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जीएन साईंबाबा के मसले पर आपकी चुप्पी को देखता हूँ तो आपकी ईमानदारी पर शक होता है कॉ. येचुरी

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) महासचिव सीताराम येचुरी को खुला पत्र।

कामरेड सीताराम येचुरी

महासचिव सी.पी.एम.

मैं ऐसी आशा करता हूँ कि आप शरीर से स्वस्थ और एक दम फिट होंगे। क्योंकि आप बहुत व्यस्त रहते हो, आपको जो जिम्मेदारी मिली हुई हैं वो बहुत बड़ी और व्यवस्ता वाली हैं। सुबह से लेकर देर रात तक आपको बहुत से काम करने पड़ते होंगे। मींटिंगों, सेमिनारों, सम्मेलनों में आने-जाने के लिए बहुत ज्यादा सफर तय करना पड़ता होगा। आपकी ये व्यस्तता खुद के लिए न होकर मेहनतकश आवाम के लिए है।

मैंने मेरे जीवन की राजनीतिक, सामाजिक लड़ाई को सीखने की शुरुआत सी.पी.एम. से ही की थी। बहुत से सेमिनारों, रैलियों, सम्मेलनों में आपको और आपकी पार्टी के नेताओ को सुनता रहा हूँ। मेहनतकश आवाम के लिए, पूरे विश्व में साम्राज्यवाद द्वारा सताये हुए देशों वियतनाम, लीबिया, अफ़ग़ानिस्तान, इराक, अफ्रीकी हो या चाहे लैटिन अमेरिकी देशों के लोगों के लिए आप आवाज उठाते रहे हो।

लेकिन जब प्रोफेसर GN साईंबाबा के मसले पर आपकी चुप्पी को देखता हूँ तो आपकी ईमानदारी पर शक होता है। क्या कारण है कि आप GN पर हो रहे अमानवीय अत्याचार पर नही बोल रहे हो। जिस प्रकार से उसकी गैरक़ानूनी गिरफ्तारी हुई थी। उस गिरफ्तारी के विरोध में पूरे विश्व के बुद्धिजीवियों ने आवाज उठाई, ब्राजील में हुए उस समय फुटबाल विश्वकप मे बहुत से खिलाड़ियों व दर्शकों ने आवाज उठाई, लेकिन भारत की सबसे बड़ी मार्क्सवादी पार्टी चुप रही।

पूरे देश मे गांव तक जो आपकी पार्टी का जाल बिछा हुआ है लेकिन कही धरना-प्रदर्शन नही हुआ।

इस चुप्पी की जड़ में जाने की जब मैंने कोशिश की तो ये चुप्पी बड़ी डरावनी और चालाकी लिए हुए थी।

बहुत से मसलों पर आप और आपकी पार्टी इससे पहले भी नहीं बोले हो। नक्सलबाड़ी के योद्धा कामरेड चारु मजूमदार की हिरासत में हत्या हो या उसके बाद सत्ताओं द्वारा की गई हिरासत में हत्यायें या झूठी मुठभेड़ों में की गयी हत्याओं पर आपकी पार्टी ने मौन बनाये रखा।

पिछली कॉग्रेस सरकार के समय माओवादी नेता आजाद और सरकार के गृह मंत्री पी. चिदम्बरम के बीच देश के कुछ बुद्धिजीवियों की मधस्यथता से शांति वार्ता के लिए बातचीत हो रही थी उसके बाद जिस प्रकार कामरेड आजाद की हत्या झूठी मुठभेड़ में की गयी, इससे शन्तिवार्ता रूक गयी। क्योंकि सराकर ने धोखा दिया। क्या सराकर चाहती ही नही है शांति, लेकिन संसद में आपकी पार्टी द्वारा कोई आवाज नहीं इस मुद्दे पर।

सोनी सोरी जिसके साथ हिरासत में अमानवीय व्यवहार किया गया, उसकी योनि में पत्थर भर दिए गए। उसके पति को जेल में गुंडों से पिटवा कर हाथ-पांव तुड़वा दिए गए, जिसकी बाद में मौत हो गयी। सोनी सोरी का भतीजा लिंगा जिसकी गुदा में डंडा दे दिया गया। लेकिन आप चुप रहे। अमानवीय व्यवहार करने के आरोपित पुलिस अधीक्षक को केंद्र में आपके द्वारा बाहर से समर्थन से चलाई जा रही कांग्रेस की सरकार ने वीरता पुरस्कार दिया, आप चुप रहे।

अनगिनत आदिवासी महिलाओं से हिरासत में रेप की घटनाएं हुई उनकी हत्याएं हुईं, लेकिन कान तरस गए सुनने के लिए कि सी.पी.एम. सड़क से लेकर संसद तक आवाज उठाएंगी।

क्या आपकी चुप्पी सिर्फ इसलिए बनी रही क्योंकि इन लोगों ने आपकी पार्टी की राज्य सरकारों के भी गलत फैसलों का विरोध किया था। इन्होंने नंदीग्राम या सिंगुर में सत्ता द्वारा किये गए दमन का विरोध किया था या कुछ क्रांतिकारी आपके कार्यक्रम से सहमत नही है। क्या ये चुप्पी सिर्फ इसलिए बनी हुई है। अगर ये चुप्पी सिर्फ इसलिए बनी हुई है तो ये खतरनाक चुप्पी है।

