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नेहरू का पत्नी प्रेम… कमला को बेइंतिहा प्यार करते थे पं. नेहरू

जगदीश्वर चतुर्वेदी

व्यक्तित्व मूल्यांकन का आधार नैतिकता नहीं, नजरिया होना चाहिए।व्यक्ति के नजरिए और निजी जीवनशैली को जोड़कर देखना चाहिए। भारतीय परंपरा में नजरिए की उपेक्षा करके नैतिकता के आधार पर हमेशा सामंती और फासिस्ट ताकतें हमले करती रही हैं। ये ताकतें नेहरू को भी ऩिशाना बनाती रही हैं। नेहरू की आलोचना का कोई मुद्दा नहीं मिलता तो ये नैतिकता के ठेकेदार उनके निजी जीवन के मसलों पर हमले आरंभ कर देते हैं। हमारे यहाँ फेसबुक से लेकर तमाम किस्म के किताबी संस्मरणों तक नेहरूजी की निजी जिंदगी के पहलुओं के विकृतिकरण की खूब कोशिशें होती रही हैं।

नेहरू जैसे बड़े व्यक्तित्व को देखने समझने के लिए अभी हमारे देश में खुलकर विमर्श करने की जरूरत है।

नेहरू के निजी पहलुओं को नेहरू के नजरिए के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। मुश्किल यह है कि नेहरू पर हमले करने वाले, पहलु नेहरू का चुनते हैं, और नजरिया अपना जोड़ देते हैं, और इस तरह वे नेहरू की 'कलंकगाथा' निर्मित करते हैं।

नेहरू के व्यक्तित्व और आचरण से हम आधुनिक मूल्यों और मानवतावादी नजरिए को लेकर बहुत कुछ सीख सकते हैं। इस प्रसंग में पहली शर्त है कि व्यक्ति के रुप में नेहरू के निजी विषयों पर लिखे- कहे पर विश्वास करें।

नेहरू का समूचा व्यक्तित्व आधुनिक था, इसकी खूबी थी अन्य के जीवन में हस्तक्षेप न करना, अन्य का सम्मान करना और अन्य को समानता के नजरिए से देखना। आधुनिक होने की ये पूर्व शर्तें हैं।

हम लोगों में मुश्किल यह है कि हमने आधुनिकता का अर्थ नए कपड़े, नए हाव-भाव, नए किस्म का घर, नया फर्नीचर, नई गाड़ी, नया घर मान लिया। आधुनिक होने का ये चीजें प्रमाण नहीं हैं। आधुनिक होने के लिए आधुनिक नजरिए का होना बेहद जरूरी है।

नेहरू इस अर्थ में आधुनिक थे कि उनके पास आलोचनात्मक विवेक था, विज्ञान और न्याय की कसौटी या वैज्ञानिक कसौटी पर चीजों, वस्तुओं, विचारों और व्यक्तियों के आचरण को वे परखकर देखते थे। उन्होंने स्वयं को वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतारने की भरसक कोशिश की।

आधुनिक होने का अर्थ पुराने का विरोधी नहीं है, आधुनिक होने का अर्थ है विज्ञान और न्यायसम्मत नजरिए से लैस होना। अपने समूचे आचरण को विज्ञान और न्यायसम्मत बनाना। अन्य का सम्मान करना, मानवाधिकारों का सम्मान करना, उनको मानना। इस नजरिए से नेहरू के अपनी पत्नी के साथ संबंधों को ध्यान से देखें तो बेहतर होगा।

पंडित नेहरू अपनी पत्नी को बेहद प्यार करते थे और उस प्यार से उनको शक्ति मिलती थी।

हिन्दी में जो लेखक-आलोचक इन दिनों आत्मकथाओं के नाम पर अल्लम-गल्लम लिख रहे हैं वे नेहरू के आत्मकथा लेखन से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

नेहरू ने कमला के बारे में लिखा है

'' कुछ थोड़ी सी तालीम के अलावा उसे कायदे से शिक्षा नहीं मिली थी। उसका दिमाग शिक्षा की पगडंडियों में से होकर नहीं गुजरा था। हमारे यहां वह एक भोली लड़की तरह आई और जाहिरा उसमें कोई ऐसी जटिलताएं नहीं थीं, जो आजकल आमतौर से मिलती हैं। चेहरा तो उसका लड़कियों– जैसा बराबर बना रहा, लेकिन जब वह सयानी होकर औरत हुई, तब उसकी आंखों में एक गहराई, एक ज्योति, आ गई और यह इस बात की सूचक थी कि इन शांत सरोवरों के पीछे तूफ़ान चल रहा है। वह नई रोशनी की लड़कियों –जैसी न थी, न तो उसमें वे आदतें थीं, वह चंचल थी। फिर भी नए तरीकों में वह आसानी से घुल-मिल जाती थी। दर-असल वह एक हिंदुस्तानी और खासतौर पर कश्मीरी लड़की थी- चैतन्य और गर्वीली, बच्चों-जैसी और बड़ों –जैसी, बेवकूफ़ और चतुर। अजनबी,लोगों से और उनसे, जिन्हें वह पसंद नहीं करती थी, वह संकोच करती थी; लेकिन जिन्हें वह जानती और पसंद करती थी, उनसे वह जी खोलकर मिलती और उनके सामने उसकी खुशी फूटी पड़ती थी। चाहे जो शख्स हो उसके बारे में झट से अपनी राय कायम कर लेती। यह राय उसकी हमेशा सही न होती, और न इन्साफ़ की नींव पर बनी होती, लेकिन अपनी इस सहज पसंद या विरोध पर वह दृढ़ रहती। उसमें कपट नाम को न था। अगर वह किसी व्यक्ति को नापसंद करती और यह बात जाहिर हो जाती, तो वह उसे छिपाने की कोशिश न करती। कोशिश भी करती तो शायद वह उसमें कामयाब न होती। मुझे ऐसे इन्सान कम मिले हैं. जिन्होंने मुझ पर अपनी साफ-दिली का वैसा प्रभाव डाला हो, जैसा उसने डाला था।'' (हिदुस्तान की कहानी,पृ.49-50)

