मोदी का बोफोर्स, रफाल

रफाल लड़ाकू विमान सौदा Rafael fighter plane deal, वाकई नरेंद्र मोदी का बोफोर्स Narendra Modi's Bofors सौदा साबित होने जा रहा है। कम से कम वरिष्ठ सम्मानित पत्रकार/ संपादक, एन राम N Ram के द हिंदू The Hindu में इस सौदे के संबंध में ताजातरीन रहस्योद्घाटन के बाद इसमें कोई शक नहीं रह जाना चाहिए …
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रफाल लड़ाकू विमान सौदा Rafael fighter plane deal, वाकई नरेंद्र मोदी का बोफोर्स Narendra Modi's Bofors सौदा साबित होने जा रहा है। कम से कम वरिष्ठ सम्मानित पत्रकार/ संपादक, एन राम N Ram के द हिंदू The Hindu में इस सौदे के संबंध में ताजातरीन रहस्योद्घाटन के बाद इसमें कोई शक नहीं रह जाना चाहिए कि आने वाले आम चुनाव में यह सौदा, मोदी सरकार के लिए गले में पड़ा चाकी का पाट साबित होने जा रहा है। बेशक, इस ताजातरीन रहस्योद्घाटन का महत्व इस बात से काफी बढ़ जाता है कि बहुत ही श्रमसाध्य तथा स्रोतसंपन्न छानबीन के आधार पर यह रहस्योद्घाटन, उन्हीं एन राम की कलम से निकला है, जिनका करीब तीन दशक पहले, बोफोर्स घूसखोरी कांड Bribery case का भंडाफोड़ करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा था। वास्तव में बोफोर्स के रहस्योद्घाटन के क्रम में एन राम तथा उनके साथियों ने, भारत में निर्भीक खोजी पत्रकारिता का ही बहुत ऊंचा मानक स्थापित किया था। अचरज नहीं कि एन राम के किसी भी रहस्योद्घाटन से तथ्याधारितता तथा ईमानदारी के ऐसे ही ऊंचे मानक की अपेक्षा की जाती थी और ताजा रहस्योद्घाटन अपनी सटीकता में, इस मानक पर पूरी तरह से खरा उतरता है।

राजेंद्र शर्मा

          फिर भी, इस रहस्योद्घाटन का महत्व सिर्फ या मुख्यत: इसीलिए नहीं है कि इसके साथ बोफोर्स सौदे को बेनकाब करने के लिए विख्यात, एन राम की साख और उनका नाम जुड़ा हुआ है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि यह रहस्योद्घाटन, रफाल सौदे के सचाइयों पर सरकार द्वारा डाले गए सात पर्दों को चीर कर, इस सौदे के सिलसिले में सरकार की ओर से बार-बार किए गए इसके दावों के झूठ को पूरी तरह से उजागर कर देता है कि नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप से अंतत: जो सौदा किया गया है, यूपीए की पहल पर किए जा रहे समझौते से कहीं बेहतर था। याद रहे कि यूपीए के दौर में 2007 से शुरू हुई श्रमसाध्य तथा काफी पारदर्शी प्रक्रिया के जरिए, वायु सेना की जरूरतों के आधार पर, सबसे उपयुक्त विमानों में सबसे सस्ता पडऩे के आधार पर, 126 रफाल मीडियम लड़ाकू विमानों की खरीद की प्रक्रिया शुरू की गयी थी। इसमें से कुल 18 विमान, पूरी तरह से तैयार स्थिति में, जिसमें भारत की जरूरतों के हिसाब से 13 महत्वपूर्ण विशिष्ट बदलाव/ सुधार भी शामिल थे, फ्रांसीसी कंपनी दॅसां द्वारा मुहैया कराए जाने थे, जबकि शेष 108 विमान इसी कंपनी के साथ लाइसेंस-आधारित समझौते के जरिए, भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी आयुध कंपनी Ordnance Company, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड Hindustan Aeronautics Limited, (एचएएल) द्वारा जाहिर है कि भारत में ही बनाए जाने थे।

