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प्रेम, मनुष्य और ‘देवता’  :  नर-नारीश्वर   

प्रेम, मनुष्य और ‘देवता’  :  नर-नारीश्वर   

पुस्तक-समीक्षा

       – वीणा भाटिया

पेरुमल मुरुगन तमिल के सुप्रसिद्ध कवि, कहानीकार और उपन्यासकार हैं। समकालीन तमिल साहित्य में उनका स्थान बहुत ऊंचा है। उनकी कई कृतियों के अंग्रेजी में अनुवाद हो चुके हैं और वे विश्व स्तर पर चर्चित हुई हैं। पेरुमल मुरुगन का बहुचर्चित उपन्यास ‘मादोरुबागन’ वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ। इसका अंग्रेजी अनुवाद ‘वन पार्ट वूमन’ 2014 में प्रकाशित हुआ। कवि और अनुवादक मोहन वर्मा ने इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद ‘नर-नारीश्वर‘ नाम से किया है।

इस उपन्यास में एक ग़रीब निस्संतान दंपत्ति की कहानी है, जो एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। वे एक-दूसरे के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हैं। उनके जीवन में खुशियां ही खुशियां हैं, किसी चीज की कमी नहीं। लेकिन निस्संतान होने के कारण उन्हें समाज में कटाक्ष का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, परिवार वाले भी पति काली पर दूसरी शादी करने का दबाव बनाते रहते हैं। लेकिन काली सपने में भी दूसरा विवाह करने के बारे में सोच नहीं सकता। पत्नी पोन्ना के प्रति उसका प्रेम और समर्पण अटूट है। विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी संतान नहीं होने से पोन्ना को जब लोग बांझ कहते हैं, तो उसे मर्मांतक पीड़ा होती है। वहीं, पीठ पीछे काली को भी लोग नामर्द कह कर उसकी खिल्ली उड़ाते हैं। पर काली इन सब बातों की जरा भी परवाह नहीं करता। पोन्ना के साथ उसका वैवाहिक जीवन बहुत ही सुख भरा और संतोषप्रद है। काली और पोन्ना किसी नव दंपत्ति की तरह एक-दूसरे के आकर्षण में बंधे रहते हैं। उनका यह प्यार और समर्पण पूरे गांव में लोगों के लिए ईर्ष्या का भी कारण बन जाता है। लेकिन उनका कोई बच्चा न होना ही उनके जीवन की सबसे बड़ी कमी के रूप में उनके दुख का कारण होता है। इसके लिए वे सारे उपाय करते हैं। दवा-दारू, टोने-टोटके, धर्म स्थलों की यात्राएं, मनौतियां। लेकिन फिर भी पोन्ना गर्भधारण नहीं कर पाती। आखिर में काली इन सबसे बेपरवाह हो जाता है। पर परिवार और रिश्तेदारियों में यह सवाल हमेशा ही उठता है कि आखिर संतान नहीं होने पर इनका वारिस कौन होगा। इनका वंश कैसे चलेगा?

उस समय तमिलनाडु में यह परंपरा थी कि जिस स्त्री को अपने पति से संतान की प्राप्ति नहीं हो रही हो, वह अर्द्धनारीश्वर की रथयात्रा के विशेष उत्सव में जाकर स्वेच्छा से किसी भी अपरिचित पुरुष के साथ संबंध बना कर संतान प्राप्त कर सकती थी। इसमें किसी तरह का पाप नहीं माना जाता था और इस तरह से जो बच्चा होता था, उसे ईश्वर की संतान माना जाता था। बहुतेरी निस्संतान स्त्रियां हर साल लगने वाले इस रथयात्रा मेले में आती थीं और अनजान पुरुषों से संबंध बनाया करती थीं। इसे धार्मिक मान्यता प्राप्त थी।

जब किसी भी उपाय से काली और पोन्ना को संतान की प्राप्ति नहीं हुई तो काली की मां और उसकी सास इस निर्णय पर पहुंची कि पोन्ना को भी रथयात्रा में जा कर ‘देवता’ से संतान प्राप्त करना चाहिए। काली के सामने जब यह प्रस्ताव रखा गया तो वह बिफर पड़ा। लेकिन मना करने के बावजूद उस पर पोन्ना को रथयात्रा में भेजने का दबाव पड़ने लगा। जब उसने पोन्ना से इस बारे में पूछा तो उसने इसे उसकी इच्छा और स्वीकृति पर छोड़ दिया। इससे काली को लगा कि शायद पोन्ना रथयात्रा में जाकर ‘देवता’ से संतान हासिल करना चाहती है। यह सोचते ही उसकी व्यथा का पारावार न रहा। उसने साफ मना कर दिया। पोन्ना भी तैयार नहीं हुई। लेकिन पोन्ना को धोखे में रख कर बताया गया कि काली उसे रथयात्रा में भेजने के लिए तैयार हो गया है। इसके बाद पूर्व योजना के तहत पोन्ना को अलग से रथयात्रा में भेज दिया गया और काली का साला मुत्तु उसे लेकर पास ही कहीं और तफरीह करने के बहाने चला गया। काली यह समझता रहा कि पोन्ना अपने मायके वाले घर में है। उधर, पोन्ना ने काली की स्वीकृति समझ रथयात्रा में संतान के लिए ‘देवता’ के समक्ष समर्पण कर दिया।

