पिंक दरअसल औरत को देखने का पुरुष का नजरिया है

पिंक रिव्यू : पुरुष स्त्री को सेक्स करने की एक वस्तु ही समझता रहा है। हमारी कुंठा लिंग के आवेग पर बलात्कार के राग गाती जाती है जिस पर हमारी संस्कृति सर झुका कर बड़े कौशलपूर्ण तरीके से ढोलक पर थाप देती नजर आती है।
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पिंक दरअसल औरत को देखने का पुरुष का नजरिया है

PINK : A man’s perspective on looking at women

पिंक दरअसल औरत को देखने का पुरुष का नजरिया है। यह पुरुष की लैंगिक पराकाष्ठा का दमित शिष्टाचार है

पुरुषवादी सामंती प्रवृत्ति की शिकार पूंजीवादी सभ्यता की युवा सोच पर सवाल उठाती फिल्म: पिंक

पिंक दरअसल औरत को देखने का पुरुष का नजरिया है। यह पुरुष की लैंगिक पराकाष्ठा का दमित शिष्टाचार है जो अपनी परुषता याने कठोरता के लिए अपने अधीन अस्मिता को कोमलता का रंग देने की साजिश करता है।

यह कोमलता प्रकृतिक सिद्धांतों से विरुद्ध अनवरत एक ऐसी लकीर के रूप में उभरती है, जिस पर लगातार झूठी जटिलताओं के लेयर चढ़ा कर हम संस्कृति का स्तम्भ खड़ा करते हैं।

ये रंग दरअसल हमारी कुंठा के रंग हैं, जो लैंगिक विविधता पर थोपे दिये गए हैं।

इन रूढ़ियों का शिकार कैसे शिकारी करते आए हैं हमें समाजशास्त्रीय औजारों से समझना चाहिए। इन रूढ़ियों का विकास रहस्यवाद के झरोखों से निर्मित हुआ है, क्योंकि यह कमजोरियों को प्रश्रय देने का सबसे सेफ जोन है। मीर तकी मीर का एक शेर है-

नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए।

पंखड़ी एक गुलाब की सी है ॥

मीर एक बहुत ही संजीदा शायर हैं। उन्होंने पुरुष के परुष मन की याचना को सामाजिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक कमजोरियों को भी दर्शाया है। गुलाब की पंखड़ी से तुलना कर यह तो दिखा दिया गया है कि तुम्हारे लबों का दायरा मेरे जेहन में कितना है और कैसा है।

पिंक फिल्म इधर हिंदी सिनेमा की एक घटना है।

इसकी चर्चा खूब हो रही है और होनी भी चाहिए।

इन चर्चाओं का अवसर हिंदी सिनेमा कभी-कभार दे देता है।

स्त्री के बारे में हमरी सोच जिन सामंती ठिकानों से आई है उस तरफ एक इशारा इस फिल्म में देखने को मिलता है।

आज की युवा पीढ़ी अपने संक्रमण काल के ग्लोबल युग में जी रही है। उसमें आधुनिकता का पिछड़ापन उत्तर-आधुनिकता की वैचारिक विसंगतियों के जोड़ का दिखता है। लेकिन यह जोड़ आधुनिकता के प्रति जवान पीढ़ी का ऋणात्मक आवेग भर है।

देश की यह युवा दिखने वाली कतार सामंती पुरुषवादी मूल्य-चिंता में मशगूल है और श्रेष्ठताबोध की सम्पन्न जटिलता समाज में अपने अहं को स्थापित करने के क़यास लगा रही है। यह आवरणों में जीने की कलात्मकता के कवच में छिप कर वैचारिक रास्ते को कूड़े-कबाड़ और कीचड़युक्त भावुकता में तब्दील करने में नितांत भागीदार बनी हुई है।

यह संक्रमण जितना बढ़ता जाता है नई पीढ़ी सामंजस्य का अवसरवादी सरल तरीका लगातार अपनाती रहती है।

इस फिल्म में पुरुष की युवा पीढ़ी का यह चरित्र हमें दिखाई पड़ता है।

और एक बात जो इस फिल्म में गौर करने लायक है वह यह कि युवा पीढ़ी के साथ उनकी ज़िम्मेदारी लिए एक अधेड़ पीढ़ी भी होगी जैसे लड़कों और लड़कियों के माता-पिता और दादा वगैरह।

