गिद्ध की नजर हमेशा मरघट पर गढ़ी रहती है – अच्छे दिनों के वादे से बड़ा झूठ मुसलमानों की जनसंख्या में वृद्धि

जनसंख्या की राजनीति : फिलहाल तथ्य और कुछ सवाल प्रबीर गंगोपाध्याय अनुवादःपलाश विश्वास दूसरा भाग धार्मिक जनसमुदाय आधारित जनगणना के फिलहाल के आंकड़े अपने जन्म के समय से ही संघ परिवार मुसलमानों की जनसंख्या में वृद्धि के आतंक का लगातार प्रचार कर रहा है। 1980-90 के दशक में यह प्रचार चरम पर था। कहा गया …
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जनसंख्या की राजनीति : फिलहाल तथ्य और कुछ सवाल

प्रबीर गंगोपाध्याय

अनुवादःपलाश विश्वास

दूसरा भाग

धार्मिक जनसमुदाय आधारित जनगणना के फिलहाल के आंकड़े

अपने जन्म के समय से ही संघ परिवार मुसलमानों की जनसंख्या में वृद्धि के आतंक का लगातार प्रचार कर रहा है।

1980-90 के दशक में यह प्रचार चरम पर था। कहा गया कि सन् 2000 तक मुसलमानों की जनसंख्या हिंदुओं से ज्यादा हो जायेगी। उनकी यह अजब देववाणी सच नहीं साबित हुई। सच न होना ही स्वाभाविक है।

इस पुस्तक के पहले भाग में हमने उस वक्त पर फोकस किया था। नाक कान की फजीहत के बावजूद संघ परिवार लेकिन उस उद्भट प्रचार से पीछे नहीं हटा है। गुजरात में वीभत्स नरसंहार हो जाने के बाद तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री और आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2002 में मुस्लिम समाज पर व्यंग्य कसते हुए कहा थाः हम पांच, हमारे पच्चीस। यहीं न रुककर उन्होंने मुसलमान शरणार्थी शिविर को `संतान उत्पादन का कारखाना’  कहकर भी व्यंग्य किया था।

इसलिए इस समय जनसंख्या का हालचाल कैसा है, वह भली भांति जान लेना जरूरी है।

पहले भाग में 1981 तक की जनगणनाओं के तथ्य दिये गये हैं। सारणी -2 में। यहां 1991 से 2011 तक के तथ्य दिये जा रहे हैं।

पहले भाग में हमने देखा है कि पिछले तेरह सौ साल के दौरान अखंड भारत में मुसलमानों की जनसंख्या सबसे ज्यादा 1941 में (जेएम दत्त के मुताबिक 23.81 प्रतिशत, किंग्सले डेविस के मुताबिक 28.28 प्रतिशत) बढ़ी थी।

बहुत लोगों का मानना है कि पाकिस्तान का औचित्य साबित करने के लिए 1941में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ा चढ़कर पेश की गयी थी। फिर विभाजन के बाद भारत में मुस्लिम जनसंख्या मोटे तौर पर 9-12 प्रतिशत बनी रही। जहां हिंदुओं की जनसंख्या 80 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है।

2011 में पहली बार हिंदुओं की जनसंख्या 80 फीसद से कम हो गयी। यह कमी सिर्फ 0.2 प्रतिशत की है। दूसरी तरफ मुसलमानों की जनसंख्या 12 प्रतिशत से बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गयी। इस दौरान हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर जहां 16.76 रही है, वहीं मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर 24.6 प्रतिशत हो गयी। इसी को लेकर हंगामा बरपा है।

जनसंख्या वृद्धि दर की पहेली को सुलझाने के मकसद से हमने पहले भाग में विस्तार से चर्चा की है। दूसरे भाग में वृद्धि दर के कुछ और पहलुओं पर चर्चा की जायेगी। लेकिन हकीकत अब भी यही है कि कुल जनसंख्या में अब भी हिंदू 96.63 करोड़ हैं और मुसलमान 17.22 करोड़। यह फर्क 79.41 करोड़ का है। जनसंख्या तत्व के किस विचार से करीब यह 80 करोड़ का फर्क रातोंरात खत्म होने वाला है?

यदि मान भी ले कि यह फर्क खत्म हो सकता है,तो कितने दिनों में ,कितने युगों में,कितनी सदियों में, क्या इसका कोई तर्कसंगत हिसाब किताब हिंदुत्व के झंडेवरदार आरएसएस- भाजपा-विहिप के पास है ?

बहरहाल अमिताभ गुप्त ने एक हिसाब जोड़ा है। हालांकि उनके इस हिसाब पर भी कई सवाल उठाये जा सकते हैं।

यह हिसाब इस तरह का है कि पिछले दस साल के दौरान हिंदुओं की जनसंख्या की सालाना वृद्धि दर 1.56 और मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर सालाना 2.2 है। `इसी अनुपात में वृद्धि दर अगर अपरिवर्तित रहे तो जनसंख्या में हिंदुओं से ज्यादा होने के लिए मुसलमानों को कितने साल लगेंगे, क्या मोहन भागवत और उनके साथी जानते हैं ?

