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फिर मंदिर राग यानी असत्य का अट्टहास

फिर मंदिर राग यानी असत्य का अट्टहास

हिंदुत्व के नाम पर देश को विनाशकारी रास्ते पर धकेला जा रहा

राजेंद्र शर्मा

हारे को हरिनाम का मुहावरा खासतौर पर मोदी-शाह की भाजपा को देखकर ही गढ़ा गया लगता है। बस केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को हरिनाम की जगह, राम नाम का और उसमें भी खासतौर पर अयोध्या में राम मंदिर का ही सहारा है। लेकिन, मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि बढ़ते जनअसंतोष के चलते प्रतिकूल चुनाव सामने देखकर, संघ परिवार को अयोध्या में राम मंदिर कुछ ज्यादा ही याद आ रहा है। 2019 के आम चुनाव में और जाहिर है कि उससे पहले, नवंबर-दिसंबर में हो रहे पांच राज्यों के विधानसभाई चुनावों में भी, संघ-भाजपा द्वारा सबसे बढक़र अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे के सहारे सांप्रदायिक धु्रवीकरण का खुलकर और बढ़-चढक़र कर सहारा लिया जाना तय है। लेकिन, इस मंदिर राग का खतरा चुनाव के नतीजों से कहीं बड़ा है। ‘हिंदुओं के साथ अन्याय’ और ‘हिंदुओं के विक्षोभ’ का जो नैरेटिव गढ़ा जा रहा है और इसके सहारे जो उन्माद जगाया जा रहा है, किसी न किसी रूप में 1992 की वापसी के ही रास्ते पर ले जा सकता है। इसके खतरे जग-जाहिर हैं। दुर्भाग्य से हिंदुत्व के नाम पर देश को इसी विनाशकारी रास्ते पर धकेला जा रहा है।

संघ परिवार के नेतृत्व में हिंदुत्ववादी ताकतें. जो छद्म हिंदू धर्म तथा हिंदू परंपरा गढ़ रही हैं, उसी के हिस्से के तौर पर एक नयी धार्मिक भाषा व शब्दावली भी गढ़ी जा रही है। इस तथाकथित हिंदू धार्मिक शब्दावली में, एकदम ताजा-ताजा एक शब्द जुड़ा है–धर्मादेश!

यह अचरज की बात नहीं है कि दीवाली से ऐन पहले, राजधानी में बुलाए गए दो-दिवसीय संत सम्मेलन में जहां ‘‘धर्मादेश’’ के दावे के साथ केंद्र सरकार से यह मांग की गई कि अध्यादेश लाकर या कानून बनाकर अयोध्या में राम मंदिर Ram temple in Ayodhya बनवाए, वहीं यह ध्यान दिलाना जरूरी समझा गया कि ‘भविष्य की योजना बनाते हुए हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि किसी भी सूरत में हमारी केंद्र सरकार अस्थिर नहीं होनी चाहिए।’

भाजपा के प्रति खुली वफादारी की हद तक राजनीतिक है ‘‘धर्मादेश’’

bhaajapa ke prati khulee vaphaadaaree kee had tak raajaneetik hai ‘‘dharmaadesh’’

यहां ‘हमारी केंद्र सरकार’  का प्रयोग कोई चलताऊ तरीके से नहीं कर दिया गया था। उल्टे इस पर भरपूर जोर था कि वर्तमान सरकार से संतों को उम्मीदें थीं, जिन्हें और कोई सरकार पूरा कर ही नहीं सकती है। ‘सिर्फ यही सरकार है जो हमारी उम्मीदें पूरी करेगी!’

