Home » समाचार » प्रगतिशील लेखक और कथित बुद्धिजीवी किसी काम के नहीं

प्रगतिशील लेखक और कथित बुद्धिजीवी किसी काम के नहीं

 

 

अभिषेक श्रीवास्तव

तीन दिन पहले जब चुनाव के नतीजे आ रहे थे, तो कुछ लोगों ने धूमिल की एक पंक्ति उठाकर यहां चेप दी थी- ''भाषा में भदेस हूँ / इस कदर कायर हूँ कि उत्‍तर प्रदेश हूँ।'' इसमें कुछ प्रगतिशील कहे जाने वाले कवि और लेखक भी शामिल थे।

मैंने देखा कि 2012 में जब समाजवादी पार्टी की सरकार आई थी, उस वक्‍त भी कुछ लोगों ने हूबहू यही पंक्ति प्रतिक्रिया में डाली थी। फिर पाया कि एकाध जघन्‍य घटनाओं के सिलसिले में कुछ बड़े संपादकों ने भी अतीत में इसी पंक्ति का इस्‍तेमाल किया है। गूगल करिए, इस पंक्ति के तमाम इंद्रधनुषी प्रयोग दिख जाएंगे।

उत्‍तर प्रदेश की जनता के जनादेश पर उसे कायर कहने का मतलब क्‍या है?

धूमिल का संदर्भ चाहे जो रहा हो, मैं पूछना चाहूंगा कि आप चुनावी नतीजे के संदर्भ में इस पंक्ति का इस्‍तेमाल कर के क्‍या जताना चाह रहे थे?

वास्‍तव में, यूपी से जुड़ी किसी भी घटना पर इस सूबे को कायर कहने का क्‍या औचित्‍य है?

राज्‍य का मतलब राज्‍य की जनता/नागरिक से होता है। आपने राज्‍य को कायर कहा तो आप सीधे नागरिकों को कायर ठहरा रहे हैं।

नागरिक को एक बार कायर कह देने पर आप क्‍या उम्‍मीद करते हैं कि वह आपके विचार के हिसाब से अपना पक्ष चुनेगा?

आज हम जिस स्थिति में पहुंचे हैं, उसमें बड़ा दोष इस किस्‍म की 'प्रगतिशील' जुमलेबाज़ी का है। आपने जनता से जुड़ने की कोई कोशिश नहीं की। उसके फैसले पर उसे कायर कहते रहे। जब चुनाव आया तो भ्रम पाल लिया कि वह अपनी अंतरात्‍मा की आवाज़ पर आपके साथ आएगी। रस्‍मी तौर पर आपने पत्र जारी कर के अपील कर दी कि फलाना ताकतों को वोट मत देना। किसे वोट देना, यह खुद आप नहीं जानते।

कल एक सीनियर पत्रकार से होली मिलन के बहाने कुछ बातें छिड़ी थीं। वे एक दिलचस्‍प बात कह रहे थे कि खुद को प्रगतिशील कहने वाले लोगों में केवल लिखने वाले ही क्‍यों बचे हैं। काडर कहां गया?

कल ही एक जुझारू वामपंथी नेता से फोन पर बात हुई। कह रहे थे कि तीन साल तक दिल्‍ली में सबने उकसाया कि चुनाव लड़ो और विकल्‍प बनाओ लेकिन चंदा एक ने भी नहीं दिया। उनका मानना था कि ये प्रगतिशील लेखक और कथित बुद्धिजीवी वास्‍तव में किसी काम के नहीं हैं। इन्‍हें चुनावी राजनीति का ककहरा तक समझ में नहीं आता और ज़रा सी आहट होने पर फासीवाद-फासीवाद चिल्‍लाने लग जाते हैं।

लू शुन की एक कहानी इस संदर्भ में याद आती है जो कहीं बुद्धिजीवियों के संदर्भ में सुनी थी। एक कलाकार ड्रैगन की खूबसूरत तस्‍वीरें बनाता था। ड्रैगन को पता चला कि उसकी तस्‍वीरें बनाने वाला एक कलाकार मौजूद है, तो वह मिलने उसके घर चला आया। दरवाजा खटखटाया। कलाकार ने दरवाज़ा खोला। सामने ड्रैगन को देखकर बेहोश होकर गिर पड़ा। ऐसी बौद्धिकता क्‍या खाकर असहमतियों के साथ खड़ी होगी?

मुझे वाकई लेफ्ट लिबरल की लिबिर-लिबिर से बहुत कोफ्त हो रही है।

 

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: