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राम मंदिर : फिर बेतलवा डाल पर, 2012 के बाद नींद से जागे भागवत को मंदिर याद आया

राम मंदिर : फिर बेतलवा डाल पर, 2012 के बाद नींद से जागे भागवत को मंदिर याद आया

राजेंद्र शर्मा

बचपन में पढ़ी विक्रम और बेताल की हरेक कथा का अंत एक ही तरह से होता था। विक्रम से अपने सवाल का सही जवाब सुनने के बाद, ‘बेताल ने विक्रम के कंधे पर पड़ा शव उठाया और पेड़ पर जा बैठा’। कहानी का यह अंत अगली कहानी का या इस सिलसिले के अगले चक्र का रास्ता भी था। अयोध्या में कथित जन्म भूमि पर राम मंदिर के निर्माण का सवाल भी क्या विक्रम और बेताल की कहानी का ऐसा अंत ही नहीं बन गया है? चुनाव जैसे-जैसे सिर पर आते हैं, हर बार भाजपा समेत संघ परिवार को राम मंदिर याद आने लगता है, जिसे चुनाव का काम निकलने के बाद, हर बार उसी प्रकार भुला भी दिया जाता है।

आरएसएस के सरसंघचालक के हाल के वियजदशमी संबोधन में जिस तरह से राम मंदिर की मांग को उठाया गया है, उसने बरबस विक्रम और बेताल की कथा के अंत की याद दिला दी है।

बेशक, यह कहा जा सकता है कि आरएसएस ने ही नहीं, संघ परिवार के हिस्से के रूप में भाजपा ने भी, राम मंदिर की मांग को छोड़ा ही कब था, जो उनके मंदिर को याद करने को चुनाव जोडक़र देखा जाए। यहां तक कि खुद भागवत ने भी, पिछले ही महीने के दिल्ली के विज्ञान भवन के अपने चर्चित तीन-दिनी व्याख्यान समेत, कई मौकों पर अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण जरूरी होने की बात कही ही थी। लेकिन, यह कहना है अर्द्ध-सत्य ही। इसके दो महत्वपूर्ण कारण हैं। पहला तो यही कि आरएसएस के बारे में कुछ भी जानने हरेक व्यक्ति यह जानता है कि सरसंघचालक के नागपुर रेशिम बाग मुख्यालय से दिए जाने वाले विजयदशमी संबोधन का, संघ के लिए जैसा महत्व है, वैसा खुद सरसंघचालक के भी किसी अन्य संबोधन का नहीं है।

विजयदशमी का दिन, आरएसएस की स्थापना का दिन है। परंपरागत रूप से सरसंघचालक के विजयदशमी संबोधन को, आरएसएस का सालाना नीतिगत व्यक्तव्य माना जाता है और वह भी ऐसा वक्तव्य जिसके जरिए आरएसएस, अपने से बाहर की दुनिया को संबोधित करता है। हालांकि अब, खासतौर पर मोदी की सरकार आने के बाद से और आम तौर पर भागवत के सरसंघचालक बनने के बाद से, बाहर की दुनिया से आरएसएस का संप्रेषण एक तरह से रोजाना की चीज हो गया है। फिर भी विजयदशमी संबोधन का विशिष्ट महत्व कम नहीं हुआ है। वास्तव में मोदी निजाम आने के बाद दूरदर्शन से सबसे पहले आरएसएस के जिस कार्यक्रम का लाइव प्रसारण शुरू कराया गया था, वह भागवत का विजयदशमी संबोधन ही था।

इसे देखते हुए इसे सिर्फ एक संयोग मानने के लिए अंध संघभक्त होना जरूरी है कि, मोदी के राज के पांच साल के अपने आखिरी और चुनावी वर्ष के विजयदशमी संबोधन में ही भागवत को, राम मंदिर की याद आयी है। इससे पहले, 2014 से लेकर 2017 तक, एक भी विजयदशमी संबोधन में उन्हें राम मंदिर की याद नहीं आयी। बेशक, इसे भी संयोग मानना मुश्किल ही है कि इससे पहले आखिरी बार, 2012 में ही यानी जब 2014 के आम चुनाव के लिए संघ परिवार के लंबे अभियान की सेनाएं सजनी शुरू हो रही थीं, तभी भागवत ने विजयदशमी संबोधन में राम मंदिर का जिक्र किया था। इसके बाद यह कहने को कोई गलत कैसे कह सकता है कि संघ परिवार को चुनाव के मौके पर ही राम मंदिर याद आता है।

    इस विजयदशमी के संबोधन में भागवत का राम मंदिर का स्मरण, आम तौर पर आरएसएस तथा उसके आनुषांगिक संगठनों के जब-तब के मंदिर स्मरण से अलग होने का दूसरा बड़ा कारण, इस संबोधन में जो कहा गया उसी में छुपा हुआ है।