इस प्रौढ़ा पीढ़ी की तरफ इस फिल्म में अटकलबाजी को इग्नोर किया गया है, उनकी लड़कियां और लड़के क्या करते है लगभग उसमें उनकी दखलंदाज़ी की गुंजाइस नदारद है। इसे हो सकता है कि जानबूझ कर इसलिए भी इग्नोर किया गया हो कि हमें युवा पीढ़ी कि स्थिति को ही दर्शना है उसका दखल इस पीढ़ी के दिमाग में एक मूल्य-चिंता लिए हुये दिखाई देता है। उसे न दिखा कर या इग्नोर कर निर्देशक ने फिल्म को भटकाव से बचाया है। लेकिन युवा पीढ़ी के बाप-दादे एक निरापद कट्टर जटिलता से कैसे संक्रमण लिए हुये हैं और वह कितना व्याकुल और परवाह करते हुये पाये जाते हैं, समाज में उनकी उपस्थिति अधिकारों के महासुखवाद में गद्दर बनी हुई है।

यह सब फिल्म में दिखने से मामला अपने लक्ष्य से भटक जाता जो दिखाने का उद्देश्य था, पीछे छूट जाता, इसलिए इसे अंदाजा लगाने के लिए जगह छोड़ देता है।

दूसरा मामला कोर्ट की न्यायिक संकल्पना पर नैतिकता की आदर्शवादिता का दिखाई देता है।

इस फिल्म में मात खाई हुई लड़कियों को जिस तरह न्याय मिला है और अपराधियों को सजा, इसमें असल जिंदगी यदि देखे तो बहुत ही दूसरे तरह की है।

पहली बात तो यह कि मुकद्दमों का फैसला आने में इतना लंबा समय लग जाता है, कि ज़िंदगी जूझते-जूझते बहुत कुछ परास्त हो जाती है। और पैसे वाले तो ऐसे मामलों में अपनी शक्ति का परचम लहरा कर प्रताड़ित को इस बीच ठिकाने लगा देते हैं या सौदा कर लेते हैं।

ऐसे प्रश्न भी इस फिल्म को देखते हुये लगातार दिमाग में आते रहते हैं कि फिल्म में जो न्याय नैतिक तरीके से मानवाधिकार की तरह बहुत कुछ आसानी से मिलता हुआ दिखाई देता है वैसा आज भी समाज में संभव नहीं है। लेकिन दिल्ली जैसे शहर में एक जागरूक तबके में यह बहुत कुछ संभव भी है जिस परिवेश पर यह फिल्मांकन हुआ है।

यह बात भी सही है कि फिल्म इस तरफ यदि झुकती तो विमर्श के अपने विश्लेषण से दूर भी हो जाती।

मीनल (तापसी पन्नू), फलक (‍कीर्ति कुल्हारी) और एंड्रिया (एंड्रिया तारियांग) के रूप में यह फिल्म तीन लड़कियों की एक कहानी पर आधारित है। ये लड़कियां दिल्ली में एक फ्लैट में रहती हैं और नौकरीपेशा हैं। दिल्ली के कारपोरेट कल्चर में इनकी नौकरियाँ जीवन को सामान्य तरीके से चलाने में भी आर्थिक तौर पर तंज़ कसती हुई ही मालूम होती हैं। ये लड़कियां एक रॉक शो में राजवीर(अंगद बेदी) के ग्रुप के लड़कों से मिलती हैं।

वहीं इनकी आपस में जान-पहचान एक दोस्ती के रूप में बदल जाती है।

आगे ये सब होटल में एक पार्टी एंजॉय करते हैं जहां इन लड़कियों को हँसने-मुसकुराने को सेक्स का आमंत्रण समझ लिया जाता है। और राजवीर मीनल को कामुक शरारत में छूने लगता है।

मीनल मना करती लेकिन राजवीर जबर्दस्ती करने लगता है। मीनल शराब की बोतल राजवीर के सिर पर फोड़ देती है। घटना के बाद राजवीर चाहता है कि मीनल उससे माफी मांगे लेकिन मीनल माफी नहीं मांगना नहीं चाहती, क्योंकि उसने कोई गलती नहीं की। राजबीर के पुरुष ईगो को यह बर्दाश्त नहीं होता और सबक सीखने के लिए मीनल को राजवीर ग्रुप के लोग रास्ते से जबरन कार में किडनैप कर लेते हैं और उसके साथ समूहिक बलात्कार कर उसे छोड़ देते हैं। सभी लड़कियां डरी हुई हैं वह राजवीर के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने पर भी बार-बार सोचती हैं। लेकिन जब रिपोर्ट करती हैं तो राजवीर का पुलिस पक्ष लेती है क्योंकि वह एक ऊंचे ओहदेदार का भतीजा है। राजवीर भी रिपोर्ट लिखवाता है और जिसकी सुनवाही कर पुलिस प्रशासन लड़कियों को जबरन परेशान करता है।

