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प्रतिकूलताओं से नई ऊर्जा लेता हुआ साल 2017… यथार्थ से पूरी तरह से कट गये हैं मोदी

अरुण माहेश्वरी  

इतिहास काल खंडों के चौखटे में ही रूप ग्रहण करता है अन्यथा वह महज एक प्रवाह, नितांत सामयिक और परिस्थितियों का एक क्षण-भंगुर सत्य रह जाता है। समय के एक प्रवाह में से काट कर चौखटाबंद किया गया कालखंड एक समय विशेष के विग्रह की तरह है जिसमें हम अलग से प्राण-प्रतिष्ठा करके उसे खुद में एक स्वाधीन सत्ता का रूप देते हैं, उसे अपनी एक आत्म-चेतना प्रदान करते हैं क्योंकि हम उसकी अपनी प्रवाह से एक अलग गति, अर्थात उसके गर्भ में पड़े हुए एक भिन्न भविष्य को देख रहे होते हैं।     

जब 2017 का साल शुरू हुआ था, चौतरफा बदहवासी की दशा थी। पूरा राष्ट्र सड़कों पर बैंकों के सामने कतारों में खड़ा हांफ रहा था क्योंकि हमारे देश में नौ सौ साल के अंतराल के बाद फिर से एक तुगलक का पुनर्जन्म हुआ था। बुद्धि और विवेक के सारे पैमाने बेकार दिखाई देते थे। खुद सरकार आकाश-पाताल एक कर दे रही थी, लेकिन उसे अपने तर्क के लिये कहीं सूई भर जगह भी नहीं मिल रही थी। काला धन, नकली मुद्रा, नगदी लेन-देन, प्लास्टिक मनि, डिजिटलाइजेशन और न जाने क्या-क्या — रास्ते में जो भी मिल जाए उसे ही पकड़ मोदी जी बैठ जा रहे थे कि हां, तुम ही हो हमारे लक्ष्य, हमारे इष्ट, हमारी सालों की साधना की परम सिद्धी ! लेकिन दूसरे ही क्षण, जैसे ही उन पर तथ्यों की रोशनी गिरती, वे सब कहीं हवा में गुम हो गये दिखाई देते। नोटबंदी का तर्क आज तक कोई नहीं ढूंढ पाया है, सिवाय इसके कि इसके जरिये भारत को तुगलकी प्रकार की कार्रवाइयों के असर को जानने दुनिया के लिये गिनिपिग, अर्थात बलि का बकरा बनाया गया।

इस प्रकार, हमारे इस साल 2017 का जन्म कुछ शनि की भारी दशा वाली परिस्थितियों में हुआ था, और हम भौचक हो यह देख पा रहे थे कि जिस शासक के पास कोई भविष्य दृष्टि नहीं होती, वह न सिर्फ वर्तमान में ही नाकारा साबित होता है, बल्कि वह समाज की सभी स्मृतियों को भी गड्ड-मड्ड कर देने का कारण बनता है। नोटबंदी के पहले ही गोगुंडों के कारनामें, और इतिहास के ठोस तथ्यों तक के साथ खिलवाड़ का काम शुरू हो गया था।

बहरहाल, एक ऐसी अशुभ घड़ी में जन्मे हमारे इस साल ने प्रतिकूल परिस्थितियों में ही कैसे अपने को तैयार करना शुरू किया, कैसे वह पागलपन के इस दौर से मुक्ति के मजबूत मंच का रूप लेने लगा, हमें लगता है यही इसकी स्वतंत्र सत्ता का ऐसा सत्व है, जिसकी कहानी हमें इस साल की विदाई और नये साल के आगमन के समय सुनाने की जरूरत है। तभी यह सिर्फ काल के प्रवाह की अनवरतता की नहीं, आने वाले समय के एक नये रूप का भी आख्यान हो सकता है। जो चल रहा है चल नहीं सकता तो आगे क्या आने वाला है, उसके संकेतों को खोजा ही जाना चाहिए।

