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Modi and Trump in Howdy Modi at Houston
रविवार 22 सितंबर 2019 को हौस्टन (Houston, TX) के एनआरजी स्टेडियम (NRG Stadium) में हाउडी मोदी (Howdy modi) में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

नया भारत – नए आयकन – नए राष्ट्रपिता? मोदी ने खुद अपने आप को किस तरह हास्यास्पद बनाया है

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस (Amrita Fadnavis, wife of Maharashtra Chief Minister Devendra Fadnavis) पिछले दिनों एक अलग किस्म के विवाद में उलझी दिखीं। दरअसल जनाब नरेन्द्र मोदी की सालगिरह (Narendra Modi’s anniversary) पर अपने ट्विटर पर उन्होंने जो बधाई सन्देश में उन्हें जिस तरह फादर आफ अवर कंट्री‘ (Father of our country) अर्थात ‘हमारे देश के पिता’ के तौर पर सम्बोधित किया, उसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई।

New India – New icons – New father? How Modi has made himself ridiculous

‘राष्ट्रपिता’ के इर्दगिर्द बहस बड़ी तेजी से लौट आई। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप- जो ह्यूस्टन में आयोजित हाउडी मोदी रैली (Howdy modi rally) में शामिल हुए थे- उन्होंने मोदी पर जो स्तुतिसुमन बरसाए वह इसके लिए निमित्त बने, उन्होंने कहा, ‘मैं भारत को जानता हूं जब वह बंटा हुआ था। उस वक्त काफी विघटन था, संघर्ष था और उन्होंने सभी को साथ जोड़ा। एक पिता की तरह उन्होंने इस काम को किया। शायद वह भारत के पिता हैं।’

अमेरिकी राजनीति का कोई भी तटस्थ निरीक्षक इस बात को बता सकता है कि अपने मेहमानों की अतिशयोक्तिपूर्ण अन्दाज में तारीफ करना अमेरिकी राष्ट्रपति की पुरानी आदत है, जिसे न उन मेहमानों द्वारा और न ही अमेरिकी जनता द्वारा गंभीरता से लिया जाता है। ह्यूस्टन में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ रैली के चंद रोज पहले उन्होंने आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन की इसी तरह ‘मैन आफ टाइटेनियम’, ‘एक वास्तविक ताकत वाला आदमी’ के तौर पर प्रशंसा की थी। और इस तारीफकरने में उन्हें इस बात से भी गुरेज नहीं होता कि वह तरह-तरह के दक्षिणपंथियों पर भी समय-समय पर स्तुतिसुमन बरसाते रहे हैं।

मोदी आगे बढ़कर खारिज कर देते ट्रंप को

ट्रंप की इस आदत को देखते हुए होना तो यह चाहिए था कि मामला वहीं बिसरा दिया जाता। यह बात मौके की नजाकत के अनुरूप होती कि खुद वजीरे आजम मोदी आगे आकर ‘अमेरिकी राष्ट्रपति का धन्यवाद करते’ हुए उन्हें बेहद सौम्य शब्दों में यह बता देते कि हमारा मुल्क महात्मा गांधी को ही ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा देता है। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उल्टे यह देखने में आया कि भक्तजन- अर्थात वे लोग जो मौजूदा हुकूमत का आंख मूंद कर समर्थन करते हैं – इस बात को लेकर फूले न समाए कि ट्रंप ने मोदी को ‘राष्ट्रपिता’ कहा है। यह प्रतीत हुआ कि वह इस बात के लिए मुन्तजार रहे हों कि पश्चिम का कोई नेता जनाब मोदी को ऐसी कोई बात कह दे।

Donald Trump insulted Mahatma Gandhi on the occasion of his 150th birthday

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब मोदी के राष्ट्रपिता होने की बात सुर्खियां बनी है। दरअसल ‘भाजपा के करीबी कई लोगों ने अक्सर मोदी को देश का पिता घोषित किया है।

केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने केसरिया खेमे में व्याप्त इस भावना को गोया जुबां दी जब उन्होंने कहा कि वे जो ‘इस बात पर गर्व नहीं महसूस करते’ कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को ‘भारत पिता’ कहा है, वह अपने आप को ही भारतीय नहीं समझ सकते। उन्हें इस बात से कोई गुरेज नहीं था कि मोदी को ‘भारत पिता’ सम्बोधित कर डोनाल्ड ट्रंप ने दरअसल महात्मा गांधी का, उनके 150वें जन्मदिन के अवसर पर अपमान किया है।

इतना ही नहीं, जनाब जितेन्द्र सिंह द्वारा मोदी की इस प्रशंसा की हिमायत करना एक तरह से नेताजी सुभाषचंद्र बोस को भी अपमानित करना था जिन्होंने सिंगापुर रेडियो पर 6 जुलाई 1944 के अपने सम्बोधन में महात्मा गांधी को पहली दफा राष्ट्रपिता के तौर पर सम्बोधित किया था। यह वह दौर था जब कस्तूरबा और गांधी दोनों भारत छोड़ो आन्दोलन के सिलसिले में आगा खान पैलेस, पुणे में बन्द थे।

हिन्दुत्व ब्रिगेड के हिमायतियों के लिए यह बात भी कोई मायने नहीं रखती है कि जिस वक्त ट्रंप मोदी की तारीफ में मुब्तिला थे, उन्हें ‘भारत का पिता’ कह रहे थे, यही वह दौर था जब वह खुद एक गंभीर विवाद में उलझे थे।

हाउस आफ रिप्रेजेन्टेटिव की तरफ से उनके खिलाफ औपचारिक तौर पर महाअभियोग चलाने का प्रस्ताव लिया गया है, जिसमें उन पर यह आरोप लगाया गया है कि ‘उन्होंने अपने पद की शपथ की अवहेलना की और अपने प्रतिद्वंद्वी की छवि खराब करने के लिए तथा अपने निजी राजनीतिक फायदे के लिए एक विदेशी ताकत की मदद लेने की कोशिश की।’

मालूम हो कि अगले साल के राष्ट्रपति चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरते दिख रहे जो बिडेन को बदनाम करने के लिए उन्होंने यूक्रेन सरकार पर दबाव डाला, ऐसे प्रमाण मिले हैं। और इस तरह दो सौ साल से अधिक वक्त में इस पद पर आसीन विभिन्न राष्ट्रपतियों में ट्रंप ऐसे चौथे राष्ट्रपति बने हैं जिन्हें ऐसे महाअभियोग का सामना करना पड़ रहा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसी जांच दरअसल अपने पद पर रहते हुए टंप द्वारा अंजाम दिए गए विभिन्न विवादास्पद कारनामों की झलक मात्रा कही जा सकती है।

यह बात स्पष्ट हो रही है कि राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप का अपना रिकॉर्ड और उनकी पहले की कारकीर्द कहीं से भी उदात्त नहीं कही जा सकती है।

न्यूयॉर्क टाईम्स में एक चर्चित स्तंभकार द्वारा ‘चालीस वाक्यों’ में ट्रंप के कैरियर का जो लेखा-जोखा लिया गया है, वह आंखें खोलने वाला हो सकता है। ‘उन्होंने वर्ष 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनावों के दखलंदाजी के लिए एक विदेशी नेता पर दबाव डाला।

उन्होंने 2016 के राष्ट्रपति पद के चुनाव में हस्तक्षेप के लिए एक विदेशी मुल्क से अपील की। उन्होंने विदेशी अधिकारियों के सामने क्लासिफाइड सूचनाएं लीक कीं। वह दुश्मन देश के तानाशाह के साथ खड़े रहते हुए उन्होंने अमेरिका के गुप्तचर अधिकारियों को सार्वजनिक तौर पर कमजोर किया… वह विदेशी नेताओं को इस बात के लिए प्रोत्साहित करते हैं कि वह उनके होटल में रुकें और उन्हें मालामाल करें।… उन्होंने श्वेत वर्चस्ववादियों की यह कहते हुए तारीफ की कि वह ‘बहुत अच्छे इन्सान हैं।’

उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस की चार कलर्ड महिला सदस्यों को यह कहा कि ‘आप अपराधों से ग्रस्त तथा बिखरे हुए जिन समाजों से आई हैं, वहां लौट जाएं और उन समाजों को ठीक करें।’… अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत उन्होंने इस झूठे दावों के साथ की कि अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति पूरी तरह अमेरिकी नहीं थे।…तमाम महिलाओं ने उन पर यह आरोप लगाए हैं कि उन्होंने उनके साथ यौन प्रताड़ना की या गलत आचरण किया… अपने राजनीतिक दुश्मनों पर हिंसा को अंजाम देने के लिए उन्होंने अपने अनुयायियों को प्रोत्साहित किया है। इस सूची में तमाम और विवरण हैं।

सवाल उठता है कि अगर कोई इस बात के लिए कुख्यात हो कि वह ‘हर सप्ताह नया झूठ बोलता है – चाहे अर्थव्यवस्था हो, मतदाता सूची से खिलवाड़ हो, यहां तक कि मौसम की बात हो’, जिसने महिलाओं को ‘कुतिया’, ‘सूअरनी’ और ‘घोड़े के चेहरेवाली’ जैसे तमाम नामों से सम्बोधित किया हो या जिसने अपने राष्ट्रपति पद के चुनाव में हुई गड़बड़ी की जांच को प्रभावित करने की कोशिश की हो’ (वही), ऐसा शख्स अगर किसी की तारीफ कर दे, तो उसे तारीफ समझा जाए या अपमान समझा जाए? और ऐसी तारीफ पर हिन्दू राष्ट्र के हिमायतियों में इस कदर उन्माद क्यों दिख रहा है!

दरअसल ऐसी नैतिक बातें- आज की तारीख में तमाम लोगों को- कतई उलझन में नहीं डालतीं, जो इसी बात का एक संकेत है कि हम एक ‘नए भारत’ में प्रवेश कर चुके हैं। यह ऐसा भारत है जहां भीड़ की हिंसा ने रफ़्ता-रफ़्ता कानून के राज को अपने चपेट में लिया है। यह ऐसा नया भारत है जिसे नए आयकन, नए हीरो हैं ‘जहां भीड़ की हिंसा की अगुआई करने वाले रक्तपिपासुओं की तुलना भारत की आज़ादी के योद्धाओं के साथ की जा सकती है।’

‘राष्ट्रपिता’ के ओहदे से महात्मा गांधी की यह ‘बेदखली’ और उनके स्थान पर जनाब नरेन्द्र मोदी की ‘ताजपोशी’ दरअसल दो साल पहले के एक वाकये की याद दिलाती है, जब एक आश्चर्यजनक घटनाक्रम में किसी अलसुबह हमने देखा था कि किस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने बाकायदा ‘खादी और ग्रामीण उद्योग आयोग के कैलेण्डर तथा टेबल डायरी (2017) से महात्मा गांधी को विस्थापित किया है। अब कायदन होना यही चाहिए था कि कैलेण्डर को वापस लिया जाता और जनता से माफी मांगी जाती कि जो कुछ हुआ वह खेदजनक था और जिसके लिए ऊपर से अनुमति नहीं ली गई थी। मगर हुआ बिल्कुल उल्टा।

भाजपा की तरफ से आधिकारिक तौर पर यही कहा गया कि गांधी उनके लिए आदर्श हैं और उन्हें प्रतिस्थापित करने का उनका कोई इरादा नहीं है। और इस बयान के विपरीत पूरी कवायद यही की गई कि मामले को औचित्य प्रदान किया जाए।

खादी आयोग के हवाले से बताया गया कि किस तरह मोदी खादी के लिए बड़ा ब्राण्ड बन गए हैं, वह किस तरह यूथ के आइकन हैं, गुजरात भाजपा की तरफ से कहा गया कि किस तरह मुख्यमंत्री पद के दिनों में जनाब मोदी ने खादी को बढ़ावा दिया था आदि।