भारत के क्रांतिकारी भगत सिंह को अपना आदर्श मानते है। आपकी पार्टी और आप भी मानते हो। लेकिन क्या भगत सिंह और उसके साथियों से हमने कुछ नही सीखा, क्या सिर्फ नाम लेने के लिए या सिर्फ मूर्ति वंदना के लिए भगत सिंह को कार्यक्रमो में याद करने की परवर्ती बना ली गयी है। जब लाला लाजपतराय को साइमन कमीशन का विरोध करने के कारण ब्रिटिश सत्ता ने लाठियो से पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। उस समय लाला जी और भगत सिंह अलग-अलग विचारधारा पर काम कर रहे थे। लाला जी दक्षिण पंथ की तरफ झुकाव में थे तो वही भगत सिंह और उसके साथी कम्युनिस्ट आंदोलन की तरफ।  कितनी ही बार इस मुद्दे पर लाला जी और भगत सिंह में तीखी नोक झोंक हो चुकी थी। लाला जी ने इनको साफ बोल दिया था कि मेरे पास आगे से कभी न आये। मेरे घर के दरवाजे आप लोगों के लिए बन्द है लेकिन लाला जी की मौत साम्राज्यवादी सत्ता ने की थी। जिसके खिलाफ क्रांतिकारी भगत सिंह और उसके साथी कामरेड मजबूती से लड़ रहे थे।

लाला जी की विपरीत विचारधारा होते हुए भी क्रांतिकारियों ने इसका बदला लिया क्योंकि उनका साफ मानना था कि लाला जी अलग विचारधारा से होते हुए भी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ रहे थे। इसलिए साम्राज्यवाद से लाला जी की मौत का बदला लिया जाना चाहिए। इसलिये बदला लिया भी गया।

एक 90% अपँग प्रोफेसर जो दलित परिवार से आते हैं। जिसको पैंक्रियास में संक्रमण और गॉल ब्लैडर में पथरी है, उनको Bp और ह्दय रोग की भयंकर शिकायत है। जिसका सिर्फ एक हाथ काम करता है, शरीर के बहुत से अंगों ने काम करना बंद कर दिया है।

इतने बुरे हालात होने के बावजूद भारत की सत्ता न उसको दवाई दे रही है, न किसी अस्पताल में उनको दिखाया जा रहा है। 90% विकलांग होने के कारण प्रोफेसर साईंबाबा को सहायक की जरूरत है जो उसको उपलब्ध नही करवाया गया है। उसको मानसिक टार्चर किया जाता है। कितनी बार ही वो बेहोश हो कर गिर चुके हैं। उन्होंने एक पत्र अपनी पत्नी को लिखा है जिसमे उसने बताया है कि अगर जल्दी रिलीफ नही मिली तो ये सर्दी वो नही निकाल पाएंगे। अब अगर उनको तत्काल रिलीफ नही मिली तो जल्दी ही मेहनतकश आवाम के लिए लड़ने वाले एक योद्धा को हम खो देंगे।

भविष्य में आने वाली क्रांतिकारी नस्लें जब GN के बारे में पढ़ेंगी तो वो क्रूर सत्ता को तो कोसेगी ही, कि कैसे एक महान क्रांतिकारी, मानवतावादी, प्रगतिशील बुद्धिजीवी को क्रूर सत्ता ने तड़पा-तड़पा कर मार दिया। लेकिन उससे ज्यादा आपकी चुप्पी पर आपको भी कोसेगी। जैसे आज भारत का आवाम शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की फांसी रोकने के लिए मजबूत प्रयास न करने के कारण महात्मा गाँधी को कोसती है।

जीएन साईंबाबा सत्ता से कोई माफी या भीख नही मांग रहे हैं। वो तो सिर्फ कानून के अंतर्गत रिलीफ मांग रहे है जो उनका कानूनी अधिकार बनता है। इन्ही कानूनी अधिकारों को हासिल करने के लिए भगत सिंह ने जेल में 81 दिन की भूख हड़ताल की थी उसके साथियों ने भी इन भूख हड़तालों में हिस्सा लिया था इसी भूख हड़ताल के कारण 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद जतिन दा शहीद हुए थे। इसलिए जेल नियमो के अनुसार प्रोफेसर GN को तत्काल रिलीफ़ मिले इसके लिए हमको लड़ना चाहिए। उनकी बीमारी और 90% विकलागंता को देखते हुए सरकार उनको बिना शर्त रिहा करें। रिहाई होने तक उनको जेल में-

         उनको सहायक उपलब्ध करवाया जाए।

         उनको इलाज औऱ दवाई दी जाए, अच्छे हस्पताल में उनका इलाज करवाया जाए।

         उनको पढ़ने और लिखने की सामग्री उपलब्ध करवाई जाए।

         उसकी बीमारी, अपंगता को मद्देनजर मौसम के अनुसार कपड़ो, बिस्तरों, कमरे का प्रबन्ध हो।

आपकी पार्टी अमेरिका की ग्वांतानामो जेल की अमानवीय यातनाओं पर आवाज उठाती रही है। लेकिन क्या हमारे देश की जेलों में जो यातना शिविर बने हुए है उनके खिलाफ नही बोलना चाहिए?

मै भारत का प्रगतिशील नागरिक होने के नाते व आपकी पार्टी का पूर्व साथी होने के तौर पर आपसे विनती करता हूँ कि तत्काल इस मुद्दे पर हस्तक्षेप कीजिये। सांसद व सी.पी.एम. के महासचिव होने के कारण सरकार से उचित प्लेटफार्म पर बात कीजिये। इसके साथ में अपनी पार्टी व मज़दूर, किसान, छात्र, नोजवान, महिला संघठनो को इस मुद्दे पर जिला वार विरोध प्रदर्शन करने का निर्णय भी लीजिये।

इस आशा के साथ कि आप इस मुद्दे पर जरूर बोलेंगे ओर मजबूती से लड़ेंगे।

आपका पूर्व साथी

UDay Che  

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