नोटबंदी के बाद जीएसटी और फिर अर्थ-व्यवस्था में भारी गिरावट — इन सभी चीजों का साक्षी बने इस एक साल में हम यहां आर्थिक या अन्य राजनीतिक विषयों पर अपने को केंद्रित नहीं करेंगे क्योंकि अर्थ-व्यवस्था को पहुंचा जख्म भी अक्सर समय के साथ भरने लगता है और राजनीति के पट-परिवर्तन भी कभी-कभी निहायत रूटीन की तरह दिखाई देने लगते हैं। और इन विषयों पर हम नियमित चर्चा करते ही रहते हैं। लेकिन इस साल में एक अगस्त महीने का आखिरी हफ्ता कुछ इस प्रकार का रहा जो अपने अंदर संभावनाओं के बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्रों को प्रकाशित करता है। हमने इस पर पहले भी काफ विस्तार से लिखा था और और आज जब यह साल खत्म होने को हैं, हम इसी एक युगांतकारी से हफ्ते की कहानी को यहां दर्ज कराना चाहते हैं।

इस एक हफ्ते के सारे घटनाक्रम से ही ऐसा लगता है जैसे अब भारतीय राजनीति का यह 'गाय, गोबर, गोमूत्र, बीफ, बाबावाद, लव जेहाद, लींचिग और 'देशभक्ति' के शोर के युग के सारे लक्षण बिल्कुल प्रकट रोग के रूप में सामने आने लगे हैं और राष्ट्र के अस्तित्व के लिये ही इनका यथाशीघ्र इलाज करना जरूरी ही नहीं, शुरू भी हो चुका है। अर्थनीति के क्षेत्र में चल रही मूर्खताओं का भी इन चीजों से एक गहरा संबंध रहा है।

अगस्त महीने के इस अंतिम हफ्ते सुप्रीम कोर्ट का पहला फैसला आया मुस्लिम धार्मिक कट्टरपंथ पर एक तमाचा जड़ने वाला, तीन तलाक का फैसला। मुस्लिम कट्टरपंथ उसी दकियानूसी सोच के सिक्के का दूसरा पहलू है जो राजनीति में अभी के उपरोक्त 'गोबरवाद' के रूप में छाया हुआ दिखाई देता है — कह सकते हैं देश भर को कांग्रेस-विहीन बनाने के नाम पर गोबर और मूत्र से लीप देने का वाद। मुस्लिम कट्टरपंथ इसी के लिये खाद का काम करता रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस औरत-विरोधी सामाजिक प्रथा को अतार्किक स्वेच्छाचार घोषित करके गैर-कानूनी करार दिया और साफ शब्दों में कहा कि इस प्रथा का पालन अब कानूनन अपराध होगा। अब तो साल के अंत में, लोक सभा में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की रोशनी में ही इस विषय में बाकायदा कानून पारित हो चुका है, यद्यपि ऐसी चंद विकृतियों के साथ जो हमारे मौजूदा शासक दल के लोगों की विकृत मानसिकता से उत्पन्न हुई है।

तीन तलाक पर फैसले के दूसरे दिन ही, 24 अगस्त 2017 को सचमुच सुप्रीम कोर्ट ने फिर वह कर दिखाया, जो आरएसएस और मोदी के लिये किसी कहर से कम नहीं था। इसे कह सकते हैं — भारत में एक नई संवैधानिक क्रांति। भारतीय संविधान के इतिहास में लगता है अब तक का एक सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर ; निजता के अधिकार पर सर्वसम्मत (9-0) फैसला। ऐसा निर्णय जिसे वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो कहना होगा कि अगर राजशाही के ज़माने में 1804 की नेपोलियन संहिता ने दुनिया में राज्य और नागरिक के अधिकारों के रूप को बदल डाला था तो आज भारत के सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला डिजिटल युग में सारी दुनिया में इन अधिकारों के पुनर्विन्यास का हेतु बनेगा।

