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हिटलरशाही पूंजीवादी पार्टी से भ्रष्टाचार रोकने की उम्मीद करना कोरी नादानी है

अरुण माहेश्वरी

भतीजा नीरव मोदी महाराजा से अपनी रफ्तो-जब्त के बल पर बैंकों से कोरी पुर्जियां निकलवा कर हजारों करोड़ रुपये की चपत लगा कर चला गया और डावोस में महाराजा को आश्वस्त कर दिया कि मैं सुरक्षित निकल आया हूं ! उसके पीछे-पीछे चाचा मेहुल भाई भी पूरे परिवार के साथ भतीजे के बनाये रास्ते से ही निकल आया। ऐसे ही पहले विजय माल्या भागा था जिसके पथ-प्रदर्शन का काम किया था ललित मोदी ने। विजय माल्या को भागने के लिये बाकायदा सीबीआई की लुकआउट नोटिश में एक सुराख छोड़ दिया गया था, जैसे ललित मोदी को जाने में केंद्र की एक मंत्री और एक राज्य की मुख्यमंत्री ने सहायता के अपने हाथ बढ़ा दिये थे। अभी ऐसे ही न जाने और कितने भगोड़ों का नाम हवा में हैं !

पिछले एक अर्से से, सूचना तकनीक के अभूतपूर्व विकास के इस काल को अर्थ-जगत में आवारा पूंजी के एक विचित्र काल के रूप में जाना जाता है। अभी वास्तविक कारोबार के लिये पूंजी के आवागमन की तुलना में सैकड़ों गुना ज्यादा पूंजी अन्य कारणों से ही एक देश से दूसरे देश दिन-रात दौड़ती-भागती दिखाई देती है। जब एक क्षण में एक देश का खजाना विदेशी पूंजी से लबालब हो जाता है तो उसके साथ ही दूसरे ही क्षण उंगली के एक इशारे पर कंगाल हो जाने का भूत भी उस देश पर मंडराने लगता है। कुल मिला कर अंततः यही भूत उस देश की आर्थिक नीतियों को अंतिम तौर पर निर्धारित करने लगता है।

दरअसल, पूंजी की इस अकारण सी दिखाई देती वैश्विक भागम-भाग के पीछे एक बड़ा कारण काली पूंजी को सफेद बनाने और सफेद को काला बनाने का एक अनोखा गोरखधंधा है। पूंजी अपने साथ ही शेयर बाजार और उसके दलालों, बैंकरों, हुंडी-पुर्जा काटने वालों की एक पूरी फौज तैयार करती चलती है, उसी प्रकार इस काला-सफेद धंधे की पूंजी ने आज अमेरिका में कानून विशेषज्ञों की फर्मों, फ्रांस और स्वीट्जरलैंड में खास प्रकार के बैंकरों, जर्मनी के नाना प्रकार के लेन-देन की प्रविष्टियों का जाल बुनने वाले लेखाकारों और ब्रिटेन के वितत्तीय हब के दलालों की एक पूरी फौज तैयार कर दी है जो इस काला-सफेद धंधे के स्वर्णिम युग के प्रवर्त्तक सिपाहियों की भूमिका अदा कर रहे हैं। इसमें भारत के इन भगोड़े ठगों का अभिनव योगदान यह है कि ये पूंजी के आवागमन को बाकायदा एक मूर्त रूप प्रदान कर दे रहे हैं, ये पूंजी को पूंजीपतियों के शरीर में ढाल कर उसे एक जगह से उठा कर दूसरी जगह ले जाते हुए दिखाई देते हैं।

और भारत सरकार ! वह जो अभी अपने बाकी तमाम कामों से हिटलरशाही पूंजीवाद को चरितार्थ करती दिखाई देती है, इन महानुभावों को यहां से भगा कर सुरक्षित जगह पर पहुंचा देने के गैर-कानूनी ढंग से सीमा पार कराने वाले दलालों की भूमिका में लगी हुई दिखाई देती है। इस सरकार के तानाशाह ने वादा तो यह किया था कि वह दुनिया के कोने-कोने में फैले हुए अरबो-खरबों रुपये के काले धन (जेएनयू के प्रोफेसर अरुण कुमार के अनुसार 3 खरब डालर) को टेर कर भारत बटोर लायेगी। लेकिन आज तो वे खुद ही भारत में काला-सफेद कारोबार के सबसे प्रमुख सरगना की भूमिका अदा कर रहे हैं, निश्चय ही इस पूरे लेन-देन में अपनी कमीशन जरूर काट लेते हैं ताकि भारत में हमेशा लगे रहने वाले चुनावों के मेलों को वे अपने काले धन से पाट सके।