आगे मामला कोर्ट में पहुंचता है।

निहायत बूढ़े दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन) उन लड़कियों के फ्लैट के पास रहते हैं जो उनका केस लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। उधर राजवीर के वकील (पीयूष मिश्रा) कोर्ट में जबर्दस्त ऐक्सन के साथ दिखाई देते हैं। लेकिन दीपक सहगल स्त्री के संदर्भ में अपने तार्किक तथ्यों के आधार पर मुक़दमा जीत लेते हैं।

लड़कियां बा-इज्जत बरी होती हैं और राजवीर और उनके दोस्त सजा पाते हैं। यह कहानी है इस फिल्म की। फिल्म देखने के बाद अमिताभ के डायलोग लगातार गूँजते रहते हैं।

फिल्म के अंतिम हिस्से में राजवीर से दीपक सहगल जो सवाल कोर्ट में पूछते हैं, वह पुरुषवादी अहं को झकझोर देते हैं। राजबीर जैसे युवा लोग सामंती समझ में चूर दिखाई देते हैं। वह सामंती मूल्यों में पूंजीवादी सभ्यता के लिजलिजे लेकिन पुरुषवादी अहं में अकड़े हुये दिखाई देते हैं।

यह हालात देश के युवा मिजाज पर गहन सवाल उठती है। सहगल राजवीर से पूछते हैं कि ‘मीनल शराब पीने के लिए पैग बना रही थी तो आप को यह नहीं लगा कि यह खराब लड़की है आप उठ कर चले क्यों नहीं गए ?’

राजवीर चकराकर बोलता है ‘मुझे नहीं लगा’। फिर सहगल पूछते हैं ‘तुम्हारे घर की औरते शराब पीती हैं ?’, उसमें शिष्टता का पुरुषवादी अहं गुस्से से लाल हो जाता है। राजवीर गुस्से में रुक कर जवाब देता है Only men drink ।

वह फिर सवाल करते हैं ‘आप की माँ आप की बहन ड्रिंक नहीं करतीं ?’ राजवीर गुस्से से घूरता हुआ कहता ‘अच्छे घर की औरते ड्रिंक नहीं करती।’ वकील : ‘पार्टीज़ में जाती हैं?’

राजवीर : ‘फैमिली गेदरिंगस में जाती हैं पार्टीज़ में नहीं’।

सहगल : ‘इसलिए जो लड़कियां शराब पीती हैं, पार्टीज़ में जाती हैं उन पर पुश्तैनी हक बन जाता है आप का। आप के घर की अच्छी लड़कियां शराब नहीं पीती हैं इसलिए अच्छी हैं ये पीती हैं इसलिए बुरी हैं खराब हैं, और इनके साथ कुछ भी किया जा सकता है’।

फिर वकील सहगल राजवीर को एक तस्वीर दिखते हैं जिसमें राजवीर की बहन एक पार्टी में शराब पी रही। इसे देख कर राजवीर आगबबूला हो जाता है। उसका अभिजात्यवादी बौखलाया हुआ दिमाग काबू से बाहर हो जाता है।

वह बड़बड़ाता है ‘तमीज़ से बात कर तुझे पता नहीं तू किस से बात कर रहा है’ ये गलत है मेरी बहन ऐसा नहीं करती, बैठ कर पीना किसी के साथ भी चले जाना, ये ऐसी लड़कियां करती हैं, अच्छे घर की नहीं। ऐसी लड़कियों के साथ ऐसा ही होता है’।

इस संवाद को सुनते हुये अचानक अलोकधन्वा की बेहद लोकप्रिय कविता ‘भागी हुई लड़कियां’ याद आती है।

पुरुषवादी अहं को चुनौती देती हुई, सामंती मूल्यों को धता बताती हुई, उबले हुये टुच्चे नैतिकतावाद पर जबर्दस्त ठोकर मारती हुई। आप भी देखिये ये सन 1988 ई. के कागज पर दर्ज पंक्तियाँ-

“तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रमिकाओं में” !

