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नितिन गडकरी की कंपनी कामगारों को एक दशक से कर रही है गुमराह, शुरू होगा कामगारों का क्रमिक अनशन

वर्धा (महाराष्ट्र) आज से डेढ़ दशक पूर्व घाटे में चले जाने के कारण महाराष्ट्र के वर्धा जिले का एक चीनी कारख़ाना (A sugar factory in Wardha district of Maharashtra) बंद हो गया। इससे कारख़ाना में काम करने वाले 600 से अधिक कामगारों की नौकरी तो चली ही गई। साथ ही कारख़ाना बंद पड़ने के वक्त इन कामगारों के दस माह का बकाया वेतन भी आज तक नहीं मिल पाया है। कामगारों के प्रोविडेंट फंड (Provident fund) आदि के तहत लाखों रुपए काटी गई राशि का भी कोई भुगतान किया गया। इन दोनों मदों की कुल मिलाकर 4 करोड़ 81 लाख रुपए की राशि का कामगारों को आज तक भुगतान नहीं हो पाया है। बंद होने के कुछ वर्ष बाद इस चीनी कारख़ाना को तो नीलाम कर दिया गया किन्तु इन कामगारों की बकाया राशि के भुगतान की किसी ने परवाह नहीं की। नीलामी में जिसने इस चीनी कारखाने को खरीदा, वह तो आज मालामाल है। किन्तु जिन कामगारों के श्रम के बदौलत इस चीनी कारखाने की नींव रखी गई थी, वे बेरोजगारी की मार झेलने के साथ-साथ अपनी बकाया राशि के भुगतान के लिए दर-ब-दर की ठोकर खाने को आज भी मजबूर हैं। इस बीच इन बेरोजगार कामगारों में से दर्जनों की मौत भी हो गई, जिनकी विधवाएँ आज भी बकाया राशि के भुगतान के लिए हर दरवाजे पर गुहार लगा रही हैं। केंद्र-राज्य में सरकारें तो बदलती रहीं किन्तु इन कामगारों के साथ किसी सरकार ने भी इंसाफ नहीं किया।  

पिछले 13 वर्षों से चीनी कारख़ाना के नौकरी से बेदखल कामगारों का अधर में अटका हुआ है 4 करोड़ 81 लाख रुपया.

        दरअसल वर्ष 1987 में महाराष्ट्र के वर्धा जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर जामणी गाँव (Jamni village) के समीप एक सहकारी समिति द्वारा चीनी कारख़ाना खोला गया था। जिसमें इलाके के तकरीबन सात हजार किसानों का शेयर था। इस कारखाने को ‘महात्मा सहकारी साखर कारख़ाना’ (Mahatma Cooperative sugar factory) नाम से जाना जाता था। मराठी भाषा में चीनी (sugar in Marathi language) को ‘साखर’ कहा जाता है। इस कारखाने में तकरीबन 650 कामगार कार्यरत थे। इन कामगारों में दो तरह के कामगार हुआ करते थे। लगभग 300 कामगार स्थायी प्रकृति के थे, जिन्हें वर्ष भर पूरा वेतन मिलता था जबकि बाकी के कामगारों को 6 माह तक गन्ने के सीजन भर पूरा वेतन और शेष 6 माह आधा वेतन का भुगतान किया जाता था। इन कामगारों के वेतन से प्रोविडेंट फंड आदि मद में भी नियमित पैसा काटा जाता था।

कॉओपरेटिव बैंक ऑफ महाराष्ट्र (Co-operative Bank of Maharashtra) और नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) की कंपनी कामगारों को एक दशक से कर रही है गुमराह.   

        लगभग 15 वर्ष बाद सन् 2005 में यह चीनी कारख़ाना किसी कारण वश बंद हो गया। जब यह कारख़ाना बंद हुआ उस वक्त तक इन कामगारों के दस माह के वेतन का भी भुगतान नहीं हुआ था। प्रोविडेंट फंड मद में काटी गई राशि आदि भी अलग से बकाया थी। कामगारों के नेता संभाजी भिवाजी त्रिभुवन बताते हैं कि सहकारी समिति ने कारख़ाना बंद होने के पूर्व के 28 माह के पीएफ की राशि भी पीएफ खाते में जमा नहीं की थी जबकि कामगारों के वेतन से इस मद में पैसा जरूर काट लिया गया था। कारख़ाना के बंद होने से ये सभी कामगार पूरी तरह से बेरोजगार हो गए। इन कामगारों में से कुछ तो वर्धा जिले के आसपास के गांवों के थे तो कुछ महाराष्ट्र के औरंगाबाद, यावतमाल आदि जिलों से थे। कारख़ाना बंद होने की वजह से बाहर के जिलों के कामगार विवश होकर अपने-अपने घर वापस लौट गए। बस कामगारों के इसी बिखर जाने का फायदा ये सभी उठाते रहे।