          बहरहाल, 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री ने पेरिस में, फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति ओलांद के साथ मुलाकात के बाद, एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में एकाएक, रफाल विमानों की खरीद की उक्त प्रक्रिया को निरस्त करने का एलान कर दिया और उसकी जगह पर, उसी दॅसां कंपनी से, कुल 36 रफाल मीडियम लड़ाकू विमान, पूरी तरह से तैयार स्थिति में खरीदने का एलान कर दिया। क्योंकि सभी विमान पूरी तरह से तैयार स्थिति में खरीदे जाने थे, ये विमान बनाने में एचएएल की कोई भूमिका ही नहीं रह गयी। दूसरी ओर साठ हजार करोड़ रु0 से ज्यादा की इस खरीदी से जुड़े आफसैट्स यानी ऐसी खरीदी की कीमत के एक निश्चित हिस्से के बराबर, भारतीय स्रोतों से ही खरीदे जाने की शर्त को पूरा करने के लिए, दॅसां ने निजी क्षेत्र की भारतीय कंपनियों से समझौते किए, जिनमें अनिल अंबानी की कंपनी का नाम सबसे आगे है, जो नये रफाल सौदे से दस दिन पहले ही खोली गयी थी। प्रधानमंत्री मोदी, जैसाकि अब नियम ही बन गया है, जिन उद्योगपतियों को इस दौरे में अपने साथ ले गए थे, उनमें अनिल अंबानी शामिल थे।

          स्वाभाविक रूप से पिछले कुछ समय से, विपक्षी राजनीतिक पार्टियों समेत विभिन्न हलकों से, प्रधानमंत्री की पहल पर किए गए नये रफाल सौदे पर, मोटे तौर पर सवाल उठते रहे हैं। जाहिर है कि पहला सवाल तो नये सौदे में रफाल विमान की कीमत का ही है। मोदी सरकार पर यूपीए के प्रस्तावित सौदे की तुलना में काफी ज्यादा दाम पर वही विमान खरीदने के आरोप लगते रहे हैं। इन आरोपों के जवाब में मोदी सरकार दुहरी कार्यनीति अपनाती रही है। एक ओर तो वह औपचारिक रूप से यह दावा करती रही है कि इस सौदे से जुड़े ‘गोपनीयता’ संबंधी प्रावधान के चलते, भारत सरकार कीमतों का ब्यौरा दे ही नहीं सकती है। इसी तर्क से संसद तक को नये सौदे में रफाल विमान की वास्तविक कीमत के संबंध में अंधेरे में रखा जाता रहा है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के सामने भी, सीलबंद लिफाफे में ही सरकार ने कीमत संबंधी जानकारी रखी थी। यह दूसरी बात है कि इसके साथ ही द्विअर्थक वाक्य रचना के सहारे सरकार ने बड़ी चतुराई से सुप्रीम कोर्ट के मन में यह धारणा बनायी थी कि कीमतों के ब्यौरे की नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक द्वारा तथा संसद की लोक लेखा समिति द्वारा छानबीन की गयी थी और संवेदनशील हिस्सों का छोडक़र, उसकी रिपोर्ट संसद के सामने रखी गयी थी। वास्तव में, ठीक इसी तर्क के आधार पर कि संसद तक इस मुद्दे की छानबीन हुई है और इस पूर्वाधार को अपनाकर कि खुद अदालत ऐसे मामले में कीमतों पर किसी स्वतंत्र निर्णय पर पहुंचने में समर्थ नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने रफाल सौदे पर अपनी कथित ‘क्लीन चिट’ दी थी।

          दूसरी ओर, सरकार के विभिन्न प्रवक्ताओं द्वारा पूरे विवरण देेने में असमर्थता जताते हुए भी, इस तरह के दावे किए जाते रहे हैं कि वास्तव में, यूपीए के समय में विमान की जो प्रस्तावित कीमत थी, उससे 9 फीसद कम दाम पर मोदी सरकार ने रफाल विमान खरीदा है। इसी धारणा को पुख्ता करने के लिए, सरकार में विभिन्न स्तरों से छांट-छांटकर कीमतों के संबंध में जानकारियां लीक की जाती रही हैं। सरकार के इन दावों की कोई वास्तविक परीक्षा अब तक इसीलिए संभव नहीं थी कि सरकार, कीमतों का आधिकारिक विवरण को गोपनीयता की ओट में छुपाए रही है। उधर, इस प्रकार के तर्क उछालकर कि विमानों में भारत की जरूरत के हिसाब से बदलाव कराए गए हैं, जिनकी कीमत नहीं बतायी जा सकती है और जिन्हें हिसाब में लिए बिना दो सौदों की कीमतों की कोई तुलना हो ही नहीं सकती है और यह भी कि 2007 में शुरू हुई प्रक्रिया में प्रस्तावित कीमत से, 2016 में हुए सौदे की कीमत की तुलना कोई कर ही कैसे सकता है, मोदी सरकार कीमतों के सवाल को इतना धुंधला कर देने की कोशिश करती रही है, कि उस पर कोई वास्तविक चर्चा ही नहीं हो सके।

