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संघ परिवार को बंगाल की चुनौती : हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद के कट्टर विरोधी रवींद्र नाथ को निषिद्ध करके दिखाये

पलाश विश्वास

संदर्भः आज रवींद्र नाथ को प्रतिबंधित करने की चुनौती देता हुआ बांग्ला दैनिक आनंद बाजार पत्रिका में प्रकाशित सेमंती घोष का अत्यंत प्रासंगिक आलेख, जिसके मुताबिक रवींद्र नाथ का व्यक्तित्व कृतित्व संघ परिवार और उसके हिंदू राष्ट्रवाद के लिए सबसे बड़ा खतरा है।  उनके मुताबिक रवींद्रनाथ का लिखा,  कहा हर शब्द विशुद्धता के नस्ली ब्राह्मणावादी हिंदू राष्ट्रवाद के खिलाफ है।  रवींद्रनाथ ही इस अंध राष्ट्रवाद के प्रतिरोध में एक अजेय किला हैं और मोर्चा भी। जो बांग्ला पढ़ सकते हैं,  वे अवश्य ही यह आलेख पढ़ें।

Rabindranath Tagore

নিষিদ্ধ করলেন না?

সেমন্তী ঘোষস্কুল সিলেবাসের বইপত্র খুঁটিয়ে পড়ে গোলমেলে জিনিসগুলো বাদ দেওয়ার দায়িত্ব পড়েছিল বত্রা মশাই-এর উপর।  তিনি একটা পাঁচ-পাতা জোড়া লম্বা নিষেধাজ্ঞা ফিরিস্তি বানিয়ে দিয়েছেন,  মির্জা গালিব,  এম এফ হুসেন,  আকবর,  আওরঙ্গজেব,  আমির খুসরু,  কত নাম তাতে।  এই বৃহৎ ও সমৃদ্ধ লাল-তালিকাটির বেশ উপরের দিকেই ছিলেন রবি ঠাকুর।

भारतीयता और भारत की कल्पना रवींद्र नाथ की गीतांजलि के बिना असंभव है, जिसे संघ परिवार भागवत गीता के महाभारत में बदलने की कोशिश कर रहा है।

रवींद्र नाथ सिर्फ हिंदुत्व के खिलाफ ही नहीं, हिंदू राष्ट्रवाद के खिलाफ ही नहीं, राष्ट्रवाद के खिलाफ भी थे। उनका कहना था कि राष्ट्रवाद मनुष्यता का अपमान है। रवींद्र नाथ ने जब यह बात कही थी, तब हिटलर मुसोलिनी के अंध राष्ट्रवाद से पूरी दुनिया जख्मी और लहूलुहान थी। लातिन अमेरिका, यूरोप और चीन, रूस, जापान की यात्रा के दौरान बी रवींद्रनाथ लगातार इस राष्ट्रवाद के खिलाफ बोलते लिखते रहे हैं।

हम आज के संदर्भ में राष्ट्रवाद के केसरियाकरण के बाद कश्मीर,  मध्यभारत और आदिवासी भूगोल,  असम, मणिपुर, समूचे पूर्वोत्तर भारत, दार्जिलिंग,  तमिलनाडु और समूचे दक्षिण भारत के खिलाफ लामबंद राष्ट्रवादी बजरंगी सेना, साहित्य.संस्कृति और इतिहास के केसरियाकरण के संदर्भ में राष्ट्रवाद का महिमामंडित वीभत्स चेहरा देख सकते हैं। यह राष्ट्रवाद विशुद्धता का नस्ली फासिस्ट राष्ट्रवाद है जिसके तहत नागरिकों को अपनी देह, मन, मस्तिष्क, विचारों और ख्वाबों पर भी कोई अधिकार नहीं है। यह सैन्य पारमाणविक राष्ट्र की गुलाम प्रजा का राष्ट्रवाद है, जो नागरिकता और मानवाधिकार के विरुद्ध है।

यही वजह है कि जहां बंकिमचंद्र, उनके आनंद मठ और वंदेमातरम के महिमामंडन से हिंदुत्व के अश्वमेधी अभियान को सुनामी में तब्दील करने पर लगा है संघ परिवार, तो वहीं रवींद्रनाथ के रचे राष्ट्रगान में विविधता और बहुलता के जयगान के खिलाफ है बजरंगी सेना।