        त्रिभुवन आगे बताते हैं कि कारखाने पर महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक का लगभग 4 करोड़ का कर्ज हो गया था। इस कारण बैंक ने कारखाने को अपने अधिकार में ले लिया। कुछ वर्ष बाद वर्ष 2009 में इसी बैंक ने कारखाने को नीलाम कर दिया। 4 जून 2009 को कारखाने की नीलामी का स्थानीय अखबार में विज्ञापन जारी किया गया। निलामी निविदा (प्रा.का/ नाग/ कर्ज/ वसूली/ 921/ 2009-10) के शर्त क्रमांक- 4 में स्पष्ट तौर पर इस बात का उल्लेख किया गया कि, “बैंक केवल कामगारों का बकाया भुगतान करेगा जबकि अन्य सभी प्रकार की (वैधानिक देनदारी सहित) देनदारी के भुगतान की जिम्मेदारी खरीददार की होगी।” इसी विज्ञापन के आलोक में चिअरफुल अल्टरनेटीव्ह फ्यूएल सिस्टिम प्राइवेट लिमिटेड, अकोला, महाराष्ट्र ने 14 करोड़ 10 लाख रुपए में इस कारखाने को खरीदा। उस समय इस कंपनी के डायरेक्टर वर्तमान केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के पुत्र सारंग नितिन गडकरी थे। मिनिस्टरी ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स की रिपोर्ट के मुताबिक 1 जनवरी 2019 तक की जानकारी के अनुसार इस कंपनी का नाम बदलकर पहले चीअरफुल बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड हुआ और उसके कुछ दिन बाद इसका नाम ‘महात्मा शुगर पॉवर प्राइवेट लिमिटेड’ हो गया। फिलहाल यह कंपनी इसी नाम से चल रही है। कामगार इसे नितिन गडकरी से जुड़ी हुई पूर्ति ग्रूप ऑफ कंपनी का हिस्सा बताते हैं। 2010 में जब इस बंद पड़े कारखाने का फिर से उद्घाटन हुआ तो उस वक्त स्वयं नितिन गडकरी, वर्धा के तत्कालीन सांसद दत्ता मेघे और राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़णवीस (फड़णवीस उस वक्त नागपुर से विधायक थे) भी मौजूद थे।  

        बहरहाल नीलामी निविदा शर्त के मुताबिक इस चीनी कारखाने को खरीदने और बेचने वाले की ज़िम्मेदारी थी कि वह कारखाने के पुराने कामगारों को उनकी सभी किस्म की बकाया राशि का भुगतान करे। किन्तु दोनों में से किसी ने इतने दिन बीत जाने के बाद भी इन कामगारों को अपनी तयशुदा ज़िम्मेदारी का निर्वाह करते हुए आज तक किसी किस्म का कोई भुगतान नहीं किया। कामगार बताते हैं कि कॉपरेटिव बैंक और कारखाने के नये मालिक- दोनों ने इससे अपना पल्ला ही झाड़ लिया। अपना बकाया रकम मांगने के लिए ये कामगार जब संबंधित बैंक के पास जाते तो बैंक प्रबंधन साफ तौर पर कहता रहा कि बैंक के पास किसी प्रकार के देनदारी की ज़िम्मेदारी नहीं है। यही बात कारखाने का मौजूदा प्रबंधन भी कहता रहा। इन कामगारों के बकाया राशि के भुगतान से दोनों तब से लेकर आज तक भाग रहे हैं। इन कामगारों के ज्यादा पढ़े-लिखे न होने के कारण और कारख़ाना बंद पड़ने के बाद अपने-अपने घर चले जाने के कारण उनका संगठित होना भी थोड़ा मुश्किल हो गया जिसका पूरा लाभ इन दोनों ने उठाया और कामगारों के वाजिब मांगों को अनसूना करते रहे।

