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खंगाली जाए सत्तारूढ़ व विपक्षी दलों के मुख्य नेताओं की राजनीतिक कुंडली

राजनीति में चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत अक्सर सुनने को मिलती है। इसका मतलब है कि लगभग सभी राजनीतिक दलों के मुख्य नेता कहीं न कहीं भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि सरकारी कोषों में भले ही पैसा न हो पर विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं ने अथाह संपत्ति अर्जित कर रखी है।

लोकतंत्र के लिए विपक्ष का मजबूत होना बहुत जरूरी माना जाता है पर मोदी सरकार बनने के बाद यह बात लोगों के घर कर गई है कि देश में विपक्ष नाम की कोई चीज है ही नहीं। यह धारणा ऐसे ही नहीं बनी है। संसद में तो विपक्ष के सांसदों की संख्या कम है ही साथ ही सड़कों पर भी विपक्ष कहीं नहीं दिखाई दे रहा है। देश में जब रोजी-रोटी का बड़ा संकट हो। अधिकतर सरकारी विभागों का निजीकरण किया जा रहा हो। मॉब लिंचिंग के मामले लगातार सुनने को मिल रहे हों। कानून व्यवस्था पूरी तरह से गड़बड़ा गई हो। ऐसे में विपक्ष का चुप्पी साध लेना इन सब बातों को बल देता है। विपक्ष की इसी कमजोरी का फायदा भाजपा बखूबी उठा रही है।

विपक्ष के मुख्य नेताओं के धंधेबाज हो जाने को मोदी ने बखूबी समझ लिया है। अब इस कमजोरी का फायदा सत्ता के लिए चुनाव में उठाया जा रहा है। जहां-जहां विधानसभा चुनाव आ रहे हैं वहां-वहां केंद्र सरकार (भाजपा) वहां के मुख्य नेताओं को टारगेट बना रही है। हाल ही में हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई है। केंद्र सरकार ने जहां हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला परिवार, कुलदीप बिश्नोई परिवार के साथ हुड्डा परिवार पर शिकंजा कसा है, वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र में एनसीपी प्रमुख शरद पवार और उनके भतीजे अजीत पवार को टारगेट बनाया है। अब इन चाचा भतीजे की मुश्किलें बढ़नी तय मानी जा रही हैं क्योंकि 25000 करोड़ के बैंक फ्रॉड घोटाले में शरद पवार, अजीत पवार के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की मुंबई शाखा ने केस दर्ज कर लिया है। साथ ही महाराष्ट्र स्टेट कारपोरेशन बैंक से जुड़े हुए 70 लोगों को भी इस केस में आरोपी बनाया गया है। इस मामले में मुंबई पुलिस ने पिछले महीने एक एफआईआर दर्ज की थी।

भले ही शरद पवार व उनके भतीजे ने अरबों की संपत्ति अर्जित कर रखी हो पर राजनीतिक मामलों में ईडी का ट्रैक रिकार्ड भी कोई खास अच्छा नहीं है।

ईडी का अब तक यह रिकार्ड रहा है कि वह मामला तो दर्ज़ कर लेती है पर ठोस साक्ष्य ढूढ़ने में चूक कर जाती है, या फिर मैनेज हो जाती है। शरद पवार व उनके भतीजे पर भले ही कितने आरोप लगते रहे हों पर महाराष्ट्र में अगले महीने की 21 तारीख को होने वाले चुनाव से ठीक एक महीने पहले हुई इस कार्रवाई से विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का मौका जरूर मिल गया है।

बैंक फ्रॉड घोटाले (Bank fraud scam) के अन्य आरोपियों में दिलीपराव देशमुख, इशरार लाल जैन, जयंती पाटिल, शिवाजी राव नलवड़े और आनंदराव अडसुल का नाम शामिल है। इस मामले में 2007 से 2011 के बीच आरोपियों की मिलीभगत से बैंक को करोड़ों रुपए के नुकसान होने का आरोप है।

इस घोटाले में आरोपियों में 34 जिलों के विभिन्न बैंक अधिकारी भी शामिल बताये जा रहे हैं। ये नुकसान चीनी मिलों और कताई मिलों को लोन देने और उनकी वसूली में की गई गड़बड़ी के कारण हुआ बताया गया है।

गौरतलब है कि बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एस सी धर्माधिकारी और जस्टिस एस के शिंदे की पीठ ने 22 अगस्त को कहा था कि मामले में आरोपियों के खिलाफ ठोस साक्ष्य’ हैं और आर्थिक अपराध शाखा को पांच दिनों के अंदर प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिए थे। हाईकोर्ट ने माना था कि इन सभी आरोपियों को बैंक घोटाले के बारे में पूरी जानकारी थी। इनके खिलाफ पुख्ता सुबूत होने का दावा किया जा रहा है।

एनसीपी नेताओं के अलावा अन्य आरोपियों में पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी के नेता जयंत पाटिल और राज्य के 34 जिलों में बैंक इकाई के अधिकारी शामिल बताये जा रहे हैं। इनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (ठगी और बेईमानी), 409 (नौकरशाह या बैंकर, व्यवसायी या एजेंट द्वारा आपराधिक विश्वास हनन), 406 (आपराधिक विश्वास हनन के लिए सजा ), 465 (धोखाधड़ी के लिए सजा), 467 (मूल्यवान चीजों की धोखाधड़ी) और 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र की सजा) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

शरद पवार और जयंत पाटिल समेत बैंक के अन्य डायरेक्टर के खिलाफ बैंकिंग और आरबीआई के नियमों का उल्लंघन करने का आरोप है। इन्होंने कथित तौर पर चीनी मिल को कम दरों पर कर्ज दिया था और डिफॉल्टर की संपत्तियों को कौड़ियों के भाव बेच दिया था। आरोप है कि इन संपत्तियों को बेचने, सस्ते लोन देने और उनका पुनर्भुगतान नहीं होने से बैंक को 2007 से 2011 के बीच 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन वित्त मंत्री अजित पवार उस समय बैंक के डायरेक्टर थे।

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की जांच के साथ ही महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव सोसायटीज कानून के तहत अर्द्ध न्यायिक जांच आयोग की तरफ से दायर आरोप पत्र में नुकसान के लिए पवार और अन्य आरोपियों के निर्णयों, कार्रवाई और निष्क्रियताओं  को जिम्मेदार ठहराया गया था।

स्थानीय कार्यकर्ता सुरिंदर अरोड़ा ने 2015 में आर्थिक अपराध शाखा में शिकायत दर्ज कराई और हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की थी।

भले ही यह कार्रवाई राजनीति से प्रेरित लग रही हो पर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए इस तरह के प्रयास कारगर साबित हो सकते हैं। हां यह कार्रवाई बिना किसी स्वार्थ और भेदभाव के हो। जिस तरह से विपक्ष के नेताओं को टारगेट किया जा जा रहा है, उसी तरह से सत्तापक्ष में बैठे नेताओं की भी राजनीतिक कुंडली खंगाली जाए।

देश में जितने भी दल भारतीय राजनीति में स्थापित हैं, उन दलों के मुख्य नेताओं की संपत्ति की जांच कर आय से अधिक संपत्ति जब्त की जाए। इस तरह के प्रयास देश व समाज हित में तभी कारगर माने जाएंगे जब राजनीति से बेशुमार संपत्ति अर्जित करने वाले नेताओं को जेल की सलाखों के बीच डाला जाएगा। इस तरह से की गई कार्रवाई से जहां भ्रष्ट नेता बेनकाब होंगे वहीं राजनीति में लूट-खसोट की प्रवृत्ति पर भी काफी हद तक अंकुश लगेगा। भ्रष्टाचार करने व गलत काम को दबाने के लिए राजनीति में आने की प्रवृत्ति पर भी काफी हद तक बदलाव आएगा।

CHARAN SINGH RAJPUT चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
CHARAN SINGH RAJPUT चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

देश की स्थापित पार्टियों के जितने भी मुख्य नेता हैं, वे आज की तारीख में राजा-महाराजाओं जैसी जिंदगी जी रहे हैं। जनता के लिए देश के लिए परेशानी झेलने और आर्थिक मंदी का रोना रोया जाता है पर विभिन्न राजनीतिक दलों के मुख्य नेताओं के एशोआराम की जिंदगी पर कोई असर नहीं पड़ता। उनकी संपत्ति में लगातार इजाफा होता रहता है।

देश का उद्धार करना है तो विपक्ष ही नहीं बल्कि सत्ता पक्ष में बैठे भ्रष्ट नेताओं पर भी शिकंजा कसना होगा। या फिर विपक्ष के जो नेता भाजपा की शरण में चले जा रहे हैं, उनके खिलाफ भी जांच बैठानी चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाये जा रहे अभियान को बिना किसी भेदभाव के बड़े स्तर पर चलाना चाहिए। यदि राजनीति और सत्ता के लिए भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का इस्तेमाल किया जाएगा तो इसका कोई खास फायदा देश व समाज को नहीं मिलेगा।

चरण सिंह राजपूत

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