          एन राम का रहस्योद्घाटन सबसे महत्वपूर्ण रूप से, कीमतों के सवाल पर जान-बूझकर फैलायी गयी इसी धुंध को हटाने का बहुत ही जरूरी काम करता है। विभिन्न देशी-विदेशी स्रोतों की छानबीन कर, वह न सिर्फ कीमतों के वास्तविक आंकड़े सामने लाते हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट करते हैं कि मोदी सरकार के सौदे में, रफाल विमान ही नहीं, खास भारत के लिए मांगे गए बदलाव भी जस के तस बने रहे हैं। बदलाव सिर्फ इतना किया गया है कि भारतीय वायु सेना की 126 विमानों की मांग को घटाकर 36 तक सीमित कर दिया गया है और ये सारे विमान तैयारशुदा आने हैं, जबकि पहले कुल 18 विमान तैयारशुदा आने थे और शेष 108 एचएएल में बनने थे। यानी सिर्फ बुनियादी रफाल विमानों की ही नहीं, बदलावों से पूरी तरह से सज्जित विमानों की कीमतों की तुलना भी पूरी तरह से वैध है। जाहिर है कि इस तुलना के लिए आसानी से, इस बीच की अवधि में हुई कीमतों में बढ़ोतरी को भी हिसाब में लिया जा सकता है, जिसका प्रावधान समझौते की मूल बोली में ही किया गया था। सब मिलाकर, नये सौदे में एक रफाल विमान का दाम, मोदी सरकार के 9 फीसद सस्ता विमान ले आने के दावे के विपरीत, पहले प्रस्ताव के मुकाबले पूरे 41.42 फीसद ज्यादा बैठता है।

          एन राम के अनुसार यह हिसाब, जिसे उनकी रिपोर्ट के हफ्ते भर बाद भी सरकार की ओर से कोई चुनौती नहीं दी गयी है, इस प्रकार है। 2007 में जब मूल प्रस्ताव पर सहमति बनी थी, दॅसां ने एक विमान की कीमत 7 करोड़ 93 लाख यूरो लगायी थी। प्रस्ताव में जुड़े कीमत में बढ़ोतरी के फार्मूले के अनुसार, 2011 तक यह कीमत, 10 करोड़ 6 लाख 50 हजार यूरो हो चुकी थी। 2016 में मोदी सरकार ने 2011 की कीमतों पर, 9 फीसद की छूट हासिल कर ली, लेकिन यह छूट 36 विमानों पर मिल रही थी। इस तरह अंतत: एक विमान की कीमत 9 करोड़ 17 लाख 50 हजार यूरो तय हुई। इसके साथ ही भारत की मांग के अनुसार बदलावों के लिए दॅसां ने जो 1.4 अरब यूरो के की मांग की थी, उसे भी सौदेबाजी कर के भारत ने 1.3 अरब यूरो करा तो लिया, लेकिन यह एक बार का खर्चा नये सौदे में कुल 36 विमानों पर बंटा है, जबकि पहले यही खर्चा 126 विमानों पर बंटना था। इस तरह यह खर्चा प्रति विमान 3 करोड़ 61 लाख 10 हजार यूरो हो गया, जबकि मूल सौदे में यह सिर्फ 1 करोड़ 11 लाख 10 हजार यूरो होने जा रहा था। जाहिर है कि सिर्फ 36 तैयारशुदा विमान खरीदने के फैसले ने पूरा गणित ही बदल दिया और प्रति विमान दाम, मूल सौदे से 41.42 फीसद ज्यादा हो गया।