बेशक, भागवत ने अपने संबोधन में अयोध्या विवाद की सचाई को अनदेखा कर और इस सचाई को अनदेखा कर कि सैकड़ों राम मंदिरों वाली अयोध्या में एक और राम मंदिर बनाने की जो मांग की जा रही है, वास्तव में बाबरी मस्जिद की ही जगह पर मंदिर बनाने की मांग है, इसके ‘‘देश हित की बात’’, राष्ट्र के ‘‘स्वगौरव की दृष्टि से आवश्यक’’ तथा इसके ‘‘देश में सद्भावना व एकात्मता का वातावरण बनना प्रारम्भ’’ होने में सहायक होने के अपने दावे दुहराए हैं। उन्होंने न सिर्फ संघ परिवार की ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ की इस मुहिम का विरोध करने वालों को ‘‘कुछ कट्टरपंथी व सांप्रदायिक राजनीति उभारकर अपना स्वार्थसाधन करने वाली शक्तियां’’ करार दिया है बल्कि यह कहकर प्रछन्न धमकी भी दी है कि ‘‘समाज के धैर्य की बिना कारण परीक्षा, यह किसी के हित में नहीं है।’’ लेकिन, संघ के लिए इसमें नया कुछ नहीं है। नयी है आरएसएस सरसंघचालक की यह मांग कि, ‘‘शीघ्रतापूर्वक उस भूमि के स्वामित्व के संबंध में निर्णय हो तथा शासन द्वारा उचित व आवश्यक कानून बनाकर, भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया जाना चाहिए।’’

अचरज की बात नहीं है कि चुनाव के ऐन पहले उठायी गयी कानून बनाकर, विवादित भूमि के स्वामित्व का फैसला करने और मंदिर का रास्ता बनाने की संघ प्रमुख की दो-टूक मांग ने, अपनी ओर सभी का ध्यान खींचा है। यह भी अचरज की बात नहीं है कि इस मांग पर भाजपा को छोडक़र लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने तीखी प्रतिक्रिया की है, जबकि भाजपा ने अपने मातृ संगठन की इस मांग पर आम तौर पर मौन ही साधे रखा है। हां! दबे सुर में सरकार की ओर से एकाध बार इसके इशारे जरूर किए गए हैं कि वह, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेगी। तो क्या इसका अर्थ यह है कि मोदी सरकार, आरएसएस की इस मांग से दूरी बना रही है? बात कुछ और ही है।

वास्तव में यह तो स्क्रिप्ट ही मोदी सरकार के इस अधिकतम्वादी मांग से दूरी बनाए दिखाई देने की है। यह मौजूदा सरकार के सामने सांप्रदायिक तकाजों की और बड़ी लाइन खींच देने का मामला है, जिससे वह सब कुछ करते हुए भी और यहां तक कि पहले से ज्यादा सांप्रदायिक तकाजे पूरे करते हुए भी, वह अपेक्षाकृत गैर-सांप्रदायिक नजर आए। भक्त यह तर्क दे सकें कि, सरकार धर्मनिरपेक्ष नहीं होती तो सुप्रीम कोर्ट का इंतजार क्यों करती, मंदिर के लिए कानून पारित नहीं करा देती?

भाजपा की मातृ संस्था को यह बखूबी नजर आ रहा है कि 2019 का चुनाव, 2014 का चुनाव नहीं है। मोदी राज से आम जनता की उम्मीदें टूट चुकी हैं, इसलिए उसके पक्ष में सांप्रदायिक गोलबंदी की ज्यादा से ज्यादा जरूरत होगी। संघ तथा उसके आनुषांगिक संगठनों को, इस गोलबंदी के मुख्य औजार के रूप में खुद तो मंदिर का मुद्दा गरमाने की जरूरत है ही, इसके साथ ही मोदी-शाह की भाजपा की बहुसंख्यकवादी पहचान को चमकाने के लिए भी, इस मुद्दे की जरूरत है। जाहिर है कि पूरी कसरत, बहुसंख्यकवादी पहचान को चमकाने के बावजूद, धर्मनिरपेक्ष संविधान में आस्था का दिखावा बनाए रहने के लिए है, वर्ना खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक मंच अपना कर तो भाजपा, शासक वर्ग का समर्थन खोकर, सत्ता के लिए मुकाबले से ही बाहर हो जाएगी।

संयोग ही नहीं है कि भागवत ने चुनाव के संदर्भ में यह कहकर कि ‘‘संपूर्णतया योग्य अथवा संपूर्णतया अयोग्य किसी को नहीं कह सकते’’, मोदी राज से जनता के मोहभंग को देखते हुए, कम बुरे के लिए नकारात्मक वोट की ही अपील की है और नोटा का यह कहकर विरोध किया है कि वह तो सबसे बुरे का समर्थन करना है।             

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