साफ है कि जिसे ‘‘धर्मादेश’’ बताया जा रहा है, वह धार्मिक कम और राजनीतिक ज्यादा तो है ही, मौजूदा सत्ताधारी पार्टी के प्रति खुली वफादारी की हद तक राजनीतिक है।

    बहरहाल, अखिल भारतीय संत समिति का यह सम्मेलन, मौजूदा सरकार के साथ अपनापा जताने पर नहीं रुक गया। इससे आगे बढक़र उसने 2019 के चुनाव में इसी सरकार को दोबारा चुनवाने का खुला राजनीतिक आह्वान भी किया। सभी हिंदुओं को यह संदेश दिया गया: ‘‘अगर जीवित रहना है, मठ-मंदिर बचाना है, बहन-बेटी बचाना है, संस्कृति और संस्कार बचाना है, तो इस सरकार को दोबारा से लाना है।’’

यह कथित संत समाज, हिंदुओं से इस सरकार को दोबारा लाने की अपील करने पर ही नहीं रुकने वाला है। उसने अपनी इस अपील को चुनाव में वास्तविक वोटों में बदलने के लिए बाकायदा प्रचार अभियान छेडऩे का भी फैसला लिया है। इसके हिस्से के तौर पर पहले चरण में 25 नवंबर को अयोध्या, नागपुर तथा बंगलूरु में ‘‘धर्म सभाओं’’ का आयोजन किया जाएगा। उसके बाद 9 दिसंबर को, दिल्ली में साधुओं का और बड़ा सम्मेलन आयोजित किया जाएगा और उसके बाद, 18 दिसंबर से देश भर में 500 ऐसी ही सभाओं का आयोजन किया जाएगा। संक्षेप में यह कि कथित संतों के चुनावी प्रचार कार्यक्रम की भी घोषणा कर दी गई है।

संघ परिवार द्वारा प्रायोजित पाखंड ‘‘धर्मादेश’’

sangh parivaar dvaara praayojit paakhand ‘‘dharmaadesh’’

कहने की जरूरत नहीं है कि ‘‘धर्मादेश’’ का यह पाखंड संघ परिवार द्वारा ही प्रायोजित किया गया है, जिसके राजनीतिक बाजू, भाजपा के हाथों में इस समय केंद्र में सत्ता है। बेशक, जैसाकि संघ परिवार के मुखिया, आरएसएस का कायदा ही है, उसने एक साथ इस कथित धर्मादेश से सहमति और दूरी, दोनों दिखाने की कोशिश की है। यहां तक कि उसके हिंदू धार्मिक बाजू, विश्व हिंदू परिषद ने भी संत समिति के सम्मेलन से खुद को अलग दिखाने की कोशिश की है। दूसरी ओर, विहिप के प्रमुख नेतागण बाकायदा इस सम्मेलन में मौजूद थे। हां! विहिप से कुछ स्वतंत्रता दिखाते हुए हिंदुत्व के मुद्दों के लिए काम करने वाले और मौजूदा सरकार को अकुंठ समर्थन देने वाले, बाबा रामदेव तथा श्रीश्री जैसे नये जमाने के संत भी, इस मुखर रूप से राजनीतिक आयोजन में शामिल हुए।

छद्म हिंदू परंपरा के लिए, एक नयी हिंदू धार्मिक शब्दावली ‘‘धर्मादेश’’

chhadm hindoo parampara ke liye, ek nayee hindoo dhaarmik shabdaavalee ‘‘dharmaadesh’’

कथित ‘‘धर्मादेश’’ एक और इतना ही दिलचस्प पहलू यह है कि यह विचार ही मूलत: हिंदू-इतर, इस्लामी/ ईसाई धार्मिक परंपराओं की नकल पर आधारित है।

जैसाकि हिंदू धार्मिक परंपरा के इतिहास में पहली बार ऐसा ‘‘धर्मादेश’’ किए जाने की वकालत करते हुए इस सम्मेलन में बार-बार कहा गया था, इसके पीछे विचार मूलत: इस्लामी परंपरा के ‘‘फतवों’’ तथा ईसाई परंपरा के ‘‘चर्च के संदेशों’’ का हिंदू समकक्ष गढऩे का ही था। इसीलिए, हमने शुरू में ही कहा कि यह हिंदुत्ववादी राजनीतिक मकसद से गढ़ी जा रही छद्म हिंदू परंपरा के लिए, एक नयी हिंदू धार्मिक शब्दावली के गढ़े जाने का ही मामला है।