 

संजोगवश बांग्लादेश में भी कट्टरपंथी इस्लामी राष्ट्रवाद रवींद्रनाथ, रवींद्र रचनासमग्र,  बांग्लादेश के रवींद्र रचित राष्ट्रगान आमार सोनार बांग्ला और रवींद्रनाथ के मानवता वादी विश्वबंधुत्व के दर्शन के खिलाप संघ परिवार की तरह लामबंद है।

तब हम भाषाबंधन के संपादकीय में कृपाशकंर चौबे और अरविंद चतुर्वेद के साथ थे। महाश्वेता देवी प्रधान संपादक थीं। नवारुण दा संपादक। भारतीय भाषाओं के साहित्य के सेतुबंधन के उद्देश्य लेकर निकली इस पत्रिका के संपादक मंडल में वीरेन डंगवाल,  मंगलेश डबराल और पंकज बिष्ट जैसे लोग थे।

नवारुण दा शब्दों के आशय और प्रयोग को लेकर बेहद संवेदनशील थे। उन्होंने ही ग्लोबेलाइजेशन का अनुवाद ग्लोबीकरण बताया क्योंकि उनके नजरिये से यह वैश्वीकरण नहीं है, बल्कि वैश्वीकरण के खिलाफ मुक्तबाजार की नरसंहार संस्कृति के कारपोरेट वर्चस्व है यह।

रवींद्रनाथ की अंतरराष्ट्रीय नागरिकता के मानवतावाद को हमारे नवारुण भट्टाचार्य  हिंदुत्व के राष्ट्रवाद की जगह असल वैश्वीकरण , ग्लोबेलाइजेशन मानते थे, जो मुक्तबाजारी कारपोरेट एकाधिकार के साम्राज्यवाद के उलट है तो सैन्य राष्ट्रवाद के खिलाफ भी।

महाश्वेता दी ने भी अपनी सारी रचनाओं में इस सैन्य राष्ट्रवाद के खिलाफ आदिवासियों, किसानों और महिलाओं के जल जंगल जमीन के हक हकूक की जनांदोलनों की बात की है।

गौरतलब है कि पंडित जवाहरलाल नेहरु भी रवींद्र दर्शन के मुताबिक राष्ट्रवाद की विशुद्धता के विपरीत पंचशील के विश्वबंधुत्व, विविधता और बहुलता के पक्षधर थे, जिन्हें संघ परिवार ने भारतीय इतिहास से गांधी के साथ मिटाने का बीड़ा उठा लिया है। गांधी नेहरु चूंकि राजनीति की वजह से हाशिये पर डाले जा सकते हैं लेकिन जहां बंगाल और बांग्लादेश में हर स्त्री की दिनचर्या में रवींद्र संगीत रचा बसा है, वहां रवींद्रनाथ को मिटाना उसके बूते में नहीं है।

बंगाल के खिलाफ ताजा वर्गी हमले के प्रतिरोध में अकेले रवींद्रनाथ काफी हैं।

अस्पृश्यता के खिलाफ, सामाजिक बहिस्कार के खिलाफ, नस्ली विशुद्धता के खिलाफ बौद्धमय भारत के प्रवक्ता रवींद्रनाथ के मुताबिक भारतवर्ष हिंदुस्तान नहीं है, यह भारत तीर्थ है, जहां विश्वभर से मनुष्यता की विविध धाराओं का विलयहोकर एकाकार मनुष्यता की संस्कृति है।

रवींद्र की यह संस्कृति संघ परिवार के आनंद मठ  नस्ली राष्ट्वाद के खिलाफ है। इसलिए अंबेडकर को आत्मसात कर लेने के बावजूद रवींद्र के दलित विमर्श को आत्मसात करना संघ परिवार के लिए असंभव है।    

सेमंती घोष के मुताबिक रवींद्रनाथ की हर रचना, उनके तमाम पत्र, उनका संगीत, उनके वक्तव्य और उनका व्यक्तित्व संघ परिवार के हिंदुत्व के एजंडे के खिलाफ है। लेकिन मरे हुए रवींद्रनाथ का कम से कम बंगाल में सर्वव्यापी असर इतना प्रबल है कि संघ परिवार उन्हें प्रतिबंधित करने की हिम्मत जुटा नहीं पा रहा है।

 