गणित के हिसाब से 200 साल से ज्यादा। सन् 2220 में क्या होगा, यह गप्प बेचकर 2015 का चुनाव जीतने की यह इच्छा, लेकिन अच्छे दिनों के वादे से बड़ा झूठ है।’ (29)

सारणी-15 (28)

धार्मिक समुदाय अनुसार भारत की जनसंख्या(संख्या करोड़ में)

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धार्मिक             1961**                1971              1981@             1991***             2001                2011 

जनसमुदाय   संख्या   कुल जन.  संख्या   कुल जन.  संख्या  कुल जन.    संख्या   कुल जन.    संख्या  कुल जन.      संख्या   कुल जन.

                         प्रतिशत               प्रतिशत               प्रतिशत                प्रतिशत                  प्रतिशत                   प्रतिशत

——————————————————————————————————————————————————हिंदू           36.65      83.5       45.34     82.7      54.97    82.6       67.26    82.4       82.75     80.5        96.3       79.8

मुसलमान    4.69    10.07         6.14     11.2       7.56     11.4          9.52    11.7       13.8       13.4      17.22       14.2

ईसाई          1.07       2.4          1.43       2.6      1.62       2.4          1.89      2.3         2.4         2.3        2.78         2.3

सिख          0.78       1.8          1.04       1.9       1.31       2.0          1.63      2.0       1.90        1.9         2.08        1.7

बौद्ध           0.32        0.7         0.39       0.7       0.47       0.7          0.63      0.8         0.8         0.8         0.84        0.7

जैन             0.2        0.5         0.26       0.5       0.32       0.5          0.34      0.4       0.42         0.4         0.45        0.4

अन्य*         0.16        0.4         0.22       0.4       0.28       0.4          0.35      0.4       0.66         0.6         0.79        0.7

धर्म बताया

नहीं            –             –              –           –           –             –                –          –          0.07         0.1           –            –

कुल          43.87     100       54.82     100        66.53     100        81.62     100    102.8        100      121.09     100

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* ऐसे लोग जिन्हें किसी धर्म समुदाय के अंतर्गत शामिल नहीं किया जा सका।

**मिजो जिला को छोड़कर,जो अब मिजोरम में शामिल है।

***असम और जम्मू को कश्मीर को छोड़कर

@ 1961 के आंकड़ों में असम को जोड़ा नहीं गया है।

                इस सारणी में एक और अस्वाभाविक तथ्य नजर आता है। 1991 में जहां मुसलमान 9.52 करोड़ ( कुल जनसंख्या के 11.7 प्रतिशत) थे, वहीं 2001 में अचानक वे बढ़कर 1.38 करोड़ (कुल जनसंख्या के 13.4 प्रतिशत) हो गये।

उस वक्त इसे लेकर भी तोगाड़िया समूह नें खूब शोरगुल मचाया था कि मुसलमान इस तरह छलांग-छलांग कर आगे निकल रहे हैं तो हमारा क्या होगा। उन लोगों ने जनगणना के आंकड़ों को ध्यान से नहीं देखा।

1991 में मुसलमान बहुल जम्मू व कश्मीर में अशांत परिस्थितियों की वजह से जनगणना नहीं हुई थी। इसी वजह से 2001 की जनगणना में मुसलमानों की यह आकस्मिक वृद्धि नजर आयी।

यहां एक और बात कहने को है।

 यह हैरतअंगेज है कि जनगणना के इन तथ्यों को प्रकाशित करते हुए सरकार ने जात पांत के आधार पर आदमशुमारी के तथ्य गुप्त रख दिये।

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने फ्रंटलाइन से कहाः विभिन्न राजनैतिक दल और समाज सेवी संस्थाओं की तरफ से बार-बार मांग करने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी सूरत में जात पांत आधारित तथ्यों को प्रकाशित नहीं कर रहे हैं। यकीनी तौर पर इसके पीछे तयशुदा कोई मकसद है। इस आदमशुमारी में दूसरे पिछड़े वर्ग (ओबीसी) और अनुसूचित जातियों (दलितों) की संख्या में अच्छी खासी वृद्धि दर्ज की गयी है, इस बारे में हमारे पास निश्चित सूचना है।(30)

ये तथ्य गोपनीय रखने के दो कारण हैं।

पहला यह कि इन समूहों को हिंदुओं में शामिल कर लिया गया है और इसीलिए इनकी वृद्धि दिखाने पर निंदुक लोग कह सकते हैं कि तुम्हारी वृद्धि दर भी मुसलमानों से कुछ कम नहीं है।

दूसरा कारण यह है कि ओबीसी और एससी की संख्या बढ़ने पर उनके लिए तय आरक्षण का कोटा भी बढ़ाना होगा। ऐसा काम नस्लवादी मोदी कर बी कैसे सकते हैं?

