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Mahendra Mishra

गुजरात का नया ‘पिंजड़ा मॉडल’-तड़ीपार जनरल डायर हो गए, अब बारी मोटा भाई की

गुजरात में सभा का नया ‘पिंजड़ा मॉडल’-तड़ीपार जनरल डायर हो गए, अब बारी मोटा भाई की

महेंद्र मिश्र

भाजपा (BJP) अध्यक्ष अमित शाह। अभी तक तड़ीपार थे। कल से जनरल डायर हो गए। यह नया उपनाम उन्हें गुजरात के पाटीदारों (Patidars of Gujarat) ने दिया है।

कल सूरत में सभा और मंच के बीच भाजपा (BJP) को जाली लगानी पड़ी। यह गुजरात में सभा का नया ‘पिंजड़ा मॉडल’ है। शायद ही देश के किसी हिस्से में अब तक किसी पार्टी या नेता को इसका उपयोग करना पड़ा हो।

यह सब कुछ पाटीदारों के गुस्से से बचने के लिए किया गया था। लेकिन कोई तरकीब काम नहीं आयी।

आखिरकार गुस्सा फूटा। और अमित शाह को महज चार मिनट के भाषण के बाद ही मंच छोड़कर भागना पड़ा।

यह विरोध उस समय हुआ जब मंच पर भाजपा (BJP) के आला नेता मौजूद थे। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, मुख्यमंत्री रूपानी, केंद्रीय मंत्री रुपाला, पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल और भाजपा (BJP) के सारे दिग्गज पटेल नेता एक साथ। सब मंच की शोभा बढ़ा रहे थे।

पाटीदारों के इस विरोध ने साबित कर दिया है कि आंदोलन की आग अब भाजपा (BJP) नेताओं के दरवाजे तक पहुंच गई है।

गुजरात मेरे लिए अब तक एक पहेली ही रहा है।

सुलझाने की बहुत कोशिशों के बाद भी गुजरात की गुत्थी उलझी ही रही है। मुझे लगता था कि जिस राज्य से 74 के छात्र आंदोलन की शुरुआत हुई हो, जिसके नौजवानों ने नवनिर्माण आंदोलन की अगुवाई की हो। इंदिरा निरंकुशता के खिलाफ जिसने आंदोलन का रास्ता दिखाया हो।

ज्ञात हो कि यह लड़ाई एक छोटे से मसले से शुरू हुई थी। जिसमें एक छात्रावास के मेस में भोजन की कीमतों में वृद्धि का छात्र विरोध कर रहे थे। ऐसे में अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ने वाला यह नौजवान कैसे चुप बैठ सकता है? वहां की ईमानदार जनता कैसे हाथ पर हाथ धरे बैठी रह सकती है?

एक भ्रष्ट और निरंकुश सत्ता चलती रहे और गुजरात की जनता मौन साधे रहे। यह कैसे हो सकता है?

इन सारे सवालों के जवाब खोजने मुश्किल हो रहे थे।

भ्रष्टाचार सिर्फ निजी बैंक बैलेंस ही नहीं होता है। जनता की लूट में पूंजीपतियों के साथ हिस्सेदारी को भी भ्रष्टाचार कहते हैं। यह भ्रष्टाचार का नया मॉडल है। संस्थागत भ्रष्टाचार। जिसमें पार्टी के खर्चे समेत सारी चीजें सीधे पूंजीपति देख रहे होते हैं। नोटों के पार्टी और नेता के साथ लेन-देन करने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। लेकिन अब तस्वीर धीरे-धीरे साफ हो रही है।

सरकार कारपोरेट की सेवा में लगी थी। और पार्टी जाति और धर्म के डंडे से समाज को हांक रही थी।

दूसरे शब्दों में कहें तो कारपोरेट के लिए मलाई थी और जनता के लिए धर्म और संस्कृति का नशा