        अपनी मांगों को लेकर पिछले तेरह वर्षों में इन कामगारों ने जिला से लेकर नागपुर और मुंबई तक के संबंधित विभागों के अधिकारियों, मंत्रियों व अन्य स्थानीय राजनेताओं को दर्जनों अर्ज़ियाँ दी। को-ऑपरेटिव बैंक ऑफ महाराष्ट्र के नागपुर शाखा के अधिकारियों से कई बार गुहार लगाई, किन्तु कामगारों के सभी किस्म के बकाया राशि के भुगतान की कार्यवाही एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाई। नवंबर 2018 में जब कामगारों ने दबाव बनाया तो दिसंबर माह की 21 तारीख को संबंधित को-ऑपरेटिव बैंक के अधिकारियों और इन कामगारों की एक संयुक्त बैठक हुई, जिसमें बैंक के अधिकारी ने मौखिक तौर पर आगे की कार्यवाही के लिए एक माह का समय मांगा। इस समय सीमा के बीत जाने के बाद भी बैंक ने अब तक इस मामले पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

        महाराष्ट्र के वर्धा जिले को ‘गांधी जिला’ के नाम से भी जाना जाता है। यह गांधी की कर्मभूमि रही है। गांधी की धरती पर चीनी कारख़ाना के कामगारों ने अपनी बकाया राशि के भुगतान के लिए बार-बार गांधीवादी तरीके से आवाज उठाई, किन्तु उसे आज तक अनसूना किया जाता रहा। संबंधित अधिकारी और राजनेता उन्हें महज आश्वासन देकर आज तक बरगलाते रहे। इस पूरी परिस्थिति को देखते हुए अंततः इन कामगारों ने उक्त कारख़ाना के मुख्य द्वार के सामने 12 फरवरी 2019 से क्रमिक अनशन पर जाने का ऐलान किया है। इस आशय की सूचना स्थानीय जिला प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़णवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, संबंधित को-ऑपरेटिव बैंक सहित केंद्र-राज्य के सभी संबंधित विभागों-मंत्रालयों को भी पत्र द्वारा दी है। इन कामगारों के धैर्य की सीमा अब टूट गई है और वे आरपार की लड़ाई लड़ लेने के मूड में हैं। आज ये सभी कामगार 60 वर्ष से अधिक की उम्र के हो चुके हैं और ये सभी अपने जीते-जी इस मामले पर इंसाफ की आखिरी जंग के लिए कमर कसते हुए प्रतीत हो रहे हैं। इतने वर्षों बाद भी इन कामगारों को इंसाफ मिलता है अथवा नहीं यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

        कामगारों की इस तैयारी को देखते हुए को-ऑपरेटिव बैंक ऑफ महाराष्ट्र और नितिन गडकरी के लोग हरकत में तो जरूर आए हैं। किन्तु उनका रवैया कामगारों को वाजिब भुगतान के बजाय मामले को दबाने और टालमटोल वाला ही ज्यादा प्रतीत हो रहा है। कामगारों के अनशन की सूचना के दबाव में 8 फरवरी 2019 को को-ऑपरेटिव बैंक ऑफ महाराष्ट्र के मुंबई स्थित प्रधान कार्यालय से जारी पत्र में बकाया राशि के भुगतान की सूचना देने के बजाय एक बार फिर 15 फरवरी को वार्ता हेतु आमंत्रित किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि बैंक का यह ताजा पत्र इन कामगारों को स्थानीय भाजपा विधायक के माध्यम से प्राप्त हुआ है। स्थानीय विधायक इन कामगारों को अनशन नहीं करने हेतु मनाने में जुटे हुए हैं। लेकिन कामगार इस बार किसी के खोखले झांसे में आने को तैयार नहीं हैं। कामगारों के नेता त्रिभुवन का कहना है कि हमारा अनशन आंदोलन कारख़ाना के गेट पर जारी रहेगा और हम बैंक से वार्ता में भी हिस्सा लेंगे। जब तक हमारे पूरे बकाया राशि का भुगतान नहीं होगा, तब तक हमारा क्रमिक अनशन जारी रहेगा।

यह समाचार प्रकाशित करते समय खबर आई है कि 15 फरवरी तक के लिए कामगारों ने अनशन स्थगित कर दिया है। बैंक ने मुंबई में 15 फरवरी को वार्ता हेतु आमंत्रित किया है। इस वार्ता के बाद यदि बात नहीं बनी तो वे अनशन पर जा सकते हैं।

मुकेश कुमार की रिपोर्ट

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