नवजागरण की विरासत को समझे बिना रवींद्र साहित्य, रवींद्र दर्शन को समझना असंभव है। हिंदी के आलोचक डा.शंभूनाथ ने नवजागरण की विरासत पर महत्वपूर्ण शोध किया है, लगता है कि सरकारी खरीद के अलावा यह अत्यंत महत्वपूर्ण शोध आम हिंदी पाठकों तक नहीं पहुंचा है।

रवींद्रनाथ के पिता देवर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर ब्रह्मसमाज आंदोलन में प्रमुख थे और इस आंदोलन का केंद्र ठाकुरबाड़ी जोड़ासांको था, जो स्त्री मुक्ति आंदोलन का केंद्र भी था।  कुलीन,  सवर्ण हिंदुओं के लिए ब्रह्मसमाजी मुसलमानों,  ईसाइयों और अछूतों के बराबर अस्पृश्य शत्रु थे।

यही वजह रही है कि बंगाली भद्रलोक विद्वतजनों ने नोबेल पुरस्कार पाने से पहले रवींद्रनाथ को कभी कवि माना नहीं है।

दूसरी ओर, उनकी रचनाओं और जीवन दर्शन में महात्मा गौतम बुद्ध का सर्वव्यापी असर है और उनकी समूची रचनाधर्मिता अस्पृश्यता के नस्ली हिंदुत्व के खिलाफ निरंतर अभियान है।

हमने अछूत रवींद्रनाथ के इस दलित विमर्श पर करीब दस बारह साल पहले कवि केदारनाथ सिंह के कहने पर सिलसिलेवार काम किया था। महज तीन महीने के भीतर एक किताब की पांडुलिपि उन्हें सौंपी थी, जिसे उन्होंने प्रकाशन के लिए दरियागंज,  दिल्ली के प्रकाशक हरिश्चंद्र जी को सौंपी थी। हमने केदारनाथ जी से निवेदन किया था कि वह पांडुलिपि वे संपादित कर दें। हरिश्चंद्र जी ने छापने का वायदा किया था। लेकिल दस बारह साल से वह पांडुलिपि उनके पास पड़ी है। मेरे पास जो मूल पांडुलिपि थी, वह बाकी चीजों, संदर्भ पुस्तकों और प्रकाशित सामग्री के साथ चली गयी।

अब बेघऱ,  बेरोजगार हालत में नये सिरे से काम करना मुश्किल है हमारे लिए। भारतीय भाषाओं के युवा रचनाकार, आलोचक इस अधूरे काम को पूरा कर दें तो रवींद्र  ही नहीं, भारत और भारतीय दर्शन परंपरा को समझने, विविधता, बहुलता और सहिष्णुता की परंपरा को मजबूत करने में मदद मिलेगी। मेरे पास न वक्त है और न संसाधन।

उत्तर भारत में रवींद्र नाथ के साथ मिर्जा गालिब, अमीर खुसरो,  प्रेमचंद,  पाश जैसे रचनाकारों के खिलाफ संघ परिवार के फतवे और पाठ्यक्रम बदलकर साहित्य और इतिहास को बदलने के केसरिया उपक्रम के खिलाफ साहित्यिक सांस्कृतिक जगत में अनंत सन्नाटा है।

इसके विपरीत बंगाल में इसके खिलाफ बहुत तीखी प्रतिक्रिया है रही है और संस्कृतिकर्मी सड़कों पर उतरने लगे हैं।

गायपट्टी के केसरिया मीडिया के विपरीत बंगाल के सबसे लोकप्रिय दैनिक भी इस मुहिम में शामिल है। बाकी मीडिया भी हिंदुत्वकरण के खिलाफ लामबंद है।  

आज ही आनंदबाजार में नवजागरण के मार्फत विशुद्धता के हिंदुत्व पर कुठाराघात करने वाले ईश्वरचंद्र विद्यासागर का वसीयतनामा छपा है, जिसमें उन्होंने अपने पुत्र को त्याग देने की घोषणा की है। उन्होंने परिवार और महानगर कोलकाता छोड़कर आखिरी वक्त आदिवासी गांव और समाज में बिताया।

नवजागरण की विरासत में शामिल विद्यासागर, राजा राममोहन राय, माइकेल मधुसूदन दत्त के सामाजिक सुधारों के चलते भारतीय समाज आधुनिक बना है, उदार और प्रगतिशील भी।