इस समूचे उद्धरण में जो चीज समझने की है वह ध्यान में रखें तो आत्मकथाओं के बारे में, उनमें आए चरित्रों के बारे में सही नजरिया बना सकते हैं। मसलन् , आत्मकथा में देखें कि चरित्रों की राय ''इन्साफ़ की नींव पर'' आधारित है या नहीं ? व्यक्तित्व की आंतरिक बुनाबट किस तरह की है उसमें छल और निष्कपट भावबोध की क्या भूमिका है ?

नेहरू के इस बयान से एक बात और साफ होती है कि कमला को वे बेइंतिहा प्यार करते थे। इस प्यार की अभिव्यक्ति में वे अपने मन की उन तमाम बातों को स्पष्ट ढ़ंग से कहते हैं जो वे कमला के बारे में महसूस करते थे। उन्होंने आत्मालोचना करते हुए लिखा , '' मैंने अपने ब्याह के शुरू के सालों का ख़याल किया, जबकि बावजूद इस बात के कि मैं उसे हद से ज्यादा चाहता था, मैं करीब-करीब उसे भूल गया था, और उसे उस संग से वंचित रखता था,जिसका उसे हक़ था, क्योंकि उस वक्त उस मक़सद को पूरा करने में लगा रहता था,जिसे मैंने अपनाया था। ''

आगे लिखा

'' जब-जब और धंधों से निपटकर उसके पास आता, तो मुझे ऐसा अनुभव होता कि किसी सुरक्षित बंदरगाह में पहुँच गया हूँ। अगर घर से कई दिनों के लिए बाहर रहता, तो उसका ध्यान करके मेरे मन को शांति मिलती और मैं बेचैनी के साथ घर लौटने की राह देखता। अगर वह मुझे ढ़ाढ़स और साहस देने के लिए न होती और मेरे थके मन और शरीर को नया जीवन न देती रहती,तो भला मैं कर ही क्या पाता ? '' नेहरू के इन शब्दों में साफ कहा कि

''मैं उसे हद से ज्यादा चाहता था''।

कमला के व्यक्तित्व के बारे में नेहरू ने लिखा

''वह जो कुछ मुझे दे सकती थी, उसे मैंने उससे ले लिया था। इसके बदले में इन शुरू के दिनों में मैंने उसे क्या दिया ? जाहिरा तौर पर मैं नाकामयाब रहा, और मुमकिन है कि उन दिनों की गहरी छाप उस पर हमेशा बनी रही हो। वह इतनी गर्वीली और संवेदनशील थी कि मुझसे मदद मांगना नहीं चाहती थी, अगरचे जो मदद मैं उसे दे सकता था, वह दूसरा नहीं दे सकता था। वह राष्ट्रीय लड़ाई में अपना अलग हिस्सा लेना चाहती थी; महज़ दूसरे के आसरे रहकर या अपने पति की परछाईं बनकर वह नहीं रहना चाहती थी। वह चाहती थी कि दुनिया की निगाहों में ही नहीं, बल्कि अपनी निगाहों में वह खरी उतरे।''

नेहरू ने रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाटक की चित्रा को उद्धृत करते हुए लिखा

''मैं चित्रा हूँ,देवी नहीं हूँ कि मेरी पूजा की जाय। अगर तुम खतरे और साहस के रास्ते में मुझे अपने साथ रखना मंज़ूर करते हो, अगर तुम अपनी जिन्दगी के बड़े कामों में मुझे हिस्सा लेने की इजाजत देते हो, तो तुम मेरी असली आत्मा को पहचानोगे।''

नेहरू जी ने लिखा यह बात कमला ने ''शब्दों में नहीं कही, धीरे-धीरे यह संदेश मैं उसकी आंखों में पढ़ पाया।''

नेहरूजी का कमला के बारे में मानना था

''मेरे लिए वह हिन्दुस्तान की महिलाओं, बल्कि स्त्री-मात्र, की प्रतीक बन गयी।''

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