    इस अभियान का अपने चरित्र में मूलत: राजनीतिक होना जितना स्पष्ट है, उतना ही स्पष्ट है इसकी बागडोर संघ परिवार के हाथों में होना। जितना सच चुनाव सिर पर आ रहा देखकर, संघ परिवार के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले इन संतों-महंतों का ‘‘राम मंदिर’’ के लिए बेचैन होने लगना है, उतना ही सच यह भी है कि इसे लेकर इन संतों समेत विभिन्न हलकों से अचानक जोर-शोर से उठने लगी मंदिर की मांगें शब्दों के मामूली हेर-फेर के साथ, आरएसएस के सरसंघचलाक, मोहन भागवत के इस बार के विजयदशमी संबोधन में दिखाई गई दिशा में ही बढ़ रही हैं। जैसाकि मीडिया में व्यापक रूप से नोट किया गया है, संघ प्रमुख ने 2013 के बाद पहली बार अपने वार्षिक नीति-वक्तव्य माने जाने वाले विजयदशमी संबोधन में अयोध्या में राम मंदिर को ही याद नहीं किया, यह भी एलान कर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का अब और इंतजार नहीं किया जा सकता है, इसलिए सरकार को ही कानून बनाकर मंदिर बनाने का रास्ता तैयार करना चाहिए। कहने की जरूरत नहीं है कि इस सबके बीच भागवत यह याद दिलाना भी नहीं भूले कि मौजूदा सरकार अच्छा काम कर रही है।

    इसके साथ ही जैसे बांध का फाटक खुल गया और चारों ओर से मंदिर-मंदिर का शोर उठने लगा। संत सम्मेलन इसी का हिस्सा था, लेकिन एक ही हिस्सा। संघ परिवार के दूसरे संगठन भी इस मांग को लेकर सक्रिय हो गए हैं।

इतना ही नहीं, उसके राजनीतिक बाजू भाजपा ने आम तौर पर अपने राम मंदिर के पक्ष में होने की बात ही नहीं दोहरायी है, सबरीमला विवाद के बहाने से उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट को आगाह भी कर चुके थे कि धार्मिक मामलों में ऐसे फैसले नहीं करे जिनका पालन संभव नहीं है क्योंकि वे लोगों की आस्थाओं से टकराते हैं। इसका इशारा अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन अपीलों की ओर भी था और यह तब और भी स्पष्ट हो गया जब सर्वोच्च न्यायालय  के इस मामले की सुनवाई अगली जनवरी तक टाले जाने के बाद, संघ परिवार के विभिन्न बाजुओं ने इसे ही ‘हिंदुओं के साथ अन्याय’ बताते हुए, शीर्ष अदालत पर ही हमला बोल दिया। कहा जा रहा है कि हिंदू अब और अदालत के फैसले का इंतजार नहीं कर सकते। हिंदू अधीरता के इस स्वांग के जरिए, सबरीमला प्रकरण के माध्यम से खुलकर सामने आयी इस सचाई को छुपाने की कोशिश की जा रही है कि भाजपा-आरएसएस समेत हिंदुत्ववादियों को, अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला करना तो वैसे भी मंजूर ही नहीं था। उन्हें तो सिर्फ और सिर्फ अपने मनमुताबिक फैसला चाहिए। इसके लिए शीर्ष अदालत को धौंस में लेने से लेकर, अपनी सरकार से उसके निर्णय के अधिकार को को छिनवाने तक, वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस प्रक्रिया में देश के संविधान तथा कानून की धज्जियां बिखर जाती हैं, तो उनकी बला से।

    भागवत के आदेश के बाद से इन पंक्तियों के लिखे जाने तक, केंद्र सरकार के कम से कम पांच मंत्री, किसी न किसी रूप में राम मंदिर के मामले में अपनी अधीरता दिखा चुके हैं। और आरएसएस से पिछले वर्षों में ही भाजपा में भेजे गए, भाजपा के एक महासचिव तो इस सिलसिले में ‘हिंदुओं के आहत’ होने से लेकर, ‘1992 जैसे आंदोलन की वापसी’ तक के इशारे कर चुके हैं।

उधर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मामले में दीवाली पर खुशखबरी देने के इशारे करते रहे हैं। क्या इस अंधेरे को और बढ़ाने के योगी के दीवाली ईवेंट के बावजूद, दीवाली के दिए इस अंधेरे से लडऩे के लिए रास्ता दिखाएंगे?  

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