उधर मोदी सरकार ने आधार कार्ड से लेकर अपनी नाना योजनाओँ से भारत के नागरिकों को पूरी तरह से राज्य का गुलाम बना देने का जो जाल बुनना शुरू किया था, सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से जैसे एक झटके में उसे छिन्न-भिन्न कर दिया। येन केन प्रकारेण चुनाव जीत कर आई सरकार नागरिक के अधिकारों से ऊपर नहीं है, संविधान की रक्षा के लिये ज़िम्मेदार न्यायपालिका के लिये जनतंत्र और नागरिक की रक्षा जरूरी है — इस बात की सुप्रीम कोर्ट ने मकान की छत पर खड़े हो कर घोषणा की।

जिस सुप्रीम कोर्ट ने चंद महीनों पहले ही बहुत साफ सबूतों के होते बिड़ला-सहारा पेपर्स के मामले में मोदी पर जांच की मांग का संज्ञान लेने से इंकार कर दिया था, उसी ने उसके सारी सत्ता को हड़प लेने के और पूरे समाज को अपने इशारों पर नचाने के इरादों के रास्ते में एक प्रकार की स्थायी बाधा पैदा कर दी। इसने एक बहुमतवादी समाज के फासिस्ट रूझान, कि कोई क्या पहनेगा, कोई क्या खायेगा इसे बहुमत के स्वघोषित प्रतिनिधि तय करेंगे की तरह की जघन्य और जंगली अवधारणा को भारत से दूर रखने का एक निर्णायक काम किया है।

इस विषय पर जब भारत सरकार के पूर्व एटर्नी जनरल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पूरी बेशर्मी से कहा था कि किसी भी नागरिक का अपने खुद के शरीर पर भी अधिकार नही है, और अभी के एटर्नी जनरल वेणुगोपाल ने और दो कदम आगे बढ़ते हुए कहा कि “जो लोग सरकारी खैरातों पर पलते हैं, उनकी निजता का कोई अधिकार नही हो सकता हैं। यह सिर्फ संपत्तिवानों की चोचलेबाजी है।” इस पर न्यायमूर्ति जे चेलमाश्वर ने अपनी राय में लिखा कि संविधान के बारे में यह समझ बिल्कुल “बचकानी और संवैधानिक व्याख्याओं के स्थापित मानदंडों के विपरीत है”।…“नागरिकों के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रताओं के प्रति यह दृष्टिकोण हमारी जनता की सामूहिक बुद्धिमत्ता और संविधान सभा के सदस्यों के विवेक का अपमान है।”

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने कहा कि “निजता का अधिकार एक मूलभूत अधिकार है ; यह वह अधिकार है जो व्यक्ति के अंतरजगत में राज्य के, और राज्य के बाहर के लोगों के हस्तक्षेप से उसे बचाता है और व्यक्ति को स्वायत्त हो कर जीवन में चयन की अनुमति देता है।

“घर के अंदर की निजता में परिवार, शादी, प्रजनन, और यौनिक रुझान की सुरक्षा ये सब व्यक्ति की गरिमा के महत्वपूर्ण पहलू हैं।” सर्वोपरि, अपने अलावा अन्य चार जजों की ओर से भी लिखे गये न्यायमूर्ती डी वाई चंद्रचूड़ के फैसले ने इस विषय से जुड़े सभी अहम मुद्दों को समेटते हुए लिखा कि “ निजता का अधिकार मनुष्य के सम्मान-बोध का एक तत्व है। निजता की पवित्रता सम्मान के साथ जीवन से इसके कारगर संबंध में निहित है। निजता इस बात को सुनिश्चित करती है कि एक मनुष्य अपने मानवीय व्यक्तित्व के एकांत में बिना अवांछित हस्तक्षेप के सम्मान के साथ जी सकता है।”

इसके बाद, इस हफ्ते के नये घटना-क्रम की बहुत सी कमियों को जैसे पूरा कर दिया गुरमीत राम रहीम मामले में 'तोता' मान ली गई सीबीआई की अदालत ने। जिस शैतान के सामने 'हर विरोधी का पत्ता साफ कर दो' की तरह की माफियाई तर्ज पर काम करने वाले अमित शाह अपने नेतृत्व में हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर सहित पूरे मंत्रिमंडल को दंडवत करा आए थे, उस शैतान को सीबीआई की अदालत ने (शायद जीवन भर के लिये) जेल भेज दिया।