हरियाणा भाजपा नेता और कैबिनेट मंत्री अनिल विज ने अंबाला में एक कार्यक्रम में कहा कि ‘खादी गांधी के नाम पेटेण्ट नहीं हुई है। खादी उत्पादों के साथ गांधी का नाम जुड़ने से ही उसकी बिक्री में गिरावट आई। वही हाल रुपये का भी हुआ है। जिस दिन गांधी रुपये की तस्वीर पर अवतरित हुए तभी से उसका अवमूल्यन शुरू हुआ है। धीरे-धीरे रुपए के नोट से भी उनको हटा दिया जाएगा।

मोदी गांधी से बड़ा ब्राण्ड बन चुके हैं। यह हम वर्ष 2014 में भाजपा की ताजपोशी के बाद जब बड़े गाजे-बाजे के साथ मोदी सरकार द्वारा ‘स्वच्छ भारत अभियान’ शुरू किया गया तब गांधी को उनके चश्मे तक न्यूनीकृत करने की हरकत को भी देख सकते हैं।

अब संघ-भाजपा के औपचारिक दावे जो भी हों, टुकड़े-टुकड़े में नजर आने वाली यह घटनाएं दरअसल इसी बात की ताईद करती हैं कि महात्मा गांधी को लेकर अपनी बढ़ती बेचैनी को छिपाना उनके लिए लगभग असम्भव होता जा रहा है।

वजह स्पष्ट है कि आजाद भारत का जो समावेशी नक्शा गांधी के लिए प्रिय था, उनसे बिल्कुल विपरीत हिन्दू राष्ट्र के इन हिमायतियों की समझदारी है। और वह तरह-तरह की कोशिशों में मुब्तिला हैं ताकि गांधी को बेदखल किया जाए, या उनके स्थान पर किसी ऐसे व्यक्ति को बिठाया जाए, जो उनके अपने असमावेशी विचारों का वाहक हो।

यह महज इत्तेफाक नहीं कि गांधी के हत्यारे गोडसे को महिमामंडित करने की तथा गांधी को शैतान के तौर पर प्रमाणित करने की कोशिशें केन्द्र में हिन्दुत्व दक्षिणपंथ की इस सरकार के आसीन होने के साथ ही तेज हो चली हैं।

दरअसल यह उनकी बढ़ती बदहवासी का ही नतीजा है कि डोनाल्ड ट्रंप, जिन्हें ‘झूठों का सरताज’ कहा जाता है और जिनसे ‘अमेरिका के भविष्य के लिए किस तरह खतरा है’ जैसी बातें खुद अमेरिकी समाज में बोली जाती हैं, उन्होंने हिन्दू राष्ट्र के इन हिमायतियों को यह बहाना प्रदान किया कि वह ‘भारत पिता मोदी’ की प्रशंसा से उछलते रहें और इस बात को समझ तक न पाएं कि इस पूरी कवायद में उन्होंने खुद अपने आप को किस तरह हास्यास्पद बनाया है।

सुभाष गाताडे

About Subhash Gatade

Subhash Gatade ( born 1957) is a left activist, writer and translator. He has done M Tech ( Mech Engg 1981) from BHU-IT, Varanasi. He has authored few books including Modinama : On Caste, Cows and the Manusmriti ( Leftword, in press), Charvak ke Vaaris ( Authors Pride, Hindi, 2018), Ambedkar ani Rashtriya Swayamsevak Sangh ( Sugava, Marathi, 2016), Beesavi Sadi Mein Ambedkar ka Sawal ( Dakhal, Hindi, 2014), Godse ki Aulad ( Pharos, Urdu, 2013) , Godse’s Children – Hindutva Terror in India (Pharos, 2011), The Saffron Condition ( Three Essays, 2011) He also occasionally writes for children. Pahad Se Uncha Aadmi ( NCERT, Hindi, 2010)

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