Home » समाचार » राष्ट्र धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं…. नफरतों के इस बाजार में अमन चैन का खरीददार इस वक्त ढूंढने से भी नहीं मिल रहे हैं
Amit Maurya अमित मौर्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र “गूंज उठी रणभेरी” के संपादक हैं।

राष्ट्र धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं…. नफरतों के इस बाजार में अमन चैन का खरीददार इस वक्त ढूंढने से भी नहीं मिल रहे हैं

देश के प्रति श्रद्धा रखने वाले हर इंसान को नमन।

मैं एक आम हिंदुस्तानी हूँ, जिसके मन में अपने धर्म, जाति, समाज से पहले देश सर्वोपरि है।

मेरी नजर में सब धर्म जाति समभाव है।

मेरी आस्था भले ही राम, शिव, हनुमान के साथ है, मगर अल्लाह, जीसस वाहे गुरू के प्रति भी संम्मान के भाव उसी तरह से है। जैसे आप अपने माँ के प्रति प्रेम भाव रखते हैं, मगर दूसरे की माँ को भी सम्मान भाव रखते हैं। क्योंकि जब भी आप किसी बड़े बुजुर्ग चाहे वो किसी धर्म जाति का हो उसे प्रणाम करेंगे तो बदले में वो आपको आशीर्वाद ही देगा न कि गाली।

इसलिए आप किसी भी धर्म के प्रति आस्थावान भले ही न हों मगर अपमान का आपको हक नहीं है।

वैसे भी प्रकृति का नियम है जो देंगे वह लौट के आएगा मगर दोगुना।

खैर विषय पर आते हैं। पुलवामा हमले के बाद देश में अचानक आतंकवाद बनाम राष्ट्रवाद का विश्लेषण तेज हो गया है।

लोग (या ट्रोलर भी कह सकते हैं) एक पार्टी के समर्थक को देशभक्ति और किसी अन्य पार्टी के लोगों को राष्ट्रदोही साबित करने पर तुले हैं।

केसरिया रंग वाले हरे रंग वाले को देशद्रोही साबित करने पर तुले हैं। केसरिया फेसबुकिया समाज आतंकी घटना पर आक्रोशित है। यह आक्रोश स्वतःस्फूर्त और जायज तो है मगर ट्रोलर (दोनों केसरिया हरा) जिन्हें कट्टरपंथी भी कह सकते हैं, फेसबुक पेज पर एक दूसरे को गरिया रहे हैं।

आलम यह है कि फेसबुक एक दूजे के प्रति नफ़रत भरे पोस्ट से भरे पड़े हैं।

और केसरिया हरे के बीच जो सफेद मने अमन शांति पसन्द जो तबका(दोनों समुदायों का) विस्मय से यह सब देख रहा है।

हमारा राष्ट्रीय ध्वज भी इन्ही तीन रंगों से बना है।

वर्तमान में कश्मीरीयों सहित दूसरे वर्ग के लोगों को टारगेट कर गरियाया जा रहा है, जैसे सभी घटनाओं के पीछे पूरे कौम का हाथ हो… अरे भाई खूब कोसो खूब लानत-मलानत करो उनका जो किसी भी रूप में आतंक का समर्थन करते हैं।

यह जरूरी भी है,

क्योंकि राष्ट्र धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और आतंकवाद अलगाववाद या दुश्मन देश का समर्थन दोगलापन ही कहा जायेगा और यह क्षम्य नहीं है।

मगर सोचो जो इस देश में रहते हैं भले ही उनकी धार्मिक आस्था अलग है मगर राष्ट्र के प्रति सोच समर्पण और सम्मान का है तो उन्हें क्यों हम अंजाने में कोसें ..?

क्यों उनके राष्ट्रवाद पर शक करें..?

यह मातृभूमि हम सबकी है। सबका इस पर हक है। बस फर्क यह है कि हम राख होकर इस धरती से लिपट जाते हैं तो वो मुसल्लम धरती माँ के आँचल में लेट जाते हैं।

हम केसरिया लहराते हैं तो वो हरा फहराते हैं।

और राष्ट्रवाद एक सोच एक भाव है यह धर्म जाति देखकर नहीं पैदा होता, बल्कि यह एक जज्बा है जो हर भारतीय के मन में होता है।

जिसे किसी दल या संगठन से सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं।

फर्ज करिये मैं हरा वाला ही हूँ, मगर मेरे अंदर अपने राष्ट्र के प्रति वही भाव और सम्मान है मगर मेरी धार्मिक आस्था देखकर आप मुझे द्रोही या अलगाव समर्थक तय करते हैं तो मुझे कितना ठेस पहुँचेगी, और आपकी यही नकारात्मक सोच धीरे-धीरे मुझे इस वजह से बदल देगी कि जब गलत नहीं हूँ तब यह आरोप तो सही रहने का क्या फायदा।

खैर

नफरतों के इस बाजार में अमन चैन का खरीददार इस वक्त ढूंढने से भी नहीं मिल रहे हैं आईये कम से कम हम आप तो नफरत के बाजार से अमन चैन खरीदें।

और हां उन दोगलों के लिए मेरी दिल में कोई जगह नहीं है जो भात खाएं भतार क गुण गावे यार क यानी खाते भारत का हैं रहते भारत में मगर दिल में पाकिस्तान को बसाए हैं।

आतंकवादीयों के कायराना हमले पर कई मुस्लिम मित्रों को पाकिस्तान को ललकारते लानत मलानत करते और अपने देश भारत की जयकार करते इसी फेसबुक पर देखा है, नफरतों के इस दौर में प्रेम और राष्ट्र के प्रति श्रद्धा परोसते रहिये, औऱ जो आतंक या पाकिस्तान का समर्थन करें उसे भी चापिये।

वरना वतन का अमन खत्म करने को गिद्ध और गद्दार तैयार बैठे हैं।

अमित मौर्य की कलम से

(लेखक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र “गूंज उठी रणभेरी” के संपादक हैं।)

क्या यह ख़बर/ लेख आपको पसंद आया कृपया कमेंट बॉक्स में कमेंट भी करें और शेयर भी करें ताकि ज्यादा लोगों तक बात पहुंचे

कृपया हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: