Home » समाचार » उत्तर प्रदेश का जमीनी परिदृश्य और कांग्रेस की भूमिका

उत्तर प्रदेश का जमीनी परिदृश्य और कांग्रेस की भूमिका

उत्तर प्रदेश का जमीनी परिदृश्य और कांग्रेस की भूमिका

हरे राम मिश्र बता रहे हैं कि मुलायम सिंह यादव की सक्रियता में सपा चाहकर भी भाजपा के खिलाफ नहीं जाएगीअखिलेश के पास सात प्रतिशत यादव वोट छोड़कर ओबीसी की अन्य जातियों का कोई वोट नहीं रह गया है

 लोकसभा के चुनाव में अब जबकि पांच माह से भी कम का वक्त बचा है, राजनैतिक विश्लेषक इस बात को लेकर कयास लगा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में राजनैतिक समीकरण क्या होंगे? महागठबंधन की क्षीण होती संभावनाओं के बीच, आखिर यह राज्य किसे गले लगाएगा और किसे कूड़ेदान के सुपुर्द करेगा इस पर चर्चा होने लगी है। प्रश्न यह है कि क्या भाजपा अपने पिछले ऐतिहासिक प्रदर्शन को दोहरा पाएगी या राज्य में अपनी सरकार होते हुए उसे मुश्किल हालात से जूझना होगा।

गौरतलब है कि भाजपा खुद पर लगे आरोपों पर जवाब की जगह विपक्ष पर आक्रामक सवालों से हमला कर रही है। वह मोदी सरकार पर उठे किसी सवाल के प्रतिउत्तर में कांग्रेस को घेरने में बहुत आक्रामक तरीके अपना रही है। उसकी आक्रामकता भी उग्र हिन्दुत्व के दर्शन के दायरे में है। इस तरह भाजपा यह प्रदर्शित कर रही है कि आगामी चुनाव में वह अपनी पूरी राजनीति हिन्दुत्व केन्द्रित रखेगी और चुनाव को लेकर उसका आत्मविश्वास बहुत मजबूत है। ऐसी स्थिति में संसद में सबसे ज्यादा प्रतिनिधि भेजने वाले राज्य उत्तर प्रदेश से उसे बड़ी अपेक्षाएं भी हैं।

वैसे, उत्तर प्रदेश में अगर हम भाजपा के लिए हालात की बात करें तो उसके जमीनी कार्यकर्ता नरेन्द्र मोदी सरकार की उपलब्धियों के सवाल पर आम जनता के बीच बहुत ज्यादा ’डिफेंसिव’ नजर आ रहे हैं। उनकी हीन भावना इसलिए भी बहुत बढ़ गई है क्योंकि योगी सरकार में ’ठाकुर’ जाति को छोड़कर किसी को भी पार्टी के भीतर उचित सम्मान का संकट है। इस असंतोष के बावजूद ’हिन्दू’ गौरव की खातिर कार्यकर्ता काम कर रहे हैं। आवाम के बीच, जब उनसे मोदी सरकार की उपलब्धियां पूछी जाती हैं वह तपाक से कहते हैं कि अभी मोदी जी रात दिन जगकर कांग्रेस के ’कुकर्म’ धो रहे हैं। यह काम नहीं रुके इसलिए ’हिन्दू’ स्वाभिमान की खातिर अभी मोदी जी को फिर ’दिल्ली’ पहुंचाना बहुत जरूरी है। यही नहीं संघ के जमीनी कार्यकर्ता भी सक्रिय हैं और इन सवालों पर केवल यह तर्क देते हैं कि नरेन्द्र मोदी को सत्ता में रखना हिन्दुत्व और हिन्दू आत्मसम्मान को जगाने के लिए के लिए बहुत जरूरी है। मोदी जी हिन्दू राष्ट्र की दिशा में काम कर रहे हैं और राम राज्य आने में थोड़ा समय लगेगा।

लेकिन, कार्यकर्ताओं के इन आत्म संतोषी प्रचारों के बीच कार्यकर्ता इस बात सहमत हैं कि मोदी सरकार को लेकर लोगों में ’निराशा’ है। एससी/एसटी एक्ट का मूल स्वरूप बहाल करने को लेकर सवर्णों के गुस्से को संघ काउंटर करने में लगा है। मैंने खुद संघ के स्वयंसेवकों को सवर्णों के बीच इस एक्ट के खिलाफ उपजे गुस्से पर बात करते और उन्हें समझाते देखा है।

हालांकि, प्रदेश की योगी सरकार भी आम जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाई। चाहे वह प्रशासन में पारदर्शिता का मामला हो या फिर रोजगार और सरकारी परीक्षाओं में शुचिता का सवाल। सरकार पर कई गंभीर सवाल उठे हैं और उनके ’जिम्मेदार’ जवाब नहीं मिले। ऐसी स्थिति में भाजपा के लिए भी उत्तर प्रदेश में राहें बहुत आसान नहीं हैं। संघ इस बात को भांप गया है।

अब सवाल उठता है कि क्या प्रदेश की आवाम को कोई ऐसा विकल्प मिल पाएगा जो भाजपा से मतदाताओं की इस इस नाराजगी को संगठित करके वोट में तब्दील कर पाए? हालात इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि ऐसा कुछ हो पाना ’टेढ़ी खीर’ है। क्योंकि वर्तमान हालात में भाजपा विरोधी दलों का ’महागठबंधन’ एक दिवा स्वप्न दिखाई देने लगा है।