गिद्ध की नजर हमेशा मरघट पर गढ़ी रहती है।

इसलिए 2011 की जनगणना की अच्छाइयों की तरफ आरएसएस-भाजपा-विहिप समूह की नजर ही नहीं गयी। मसलनः

1. जितनी उम्मीद थी, उससे कहीं तेज दर पर भारत की जनसंख्या वृद्धि घटने लगी है।

2. इस जनसंख्या में वृद्धि में कमी की दर हिंदुओं (3.5 प्रतिशत ) की तुलना में मुसलमानों में (4.9 प्रतिशत) ज्यादा है।

3. भारत में सबसे घनी आबादी वाले राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में दूसरे राज्यों की तुलना में जनसंख्या में वृद्धि की दर ज्यादा घटी है।

4. पिछले दशक में भारत में नारी पुरुष का अनुपात बेहतर हुआ है।

5. हिंदुओं के मामले में नारी पुरुष अनुपात में मामूली सुधार हुआ है तो मुसलमान नारी पुरुष अनुपात बहुत बेहतर हुआ है, जो खासतौर पर गौरतलब है।

जनसंख्या वृद्धि दर की पहेली

इस पुस्तक के पहले भाग में वद्धि दर के बारे में हमने जो चर्चा की थी,वह 2011 की जनगणना के लिए भी बराबर सच है। 2011 की जनगणना में खास तौर पर जो मसला हमारी नजर में आता है,वह यह है कि हिंदुओं और मुसलमानों की वृद्धि दर में फर्क क्रमशःघटने लगा है।हालांकि अब भी मुसलमानों की वृद्धिदर हिंदुओं के मुकाबले ज्यादा है।

मुसलमानों की वृद्धि दर के बारे में दो दो एक बातें और कही जा सकती हैं।

मुसलमानों में गर्भधारण दर (fertility rate) तुलना में ज्यादा है। हिंदुओं में शिशु मृत्यु दर ज्यादा है। (क्या भ्रूण हत्या की प्रथा की वजह से?) इसके अलावा मुसलमानों की औसत आयुष्काल ज्यादा है। जनतत्वविदों का यह मानना है।

इसके बावजूद धार्मिक समुदायों पर आधारित तत्वों को बारीकी से देखें तो यह नजर आयेगा कि मु्सलिम या किसी भी धार्मिक समुदाय की संख्या घटना या बढ़ना किसी `धर्मोन्माद’ के तहत अनगिनत बच्चे पैदा करने पर निर्भर नही होता, बल्कि यह निर्भर करता है इन बातों पर- परिव्राजन 9 एक जगह से दूसरी जगह चले जाना), सबसे बेहतर सेहत का रख रखाव ( खासतौर पर प्रजनन स्वास्थ्य की देखभाल) के इंतजाम रिहाइशी इलाके के आस पास होना, जैसे सामाजिक आर्थिक सूचकों पर।जनतत्वविदों ने ख्याल किया है कि एक राज्य से दूसरे राज्य, यहां तक कि एक जिले से दूसरे जिले में भारी पैमाने पर लोगों के आवागमन की वजह से प्रजनन संबंधी आचरण ( संतान उत्पत्ति) की खासियत पर असर पड़ता है।

पूर्ण गर्भधारण दर (Total fertility rate)

यह बात थोड़ी अजीबोगरीब है। इसका मायने यह हुआ कि कोई नारी जिस समयकाल तक संतान उत्पत्ति के लिए सक्षम रहती है, उस अवधि में वह औसतन कितने बच्चे पैदा कर सकती है। इस पर थोड़ी चर्चा करें तो हिंदुत्व के प्रवक्ताओं के लिए शायद जुबान खोलना मुश्किल हो जाये।

जनगणना रपट में देखा जा रहा है कि देश में पूर्ण गर्भधारण दर या टीएफआर तेजी से घट रहा है। 2013 में टीएफआर का राष्ट्रीय औसत प्रति नारी 2.3 हो गयी है।

कुछ राज्यों में राज्यवार टीएफआर का हिसाब कुछ इस तरह हैः पश्चिम बंगाल-1.6, बिहार-3.4, ग्रामीण हिमाचल प्रदेश, पंजाब और तमिलनाडु-1.7, ग्रामीण बिहार में टीएफआर जहां 3.5 है वहीं शहरी हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 1.2 है, शहरी बिहार और उत्तर प्रदेश में 2.5 है- जो राष्ट्रीय औसत से मामूली तौर पर ज्यादा है।

जहां धर्म, वर्ण, जाति निर्विशेष इस देश में कोई नारी सबसे ज्यादा साढ़े तीन बच्चे पैदा कर सकती है तो वहीं मुसलमान औरतें अनगिनत बच्चे पैदा करके देश को बाढ़ में बहा देंगी – ऐसे अद्भुत आतंक अफवाह पर कौन विवेकशील लोग ध्यान देंगे?

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