माइकेल के मेघनाद वध काव्य और रवींद्रनाथ के खिलाफ संघियों ने बंगाल में घृणा अभियान चलाने की कोशिश की तो उसका तीव्र प्रतिरोध हुआ। लेकिन बाकी भारत में साहित्य, संस्कृति और इतिहास के केसरियाकरण की कोई प्रतिक्रिया नहीं है।

मैंने इससे पहले लिखा है कि बंगाली दिनचर्या में रवींद्रनाथ की उपस्थिति अनिवार्य सी है,   जाति,   धर्म,   वर्ग,  राष्ट्र,  राजनीति के सारे अवरोधों के आर पार रवींद्र बांग्लाभाषियों के लिए सार्वभौम हैं,  लेकिन बंगाली होने से ही लोग रवींद्र के जीवन दर्शन को समझते होंगे,  ऐसी प्रत्याशा करना मुश्किल है।

इसके बावजूद संघ परिवार के रवींद्र और दूसरे भारतीय लेखकों के खिलाफ, साहित्य और संस्कृति के केसरियाकरण खिलाफ जो तीव्र प्रतिक्रिया हो रही है, उससे साफ जाहिर है कि संस्कृति विद्वतजनों की बपौती नहीं है।

बत्रा साहेब की मेहरबानी है कि उन्होंने फासिज्म के प्रतिरोध में खड़े भारत के महान रचनाकारों को चिन्हित कर दिया। इन प्रतिबंधित रचनाकारों में कोई जीवित और सक्रिय रचनाकार नहीं है तो इससे साफ जाहिर है कि संघ परिवार के नजरिये से भी उनके हिंदुत्व के प्रतिरोध में कोई समकालीन रचनाकार नहीं है।

उन्हीं मृत रचनाकारों को प्रतिबंधित करने के संघ परिवार के कार्यक्रम के बारे में समकालीन रचनाकारों की चुप्पी उनकी विचारधारा, उनकी प्रतिबद्धता और उनकी रचनाधर्मिता को अभिव्यक्त करती है।

गौरतलब है कि मुक्तिबोध पर अभी हिंदुत्व जिहादियों की कृपा नहीं हुई है। शायद उन्हें समझना हर किसी के बस में नहीं है, गोबरपंथियों के लिए तो वे अबूझ ही हैं।

उन्हीं मृत रचनाकारों को प्रतिबंधित करने के संघ परिवार के कार्यक्रम के बारे में समकालीन रचनाकारों की चुप्पी उनकी विचारधारा, उनकी प्रतिबद्धता और उनकी रचनाधर्मिता को अभिव्यक्त करती है।

गौरतलब है कि मुक्तिबोध पर अभी हिंदुत्व जिहादियों की कृपा नहीं हुई है। शायद उन्हें समझना हर किसी के बस में नहीं है, गोबरपंथियों के लिए तो वे अबूझ ही हैं। अगर कांटेट के लिहाज से देखें तो फासिजम के राजकाज के लिए सबसे खतरनाक मुक्तिबोध है, जो वर्गीय ध्रूवीकरण की बात अपनी कविताओं में कहते हैं और उनका अंधेरा फासिज्म का अखंड आतंकाकारी चेहरा है। शायद महामहिम बत्रा महोदय ने अभी मुक्तबोध को कायदे से पढ़ा नहीं है।

बत्रा साहेब की कृपा से जो प्रतिबंधित हैं, उनमें रवींद्र, गांधी, प्रेमचंद, पाश,  गालिब को समझना भी गोबरपंथियों के लिए असंभव है।

जिन गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस के रामराज्य और मर्यादा पुरुषोत्तम को कैंद्रित यह मनुस्मृति सुनामी है, उन्हें भी वे कितना समझते होंगे, इसका भी अंदाजा लगाना मुश्किल है।

कबीर दास और सूरदास लोक में रचे बसे भारत के सबसे बड़े सार्वजनीन कवि हैं, जिनके बिना भारतीयता की कल्पना असंभव है और देश के हर हिस्से में जिनका असर है।  मध्यभारत में तो कबीर को गाने की वैसी ही संस्कृति है, जैसे बंगाल में रवींद्र नाथ को गाने की है और उसी मध्यभारत में हिंदुत्व के सबसे मजबूत गढ़ और आधार है। 

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