          एन राम अपनी रिपोर्ट में दो और मुद्दों पर विस्तार से रौशनी डालते हैं। पहला, यह कि किस तरह, हर चरण में खुद सरकार द्वारा गठित खरीदी वार्ता कमेटी, कीमत समेत विभिन्न पहलुओं से नये सौदे की उपयुक्तता पर विभाजित थी और हर बार फैसला तीन के मुकाबले, चार के बहुमत के बल पर लिया गया था, जबकि रक्षा मंत्री आम तौर पर इस प्रक्रिया से दूर ही रहे थे। दूसरा यह कि जब रफाल का प्रति विमान दाम इतना बढ़ गया था, यूरो फाइटर की प्रतिद्वंद्वी पेशकश को, जो 20 फीसद कम दाम पर ही नहीं, दूसरी जगहों से मोडक़र समय से पहले आपूर्ति देने की भी पेशकश कर रहा था, कम से कम रफाल पर दबाव डालकर कीमत कम कराने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? बेशक, अगर सुरक्षा तकाजों की अर्जेंसी की वजह से ही तैयारशुदा 36 विमान खरीदना जरूरी समझा जा रहा था, जैसा कि सरकार का दावा है, तो यूरोफाइटर के विकल्प पर भी सोचा जा सकता था, जिसे मैदानी परीक्षणों में पूरी तरह से तुलनीय पाया गया था। वास्तव में, यूरोफाइटर के मुकाबले रफाल को बेहतर विकल्प कीमत के आधार पर ही माना गया था, जबकि नये सौदे में कीमत का संतुलन पूरी तरह से बदल गया था और नयी जरूरतों के हिसाब से यूरोफाइटर ही बेहतर विकल्प हो गया था। इसके बावजूद, सीधे प्रधानमंत्री मोदी के फैसले पर, पहले प्रस्ताव से डेढ़ गुने से कुछ ही कम दाम पर, रफाल विमान खरीदा गया।

          इसके ऊपर से एक तरफ तो वायु सेना की 126 विमानों की गहन व विस्तृत आकलन के बाद तय की गयी जरूरत के मुकाबले, सिर्फ 36 विमान खरीदने का फैसला लिया गया था और दूसरी तरफ नये सौदे में कोई वास्तविक अर्जेंसी भी नहीं थी क्योंकि मूल सौदे के निरस्त किए जाने के साढ़े तीन साल बाद भी कोई विमान नहीं आए हैं, जबकि मूल सौदे के अनुसार 18 तैयारशुदा विमानों के आने का सिलसिला अब तक शुरू भी हो चुका होता। इस सौदे को भारत के लिए और भी नुकसानदेह बनाते हुए, सामान्यत: रक्षा खरीदों में रखा जाने वाला ‘‘फोलोऑन’’ प्रावधान भी इसमें नहीं रखा गया है, जिसके जरिए यह सुनिश्चित किया जा सकता था कि जरूरत होने पर मूल ऑर्डर की आधी और मात्रा उन्हीं शर्तों पर हासिल होती। इस तरह, इस सौदे में विमान करीब डेढ़ गुना महंगा ही नहीं पउ़ा है, इसमें वायु सेना के वास्तविक हितों की और एचएएल की अनदेखी के जरिए, देश के वृहत्तर सुरक्षा हितों की भी अनदेखी की गयी है। और फ्रांसीसी कंपनी दॅसां के अलावा इस सौदे में अगर किसी का फायदा हुआ है, तो वह अनिल अंबानी की कंपनी है।

          बेशक, एन राम बोफोर्स कांड और रफाल कांड के एक बड़े अंतर की ओर भी इशारा करते हैं कि, कम से कम अब तक रफाल सौदे में ‘मनी ट्रेल’ सामने नहीं आयी है। लेकिन, जैसाकि सीपीएम समेत कई विपक्षी पाॢर्टयों ने पहले ही रेखांकित किया है, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएएल का पत्ता काटकर, अनिल अंबानी की कंपनी का लाभ बटोरना, ‘मनी ट्रेल’ का ही तो हिस्सा है, हालांकि यह मनी ट्रेल निजी भुगतान की न होकर, संस्थागत भुगतान की है। दुर्भाग्य से इस संस्थागत भुगतान की सत्ताधारी पार्टी तक  की यात्रा को अब कभी उजागर नहीं किया जा सकेगा क्योंकि यह यात्रा चुनावी बांड के माध्यम से, सत्ताधारी पार्टी को अवैध भुगतान, कानूनी किंतु पूरी तरह से गोपनीय तरीके से किए जाने का रूप ले रही होगी। यही है मोदी के भ्रष्टाचारविरोधी अभियान की हकीकत। कमीशनखोरी का नाम बदलकर अब कार्पोरेट चुनावी चंदा कर दिया गया है। अचरज नहीं कि ऐसा लगभग सारा का सारा चंदा, मोदी जी की पार्टी को ही मिल रहा है।

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