‘शराब पीना उनकी choice हैं लेकिन वह available होने का साइनबोर्ड बन कर नहीं जाती हैं वो’। लेकिन ‘फ्यूडल मेंटलिटी’ के शिकार बने हुये वेल एजुकेटेड लड़के यही समझते है’।

आलोक जी की यह कविता इस प्रासंगिकता को हिला कर रख देती है। आगे का अंतिम संवाद ‘नो का मतलब सिर्फ नो होता है’। यह एक मर्मस्पर्शी गूंज लिए दिखाई देता है। ‘NO No, Your Honor ! No सिर्फ एक शब्द नहीं अपने आप में एक पूरा वाक्य है इसे किसी तर्क, स्पष्टीकरण, Explanation या व्याख्या की जरूरत नहीं न का मतलब न ही होता है **********उसे बोलने वाली लड़की कोई परिचित हो, फ्रेंड हो, गर्लफ्रेंड हो, कोई सेक्स वर्कर हो, या आप की अपनी बीवी क्यों न हो !No means no’ यह फिल्म में आखिरी के संवाद हैं जो पुरुष के गर्हित गरूर को तोड़ते हैं।

हमारी सामंती परंपरा पुरुष के अहं को संस्कृति तक की पराकाष्ठा तक पहुँचाती है। यहाँ पुरुष की शक्तिशाली अहमियत के नाते सभ्यताओं का विकास लैंगिक दुर्भावनाओं से हुआ है।

पुरुष स्त्री को सेक्स करने की एक वस्तु ही समझता रहा है। हमारी कुंठा लिंग के आवेग पर बलात्कार के राग गाती जाती है जिस पर हमारी संस्कृति सर झुका कर बड़े कौशलपूर्ण तरीके से ढोलक पर थाप देती नजर आती है।
हमारी परम्पराओं में सामंतवाद के बीज सड़ रहे हैं। इस सड़ांध से बेशर्मी की पूंजीवादी फ़सल लहलहा रही है।
हमारी सभ्यता के निशान कितने पुरुषवादी हैं, फिल्म के संवाद को याद रखते हुये, मध्य कालीन हिंदी के दूलह की एक कविता देखिये। और मैं तो यह भी कहता हूँ, अपने रीतिवादी मिजाज के चलते जो छंद और लय के सामंती लालित्य पर मरते रहते हैं, इस पद की आग में कूद कर जल्दी से आत्मदाह कर लें-
“धरी जब बाहीं तब करी तुम ‘नाहीं’,

पाय दियौ पलकाही नाहीं ‘नाहीं’ कै सुहाई हौ ।

बोलत में नाहीं, पट खोलत में नाहीं,

कवि दूलह, उछाही लाख भांतिन लहाई हौ ॥

चुंबन में नाहीं परिरंभन में नाहीं,

सब असन बिलासन में नाहीं ठीक ठाई हौ।

मेलि गलबाहीं, केली कीन्हीं चितचाहीं, यह

‘हाँ’ ते भली ‘नाहीं’ सो कहाँ से सीखि आई हौ॥”

इस बलात्कार को हमारी ढीठ तथाकथित बौद्धिक पीढ़ी रोमांटिसिज़्म कहती आई है।
हमारा संस्कृतिवाद इसी बलात्कारी कुंठा से उपजा है।

इस महादेश में साहित्य, कला, सिनेमा, राजनीति जैसे सभी क्षेत्रों में इन्हीं दूल्हों की झमकती आई है, सारी सत्ताएँ इन्हीं की बपौती बनी हुई हैं, और इन्हीं दूल्हों के चतुर लंपट सहबाले बेहूदे संस्कृतिवाद का झण्डा ढो रहे हैं और जुलूसों में चिल्ला कर जनता को मूर्ख बनाने में लगे हैं।

हमारे अधकचरे बौद्दिक तबके के सेनानी भावुकता और संवेदनशीलता के बीच आज भी फर्क कर पाने में खुद को अक्षम पाते हैं। वह कविता सुनकर या फिल्म देखकर अपनी भावुकता के लतीफ़े चटखारते रहते हैं। लेकिन यह फिल्म उन्हें भी शायद कुछ-कुछ हिलाडुला सकेगी।

निष्कर्षतः अनिरुद्ध रॉय चौधरी के निर्देशन में बनी यह फिल्म अपनी कलात्मकता में यथार्थ से जुड़ती है।

शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

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