हिटलरशाही पूंजीवाद झूठ को सच और सच को झूठ बनाने के अपनी आदिम योग्यता का इस्तेमाल यहां काले धन को सफेद धन और सफेद को काला बनाने के धंधे में धड़ल्ले से कर रहा है। वह ऐसे हर भगोड़े के पीछे उठने वाले राजनीतिक तूफान की दिशा को मोड़ने, पूरे विषय को गड्ड-मड्ड कर देने और भगोड़ों को अभय प्रदान करने के मामले में जितना चुस्त और सक्रिय रहता है, उन्हें पकड़ने, दंडित करने के मामले में उतना ही सुस्त और निष्क्रिय बना रहता है।

यह हिटलरशाही पूंजीवादी पार्टी का तानाशाह ही है जो काला धन निकालने के नाम पर सामान्य व्यापारियों, छोटे-मोटे धंधों से अपना संसार चलाने वाले लोगों, नियम-कायदे मान कर चलने वाले उद्योगपतियों, और बिल्कुल साधारण लोगों के जीवन को कठिन बनाने और गृहणियों के स्त्री धन तक को निकाल कर बैंकों में जमा करवा देने के मामले में अश्लीलता की हद तक उत्साही और खिलखिलाता हुआ दिखाई देता है, लेकिन बैंकों को लूट कर भागने वाले ठगों के मामले में अपने दूसरे बेवकूफ मंत्रियों की आड़ लेकर मुंह चुराता हुआ गूंगा बना रहता है। नोटबंदी और विकृत जीएसटी लागू करते वक्त लगभग कत्थक नृत्य की मुद्रा में नाचने वालों का यह मौन व्रत सचमुच इनकी नैसर्गिकता, इनकी मूल वृत्ति का ही परिचायक है !

मनमोहन सिंह के जमाने में 2 जी, कोयला खान आबंटन या एशियन गेम्स के घोटाले के सच्चे या झूठे शोर के बाद कम से कम अपराधियों पर कार्रवाइयां हुई थी, मंत्रियों, अफसरों को जेल तक जाना पड़ा था। लेकिन अभी के निजाम में ऐसी किसी जनतांत्रिक नैतिकता का दो कौड़ी का दाम नहीं है। यदि गो रक्षकों के द्वारा की जाने वाली हत्या हत्या नहीं है और रोमियो स्क्वैड के गुंडों की छेड़खानी कोई अपराध नहीं है तो फिर किसी ठग को भगा देने का अपराध या मंत्री का खुला भ्रष्टाचार ही क्यों कोई अपराध माना जायेगा ! मंत्रियों का इस्तीफा तो घोषित तौर पर इस सरकार के मूलभूत उसूलों के खिलाफ है !

अमेरिका से लाये गये इनके सारे आर्थिक सलाहकार इस बात को जानते हैं कि आज दुनिया के जीडीपी का लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा वह है जिसे धन शोधन की पूरी प्रक्रिया के जरिये काले धन को सफेद करके हासिल किया गया है। यह आंकड़ा इनके आका आईएमएफ का है जो कहता है कि इसका बमुश्किल एक प्रतिशत भी पकड़ में नहीं आता है। मारिशस, साइप्रस, गिब्राल्टर, गुएर्नसी, स्वीट्जरलैंड, बहमास आदि देशों में ऐसे असंख्य दलाल बैठे हुए है जो किसी के भी एक फोन पर उसे अपने काले धन को सफेद बना कर हासिल करने की सेवाएं प्रदान करने के लिये तैयार है। पनामा पेपर्स से पता चलता है कि एक मौन्सेक फोंसेका कंपनी ने दुनिया के सबसे गरीब देशों में एक सुडान के राष्ट्रपति के लिये 2,14,000 शेल कंपनियां गठित कर दी थी। सारी दुनिया के भ्रष्ट राजनेताओं की शरण-स्थली है ऐसी तमाम कंपनियां।

नीरव मोदी भी इस सचाई को जानता है और भाजपा की अभी सोशल मीडिया पर बहु-चर्चित महिला कार्यकर्ता बॉबी की तरह ही वह इस हिटलरशाही पूंजीवाद की पार्टी की सरकार के तमाम नेताओं के सारे रहस्यों को भी जानता है। वह जानता है कि इस सरकार के सब जन मिल कर उसकी मदद नहीं करेंगे तो किसकी करेंगे ! बॉबी की शब्दावली का प्रयोग करें तो कह सकते है कि वह जानता है कि उसके आंख तरेर लेने पर अच्छो-अच्छों की 'पैंट गीली हो जायेगी' ! 

इसीलिये हमारी राय में तो इस हिटलरशाही वाली पूंजीवादी पार्टी के रहते यह काला-सफेद वाला धंधा कम नहीं, दिन-प्रतिदिन और ज्यादा फैल ही सकता है, इसके कम होने के कोई आसार नहीं है।   

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