उपन्यास का दुखांत वहां होता है जब अपने साले मुत्तु के साथ बहुत शराब पी लेने के बाद काली को पोन्ना से मिलने की प्रबल इच्छा होती है और वह बिना कुछ सोचे-समझे ससुराल की ओर चल पड़ता है। लेकिन रात के अंधेरे में जब वह ससुराल पहुंचता है तो दरवाजे पर ताला लटका पाता है। उसके होश फाख्ता हो जाते हैं। वह इधर-उधर देखता है, न बैल न बैलगाड़ी। वह समझ जाता है कि उसे धोखा दिया गया है। उसे धोखे में रख कर पोन्ना ‘देवता’ के पास चली गई। उसे लगता है कि उसका सारा अस्तित्व अब मिटता चला जा रहा है। वह उन्माद में दरवाजे से अपना सिर दे मारता है। फिर चीखता है – “पातर है तू!…तू छिनाल है…कुलक्षनी कहीं की….तुम सबके सब मिले हुए थे। तुम सबने मिल कर मुझे धोखा दिया।” और फिर वह रोने लगता है। इसके बाद घोर व्यथा में डूबा वह अपने गांव की तरफ लड़खड़ता चल पड़ता है। गांव में अपने घर के पास जब वह सुबह पहुंचता है तो एक पेड़ के नीचे पत्थर पर बैठ जाता है। “तूने मेरे साथ धोखा किया है।  तूने मेरे साथ कपट किया है…” कहते हुए काली पत्थर से फिसल कर जमीन पर गिर जाता है। यहीं उपन्यास का अंत हो जाता है।

मुरुगन का यह उपन्यास एक धार्मिक प्रथा के तहत होने वाली विडम्बनापूर्ण परिस्तिथियों का चित्रण करने के साथ मानवीय संबंधों की सूक्ष्म संवेदनाओं को सामने लाता है। यद्यपि अब ऐसी परंपरा का अस्तित्व नहीं है, पर एक ज़माने की कड़वी सच्चाई को बहुत ही यथार्थ रूप में सामने लाया गया है, जिसमें अंधविश्वास और धार्मिक परंपरा की आड़ में स्त्री का शोषण होता था। इस परंपरा की कड़ियां अभी पूरी तरह लुप्त नहीं हुई हैं। मुरुगन का लेखन इसी धार्मिक अंधविश्वास और धर्म की आड़ में किए जाने वाले शोषण पर प्रहार है। यही कारण है कि जब ‘मादोरुबागन’ का प्रकाशन हुआ तो हिंदूवादी और जातिवादी संगठनों ने इसका भारी विरोध किया और किताब की प्रतियां तक जलाईं। मुरुगन पर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगया गया और उन्हें धमकियां तक दी जाने लगीं। इससे निराश होकर 2015 में पेरुगन ने फेसबुक पर एक लेखक के रूप में अपनी मौत तक की घोषणा कर दी थी।

मोहन वर्मा ने इस उपन्यास का हिंदी अनुवाद कर बहुत ही महत्त्वपूर्ण काम किया है। अब हिंदी में अच्छी कृतियों के अनुवाद बहुत कम हो रहे हैं, जबकि अनुवाद ही दूसरी भाषाओं के साहित्य को जानने का एकमात्र माध्यम है। मोहन वर्मा के इस अनुवाद की खासियत यह है कि इसे पढ़ते हुए लगता ही नहीं है कि हम अनुवाद पढ़ रहे हैं। इसमें मूल रचना का आस्वाद मिलता है।

पुस्तक – नर-नारीश्वर (उपन्यास)

पेरुमल मुरुगन के तमिल उपन्यास मादोरुबागन (2010) का अनुवाद

अनुवादक – मोहन वर्मा

प्रकाशक – हार्पर हिन्दी (हार्परकॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया, नोएडा)

प्रकाशन वर्ष – 2017

मूल्य – 299 रुपए

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