इसके अलावा, इधर राजनीति के मोर्चे पर जब अमित शाह कांग्रेस के सारे कूड़े से भाजपा को कांग्रेस का कूड़ाघर बना कर अपनी अपराजेयता का ढिंढोरा पीट रहे थे, उसी समय एड़ी-चोटी का पसीना एक कर देने, खुले आम विधायकों का मोल-भाव करके कुछ को खरीद लेने पर भी वे गुजरात से राज्य सभा में कांग्रेस के प्रत्याशी अहमद पटेल को जाने से रोक नहीं सके। और इस मामले में भी उनकी योजना को विफल बनाया उन्हीं के लाये हुए चुनाव आयुक्त ने, लेकिन वास्तव में एक और संवैधानिक संस्था ने ! और साल के अंत तक जाते-जाते गुजरात चुनाव से ही पता चला कि जो थोड़ी सी सत्ता पाकर अपने को त्रिलोकीनाथ मान अनादि-अनंत काल तक का राजा समझ लेने का घमंड दिखाने लगते हैं, वे वास्तव में अपने घमंड के अनुपात में ही कितनी कमजोर बालूई जमीन पर खड़े होते हैं।

कहना न होगा, किसी भी ठोस और चाक्षुस चीज को लेकर जितना भी कोई 'अनादि-अनंत' वाली छंटा क्यों न बनाये, कुछ प्रकृति के अपने नियम के अनुसार ही, और बहुत कुछ इस कोरी छटा के अपने छद्म और धुए की मात्रा के कारण ही बहुत तेजी के साथ, बल्कि एक विस्फोट की शक्ल में उस चीज के अपना बिना कोई चिन्ह छोड़े हवा में काफूर होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। इतिहास में इसे ही संयोग का बिंदु कहा जाता है। जमा हो रहे अंतर्विरोधों के विस्फोट का बिंदु ; जितनी तेजी से ये अंतर्विरोध पनपते हैं, उतनी ही तेजी से उस घटना-चक्र का अंत भी हो जाता है। और यह बहुत कुछ खुद उसके अपने अंतर के सार-तत्व की प्रकृति के कारण ही होता है।

लातिन अमेरिकी उपन्यासकार गैब्रियल गार्सिया मार्केस ने अपने एक सबसे प्रमुख उपन्यास 'आटम आफ पैट्रियार्क' में एक तानाशाह के जीवन को अपना विषय बनाया है। तानाशाहों का अध्ययन करना उनकी दिलचस्पी का एक प्रमुख विषय था। अपने एक साक्षात्कार में वे कहते हैं — “आपके पास जितनी ज्यादा शक्ति होगी, उतना ही ज्यादा आपके लिये यह जानना कठिन होगा कि आप से कौन झूठ बोल रहा है और कौन नहीं। जब आप परम सत्ता तक पहुंच जाते हैं, यथार्थ से आपका कोई संपर्क नहीं रह जाता है, और वही संभवत: सबसे बुरे प्रकार का एकाकीपन होता है। एक अत्यंत शक्तिशाली आदमी, एक तानाशाह, स्वार्थों और ऐसे लोगों से घिर जाता है जिनका अंतिम उद्देश्य होता है उसे यथार्थ से काट कर रखना; उनके सारे काम उसे अलग-थलग रखने के लिये होते हैं।

हमारे प्रधानमंत्री मोदी क्रमश: इसी दशा में चले गये हैं। अवस्था इतनी खराब है कि हाल के गुजरात के चुनाव में राहुल गांधी ने उनके सामने जितने सवाल रखे, एक का भी उनके पास कोई जवाब नहीं था। वे बगले झांकते हुए पाए गए क्योंकि वे यथार्थ से पूरी तरह से कट गये है। आने वाले दिनों में इसके राजनीतिक परिणामों को उन्हें भुगतना ही होगा।  

 

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