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पीजीआई चंडीगढ़ का अध्ययन : 2050 तक फसल अवशेष जलने से उत्सर्जन 45% तक बढ़ जाएगा

पीजीआई चंडीगढ़ का अध्ययन : 2050 तक फसल अवशेष जलने से उत्सर्जन 45% तक बढ़ जाएगा

भारत में प्राथमिक फसल अवशेष जलने और क्लीनर उत्सर्जन के लिए उनकी शमन रणनीति

वायु प्रदूषण से उत्सर्जन

Emissions of air pollutants from primary crop residue burning in India and their mitigation strategies for cleaner emissions

नई दिल्ली, 26 अक्तूबर।

वर्ष 2017 में पराली जलाए जाने के आधार पर एक अध्ययन में कहा गया है कि वर्ष 2050 तक फसल अवशेष जलने से उत्सर्जन 45% तक बढ़ जाएगा।

पब्लिक हेल्थ स्कूल, सामुदायिक चिकित्सा विभाग, पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़, {School of Public Health, Department of Community Medicine, Post Graduate Institute of Medical Education and Research (PGIMER), Chandigarh} के  डॉ. रवीन्द्र खैवाल, पर्यावरण अध्ययन विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़,{Department of Environment Studies, Panjab University, Chandigarh} के तनबीर सिंह व सुमन मोर के एक संयुक्त अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया है।

अध्ययन Journal of Cleaner Production (ELSEVIER) में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में कहा गया है कि जनसंख्या वृद्धि से खाद्य मांग में वृद्धि होगी, जो फसल उत्पादन पर दबाव डालेगा और कृषि फसल अवशेष में वृद्धि होगी।

अध्ययन में जलवायु परिवर्तन दिशानिर्देशों पर अंतर सरकारी पैनल (IPCC) का उपयोग कर फसल अवशेष जलने से विभिन्न प्रदूषकों के वायुमंडलीय उत्सर्जन का अनुमान लगाया गया है।

अध्ययन के मुताबिक भारत में कुल फसल अवशेष का 488 माउंट 2017 के दौरान उत्पन्न हुआ था, और लगभग 24% कृषि क्षेत्रों में जला दिया गया था। इसके परिणामस्वरूप 824 जीजी पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5), एलिमेंटल कार्बन (ईसी) के 58 जीजी और ऑर्गेनिक कार्बन (ओसी) के 23 9 जीजी उत्सर्जन हुआ। इसके अतिरिक्त, सीओ 2 समकक्ष ग्रीनहाउस गैसें (सीओ 2, सीएच 4, एन 2 ओ) के 211 टीजी भी वातावरण में जोड़े गए थे। हालांकि, बायोमास बिजली संयंत्रों में ऊर्जा उत्पादन के लिए फसल अवशेष का भी उपयोग किया जा सकता है और इसमें 120 TWH बिजली उत्पादन की संभावना है। यह भारत के कुल ऊर्जा उत्पादन का 10% है।

एक व्यापार के रूप में सामान्य (बीएयू) मॉडल में रुझान विश्लेषण से पता चलता है कि 2050 में फसल अवशेष जलने उत्सर्जन 45% बढ़ जाएगा, जो आधार वर्ष के रूप में 2017 है।

अध्ययन विभिन्न टिकाऊ दृष्टिकोणों की भी जांच करता है और मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर जलने वाले कृषि अपशिष्ट के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के लिए एक एकीकृत फसल अवशेष प्रबंधन मॉडल का प्रस्ताव करता है।

बीती 10 अक्टूबर को चंडीगढ़ में आयोजित एक पर्यावरण कांफ्रेंस में, डॉ खैवाल ने यह भी उल्लेख किया था कि पंजाब रसायनों और कीटनाशकों के कारण कैंसर से जूझ रहा  है। उन्होंने बताया था कि जब वे (किसान) फसल अवशेष में आग लगाते हैं, तो शेष रसायन भी हवा में बढ़ते हैं और आगे फैलते हैं। इसलिए बायोमास जलने के कारण वायु प्रदूषण का पहला शिकार किसान ही होता है।

अतः ये बात सामने आती है कि किसान फसल अवशेष जलाकर एक तरफ जहां वायु प्रदूषण फैलाता है, वहीं इस प्रदूषण का पहला शिकार वह खुद बनता है, अतः आवश्यकता इस बात की है कि किसानों के बीच में सरकार फसल अवशेष न जलाने को लेकर जागरुकता फैलाए व फसल अवशेष के समुचित प्रबंधन के लिए आवश्यक कदम उठाए।

हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), दिल्ली के इन्क्यूबेशन सेंटर से जुड़े एक स्टार्टअप ने अब फसल अपशिष्टों से ईको-फ्रेंडली कप और प्लेट जैसे उत्पाद बनाने की पद्धति विकसित की है।

अपनी नयी विकसित प्रक्रिया का उपयोग करके आईआईटी, दिल्ली के तीन छात्रों ने धान के पुआल को कप और प्लेट के निर्माण के लिए एक इकाई स्थापित की है, जो आमतौर पर प्रचलित प्लास्टिक प्लेटों का विकल्प बन सकती है।

धान के पुआल में 10 प्रतिशत तक सिलिका होती है, जिसकी वजह से अधिकतर औद्योगिक प्रक्रियाओं में इसका उपयोग करना मुश्किल होता है।

हर साल सर्दियों की शुरुआत में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में लाखों टन पराली जला दी जाती है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार, इस मौसम में अब तक पराली जलाने की पंजाब में 700 और हरियाणा में 900 से अधिक घटनाओं का पता चला है।

नासा के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक देश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में फसल अवशेष जलाने के कारण धुएं और धुंध का गुबार महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और ओडिशा तक फैल रहा है।

सरकार यदि प्रदूषण नियंत्रण व ग्लोवल वार्मिंग पर नियंत्रण के लिए गंभीर हो तो इस तरह के अन्य प्रोजेक्ट्स में निवेश कर इस समस्या का समाधान कर सकती है।

First Global Conference on Air Pollution and Health

संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की जलवायु परिवर्तन पर हाल में जारी की गई नवीनतम रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान उम्मीद से अधिक तेज गति से बढ़ रहा है। कार्बन उत्सर्जन में समय रहते कटौती के लिए कदम नहीं उठाए जाते तो इसका विनाशकारी प्रभाव हो सकता है। आईपीसीसी ने वैश्विक तापमान में वृद्धि को दो के बजाय 1.5 डिग्री से. रखने पर जोर दिया है।

आईपीसीसी की ग्लोबल वार्मिंग पर रिपोर्ट : ऊर्जा रूपान्‍तरण एवं परिवर्तनकारी बदलाव

इस वर्ष डब्ल्यूएचओ वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य पर पहला वैश्विक सम्मेलन आगामी 30 अक्टूबर से 1 नवंबर 2018 को आयोजित करेगा ताकि सरकारों और भागीदारों को वायु गुणवत्ता में सुधार और जलवायु परिवर्तन में सुधार के वैश्विक प्रयासों में एक साथ लाया जा सके।

पेरिस समझौते की समीक्षा के लिए इस वर्ष दिसंबर में पोलैंड में दुनिया भर के नेता एकत्रित होंगे। ग्लोबल वार्मिंग के लिए वायु प्रदूषण भी एक जिम्मेदार कारक है।

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