अगर उत्तर प्रदेश में सभी दल अकेले ही लड़े तब क्या होगा? राज्य में विपक्षी समाजवादी पार्टी में जिस तरह से गृहयुद्ध चल रहा है उसमें शिवपाल यादव ने अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। हालात ऐसे है किं अखिलेश यादव अभी मानसिक रूप से इस चुनाव के लिए तैयार नहीं हैं। मुलायम सिंह यादव का फिर से सक्रिय होना ’महागठबंधन’ की संभावना को ’खत्म’ भले कर दे, सपा को कोई लाभ नहीं पहुंचाएगा। पिछले अनुभव बताते हैं कि मुलायम सिंह यादव की सक्रियता में सपा चाहकर भी भाजपा के खिलाफ नहीं जाएगीअखिलेश के पास सात प्रतिशत यादव वोट छोड़कर ओबीसी की अन्य जातियों का कोई वोट नहीं रह गया है। सामाजिक न्याय की जातिगत पहिचान और हिन्दुत्व केन्द्रित अस्मितावादी राजनीति ने इतनी सफाई से अपने पैर पिछड़ों के बीच मजबूत किए हैं कि अखिलेश यादव के पास इससे मुकाबले का कोई विकल्प ही नहीं रह गया है।

इधर, मायावती की हालत और खराब है। उनका जनाधार तेजी से सिकुड़ा है। अब वह केवल और केवल जाटवों और पूर्वांचल के चमारों की नेता रह गई हैं। उन पर भी कई मामले हैं। महागठबंधन को लेकर उनका हालिया बयान दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ना ही बसपा के लिए ’एकल’ विकल्प है।

ऐसे में कांग्रेस के नेतृत्व में महागठबंधन के लिए अगर कोई स्पेस बचता है तो वह लोकदल के अजीत सिंह और पीस पार्टी जैसे बेहद सीमित जनाधार वाली कुछ पार्टियों के साथ ही बचता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हालात यह बताते हैं कि अब वह जाटों के निर्विवाद नेता नहीं रह गए हैं। संजीव बालियान और टिकैत बंधुओं के उभार ने अजीत सिंह की राजनैतिक स्थिति को दयनीय कर दिया है। भाजपा ने स्थानीय जाट नेताओं की एक मजबूत टीम भी तैयार की है जो अजीत सिंह को चुनौती दे रहे हैं। मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगों के बाद जाट-मुस्लिम एकता का सामाजिक तानाबाना खत्म हो गया है। इस दंगे ने स्थानीय समाज में अविश्वास के जो बीज बोए थे उसके दंश वहां की राजनीति में आज भी देखे जा सकते हैं।

हालांकि, कांग्रेस के पास उसके अपने परंपरागत वोट आज भी हैं। लेकिन वह उसके पास तभी रहेंगे जब वह जिताऊ प्रत्याशी दे। लेकिन कांग्रेस की प्रमुख समस्या यह है कि प्रदेश में उसका संगठन ही मर गया है जिससे वह अपने परंपरागत वोट को बूथ तक नहीं ला पाएगी। वर्तमान हालात इतने अनुकूल नहीं दिखते कि इतनी जल्दी संगठन को जमीन पर फिर से जीवित किया जा सके।

इस पूरे विमर्श में केवल मुसलमान ही ऐसे वोटर हैं जो कि अब तक अछूत दिख रहे हैं। चाहे वह अखिलेश यादव हों या मायावती, कोई भी उनके बारे में बोलने से परहेज कर रहा है। कांग्रेस उन पर ध्यान दे सकती है। लेकिन उग्र हिन्दुत्व केन्द्रित चुनाव में यह भी एक ’रिस्क’ जैसा होगा।

सवाल यह है कि आखिर विकल्प क्या बचता है? मेरी समझ में कांग्रेस को छोटे-छोटे और सीमित प्रसार वाले दलों से सहयोग पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। उन्हें अपने साथ एक प्लेटफार्म पर लाना चाहिए। इसके साथ ही साथ ओबीसी में गैर यादव और दलितों के गैर जाटव और पूर्वांचल के चमारों को छोड़कर बाकी दलित जातियों के बीच सरकार के आवाम विरोधी कार्यों को आक्रामकता से सामने रखना चाहिए। इसके साथ ही साथ उत्तर प्रदेश की सत्रह फीसदी आबादी मुसलमानों की है। मेरी राय में उनके साथ कांग्रेस को खड़ा होना चाहिए। अगर मुसलमान कांग्रेस की तरफ एकमुश्त लौटता है तब उसे काफी राहत होगी। लेकिन इसके ’जोखिम’ भी उठाने होंगे।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश के जमीनी हालात ऐसे हैं कि यहां भाजपा के लिए भी कोई तैयार थाली नहीं रखी  है। ऐसी स्थिति में विपक्ष को मेहनत करना पड़ेगा। कांग्रेस को छोटे दलों के साथ साथ विपक्ष की एकजुटता के प्रयास गंभीरता से करने होंगे तभी उत्तर प्रदेश में वह कुछ कर पाने की स्थिति में होगी।

हरे राम मिश्र

(स्वतंत्र पत्रकार)

ज़रा हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

<iframe width="570" height="321" src="https://www.youtube.com/embed/RUwQQksa_jA" frameborder="0" allow="autoplay; encrypted-media" allowfullscreen></iframe>

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: