, ‘इस समय हमारी जो वार्ताएं चल रही हैं उनमें भी, हम तो धारा-371 (ए) जो देती है, उससे कुछ फालतू ही लाने की कोशिश कर रहे हैं और उसे कमजोर किए जाने का कोई सवाल नहीं है बल्कि उसे और मजबूत करने का सवाल है।’

इस सब का अर्थ स्वत: स्पष्ट  है। यह भी याद रहे कि नगा समस्या के समाधान (Naga problem solutions) के लिए अब तक हुई वार्ताओं में, खुद के एन रवि के अनुसार ज्यादातर महत्वपूर्ण मुद्दों को हल कर लिया गया है। रवि के ही अनुसार, खुद प्रधानमंत्री मोदी तीन महीने में ही समझौता हुआ देखना चाहते हैं।

बहरहाल, इस प्रयास में नगाओं को विशेषाधिकार देने को, जिनमें ध्वज से लेकर पासपोर्ट तक की राष्ट ्रीय निशानियों के मामले में विशेषाधिकार भी शामिल बताए जाते हैं, समाधान के एक जरूरी घटक के रूप में देखा जा रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसके पीछे यह समझ भी होगी कि ऐसे ‘राष्ट्रीय निशानों’ को सबसे मनवाने की जिद के बजाए, ‘राष्ट्रीय एकीकरण’ के लिए संबंधित जनगण का विश्वास जीतना ज्यादा जरूरी है।

और जाहिर है कि किसी भी जनगण का विश्वास, उसके अधिकारों की समुचित सुरक्षा की गारंटी के जरिए, उसके लिए बराबरी तथा जरूरी स्वाधीनता सुनिश्चित कर के ही जीता जा सकता है।

वास्तव में इस सचाई को समझने के लिए किसी बहुत भारी राजनीतिक दूरदर्शिता की भी जरूरत नहीं है।

पर हजार सवालों का सवाल तो यह है कि जो स्वायत्तता नागालैंड के लिए अमृत है, जम्मू-कश्मीर के लिए जहर क्यों हो जाएगी? जो विशेषाधिकार नागालैंड के लिए समाधान का हिस्सा हैं, कश्मीर के लिए समस्या की जड़ कैसे हो सकते हैं?

लेकिन, यह तो तर्क की बात हुई। इस कॉमनसेंस के तर्क का भी मोदी सरकार के लिए कोई अर्थ नहीं है। तर्क का अर्थ होता तो अमित शाह एक ही सांस में धारा-370 को सारी बुराइयों की जड़ बताने के साथ ही संसद में यह एलान नहीं कर रहे होते कि देश के करीब आधा दर्जन राज्यों को कमोबेश वैसे ही विशेषाधिकार देने वाली धारा-371 को, छुआ तक नहीं जाएगा।

याद रहे कि बाहर वालों के लिए भूमि के स्वामित्व से लेकर, नौकरियों व सामाजिक सुविधाओं तक के मामले में, क्षेत्र या तबका-विशेष के विशेषाधिकारों को कानूनी रूप देने वाले विशेष प्रावधानों के दायरे में उत्तर-पूर्व के व अन्य पर्वतीय राज्य तथा गोवा जैसे विशेष राज्य ही नहीं आते हैं बल्कि आंध्र/ तेलंगाना तथा महाराष्ट्र जैसे कथित ‘मुख्यधारा’ के राज्य भी आते हैं। तब जम्मू-कश्मीर के विशेषाधिकारों को ही क्यों निशाना बनाया गया है?

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।

वर्तमान भाजपा और उसकी पूर्ववर्ती जनसंघ के जन्म से भी पहले से, आरएसएस जम्मू-कश्मीर के विशेषाधिकारों को ही निशाना क्यों बनाए रहा है? क्योंकि केंद्रीयकरण ही एकीकरण है और एकरूपता ही एकता के मूल सिद्धांत पर चलने वाले संघ परिवार को, अपनी इन मूल प्रवृत्तियों के जारी रहते हुए भी, राजनीतिक फायदे के लिए देश के दूसरे किसी भी राज्य में तो स्वायत्तता की दवा देना मंजूर हो भी सकता है, लेकिन देश इकलौते मुुस्लिम बहुल राज्य के लिए हर्गिज नहीं। उल्टे उन्हें तो जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे को भी छीनना था, ताकि उसे सीधे केंद्र से अपने फौजी बूट की एड़ी के नीचे दबाकर रख सकें।

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि 73वें स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने बाकायदा इसका एलान ही कर दिया है कि उनकी सरकार का इरादा दिल्ली से सीधे जम्मू-कश्मीर पर राज करने का है। उसे देश के दूसरे राज्यों जितनी स्वतंत्रता भी नहीं मिलेगी। यह रास्ता, ठीक इसी समय पर नगा समस्या के मामले में अपनाए रास्ते से ठीक उल्टा हो तो हुआ करे। यह रास्ता, कश्मीर को शेष भारत से और दूर धकेलने वाला, आतंकवाद को बढ़ाने वाला हो तो हुआ करे। जब तक यह रास्ता देशभक्ति के बहुसंख्यकवादी स्वांग के जरिए, देश की सत्ता पर संघ का शिकंजा मजबूत करता है, तब तक जो कश्मीर और देश भर के लिए जहर है, वही उनके लिए अमृत है।

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About राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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