मोदी जी ने धर्म की अफीम को सांप्रदायिकता की भांग में तब्दील कर दिया था।

अफीम किसी शख्स को सुला देती है। जबकि भांग उसे उत्तेजक और आक्रामक बनाती है।

मोदी जी का 12 सालों का शासन अल्पसंख्यकों के खिलाफ सांप्रदायिक गुस्से और गोलबंदी का नतीजा था। लेकिन जैसे ही नशा उतरा और लोग हकीकत से रूबरू हुए। तस्वीर सामने है।

गुजरात का सबसे मजबूत समुदाय पटेल सड़कों पर है।

उसे आरक्षण चाहिए। आरक्षण कुछ और नहीं बल्कि रोजगार की जरूरत की ही एक अभिव्यक्ति है। और अगर उस व्यवस्था में पटेल संतुष्ट नहीं हो सके। तो बाकी कमजोर तबकों के हालात के बारे में आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।

यहां दलितों के सम्मान की न्यूनतम गारंटी तक नहीं हो सकी। और उनका रोष आज सामने है। इस तरह से चंद उच्च मध्यवर्ग और कारपोरेट को छोड़ दिया जाए।

तो पटेल से लेकर अल्पसंख्यक और दलित से लेकर किसान सरकार के खिलाफ खड़े हैं।

अब हालात ऐसे मुकाम पर पहुंच गए हैं। जहां से सरकार को पीछे लौटना मुश्किल हो रहा है।

जनता का कोई भी कल्याण कारपोरेट के मुनाफे की कीमत पर होगा। जिसे वह होने नहीं देगा।

ऐसे में आगे कुंआ पीछे खाईं वाला हाल है। एक को पकड़ने का मतलब दूसरे का छूटना।

सांप्रदायिकता वैसे भी काठ की हांडी बन चुकी है। जनता उसे चढ़ने नहीं देगी, क्योंकि सारे तबके जागरूक हो गए हैं।

अनायास नहीं 2002 के दंगों का चेहरा मोची आज सरकार के खिलाफ और दलित आंदोलन के साथ है।

मोदी साहब देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री होंगे जिनसे उनके गृह प्रदेश की जनता इतनी नाखुश है।

इस मामले में मनमोहन सिंह और नरसिंहाराव भी इनसे ज्यादा भाग्यशाली निकले।

दरअसल 12 सालों के अपने शासन में मोदी साहब ने गुजरात की जनता का हर तरीके से दोहन किया। जनता को भी अपने इस्तेमाल होने का अहसास होने लगा था। अपने खिलाफ विपक्ष की किसी आलोचना को वो 6 करोड़ गुजरातियों के अपमान से जोड़ने में देरी नहीं लगाते थे। वह भी इस भावनात्मक शोषण से अब ऊब गई थी। और अब सच्चाई का पता चलने पर उसका रुख लोगों के सामने है।

मोदी जी यही कोशिश राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रवाद के जरिये करना चाह रहे हैं। जिसमें उनके समर्थक उनकी किसी भी आलोचना को राष्ट्रद्रोह करार देते हैं। पूरे मीडिया को इस अभियान में लगाने के बावजूद यह तरकीब बहुत काम करती नहीं दिख रही है।

और मौके-मौके पर उनकी कलई खुल जा रही है।

रूपानी को मुख्यमंत्री बनाते समय अमित शाह ने सब कुछ संभाल लेने का मोदी जी को भरोसा दिलाया था। लेकिन कोर्ट के तड़ीपार के बाद अब जनता ने भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

ऐसे में अपने घर से भगाए गए शख्स को पराया सूबा भी कितना इज्जत बख्शेगा। और कहीं खुदा न खास्ता यूपी की जनता ने भी उन्हें चुनावों के घाट पर धोबीपटकनी दे दी। तो मोटा भाई के पास भी किस मुंह से जाएंगे। या फिर मोटा भाई भी क्या उनका मुंह देखने के काबिल बचेंगे। क्योंकि इसके साथ ही 2019 की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी।

गुजराती जड़ सूखने के बाद देश के पेड़ के कितने दिनों तक हरे भरे रहने की उम्मीद की जा सकती है? यानी फिर बारी मोटा भाई की होगी।

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