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राष्ट्र मेहनतकश अवर्ण बहुजन बहुसंख्य जनगण की निगरानी, उनके दमन, उत्पीड़न सफाये और मानवाधिकार हनन का सैन्य तंत्र है

 

रक्तकरबी(Red Oleanders)- राष्ट्रवाद वहीं है जो कुलीन सवर्ण सत्ता वर्ग का हित है।

रवींद्र दलित विमर्श : 14

पलाश विश्वास

मुझे नेट पर हिंदी में रक्तकरबी से संबंधित कोई सामग्री नहीं मिली है। अगर किसी के पास संबंधित सामग्री की जानकारी है तो कृपया शेयर करें।

टीवी पर नोटबंदी पर बहस को लेकर हंसी आ रही थी क्योंकि मीडिया डिमोनीटाइजेशन को कल तक गेमचेंजर बता रहा था।

कालाधन निकालने के लिए प्रधान स्वयंसेवक का हिज मास्टर्स वायस बना मीडिया अब भी नोटबंदी की उपलबधियां गिनाने के लिए डिजिटल स्मार्ट इंडिया को फोकस बनाये हुए है।

अब भी रिजर्व बैंक को हुए नोट छापने के खर्च की वजह से हुए नुकसान की ही चर्चा हो रही है। नोटबंदी के बाद से लेकर अब तक करीब तीस लाख लोगों के बेरोजगार होने की कोई चर्चा नहीं हो रही है। डिजिटल लेनदेन की वजह से कारोबार से बाहर हो गये छोटे और मंझौले कारोबारियों की हालत पर कोई चर्चा नहीं हो रही है।

पचास दिन में ही शेयर बाजार में निवेशकों के साढ़े छह लाखो करोड़ रुपये डूब जाने और नोटबंदी के बाद अब तक शेयर बाजार के सूचकांक उछालू खेल के जरिये छोटे और मंझौले निवेशकों के सत्यानाश और सत्ता वर्ग के चहेते उद्योगपतियों के देश भक्ति,  विशुद्धता,  धर्म, अस्मिता, राष्ट्रवाद और सुरक्षा संप्रभुता के नाम पर बाकी कारोबारियों और उद्यमियों और यहां तक कि प्रतिष्ठित औद्योगिक घरानों और लोकप्रिय ब्रांडों को हाशिये पर रखकर बाजार पर एकाधिकार कायम करने के डिजिटल तंत्र की चर्चा नहीं हो रही है।

कालेधन को सफेद बनाने का राजनीतिक खेल, घोटालों पर पर्दा अभी हटा नहीं है। आधार नंबर के जरिये ईटेलिंग के जरिये खुदरा कारोबार के बंडाधार का कोई ब्योरा नहीं है और नहीं ही आर्थिक साइबर डिजिटल अपराधों की कोई चर्चा है।

सरकार ने भी कालाधन निकालने की बात छोड़कर हकीकत छुपाने के लिए झट से असल गोलपोस्ट डिजिटल इंडिया का बेपर्दा कर दिया।

हम इस सिलसिले में नोटबंदी के पहले दिन से कहते लिखते रहे हैं कि कालाधन निकालने के लिए नहीं, यह कालाधन सफेद करने का और आधार को वैधता देते हुए डिजिटल लेनदेन के जरिये अर्थव्यवस्था पर एकाधिकार कारपोरेट एकाधिकार कायम रखने का हिंदुत्व एजंडा है।

हस्तक्षेप के तमाम लेखों को पढ़ लें।

हम आधार परियोजना के प्रस्तावित होने के समय से इसे अर्थव्यवस्था से दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, किसानों, मेहनतकशों और छोटे कारोबारियोे के बहिस्कार के तहत कारपोरेट एकाधिकार के सत्ता वर्चस्व के लिए नागरिकों की निगरानी का बंदोबस्त बताते लिखते रहे हैं।

आधार पर हस्तक्षेप में प्रकाशित तमाम आलेखों को आप संदर्भ सामग्री मानकर दोबारा पढ़ सकते हैं।

बाकी रिजर्व बैंक के आंकड़े हकीकत बयान करते हैं और सोशल मीडिया पर इस पर सारी सामग्री उपलब्ध है। इसलिए नोटबंदी पर हमें नया कुछ फिलहाल नहीं कहना है। मीडियावालों को यह भंग छाने की छूट रही। बाकी जनता अफीम के नशे में है।

बहरहाल नोटबंदी का आधार निराधार डिजिटल इंडिया के कारपोरेट राष्ट्रवाद को समझना जरूरी है। इसी सिलसिले में रवींद्र नाथ के गीति नाट्य रक्तकरबी (Red Oleanders) में बेनकाब राष्ट्र और राष्ट्रवाद की चर्चा हम कर रहे हैं।

रवींद्र नाथ के रक्तकरबी (Red Oleanders) में राष्ट्रवाद वहीं है जो कुलीन सवर्ण सत्ता वर्ग का हित है।

आज के भारत का सच और औपनिवेशिक उपनिवेश अखंड भारत का सच हूबहू एक है। नील विद्रोह किसानों की बेदखली और उनको जबरन मजदूर बनाये जाने के खिलाफ आदिवासी बहुजन किसानों का जन विद्रोह है। अब जनता लापता है।

रक्तकरबी का राजा सोना निकालने के लिए किसानों को यक्षपुरी में कैद करके उनकी चौबीसों घंटे निगरानी करते हुए उन्हें नागरिक और मानवाधिकार से वंचित करता है और आज भारत की अर्थव्यवस्था निरंकुश सत्ता की वही यक्षपुरी है जहां कटकटेला अंधियारा के सिवाय कोई रोशनी नहीं है।

इस हिंदू राष्ट्र के रामराज्य में किसी नंदिनी की आवाज की कोई गूंज नहीं है ना लावारिश खून का कोई नामोनिशां है और न कातिल का कोई सुराग है।

मनुष्यता का वजूद आधार नंबर है और आधार नंबर नहीं है तो आपका कोई वजूद नहीं है।

बुनियादी सेवाओं और जरुरतों, नागरिक और मानवाधिकार से आप वंचित है।

इस अंधियारे के तिलिस्म में अभिव्यक्ति कैद है और नागरिकों की चौबीसों घंटे निगरानी है। निजता और गोपनीयता के अधिकार की क्या कहिये,  संवैधानिक अधिकार, मौलिक अधिकार, नागरिकता और नागरिक मानवाधिकार के हनन का अंध राष्ट्रवाद नरसंहारी सुनामी है, जिसके खिलाफ जन प्रतिरोध संगठित करने वाला यक्षपुरी का कोई अध्यापक कहीं नहीं है।

नंदिनी का चरित्र जी रही तृप्ति मित्र के अवसान के बाद नंदिनी की आवाज की कोई गूंज बची नहीं है और न बचा है शंभू मित्र का वह रंगकर्म।

राष्ट्र मेहनतकश अवर्ण बहुजन बहुसंख्य जनगण की निगरानी,  उनके,  दमन,  उत्पीड़न सफाये,  नागरिकता नागरिक और मानवाधिकार हनन का सैन्य तंत्र है।

इसी सिलसिले में जार्ज आरवेल के उपन्यास 1984 और उससे संबंधित सामग्री और वीडियो, रवींद्र का गीत नाट्य रक्तकरबी(Red Oleanders) से संबंधित सामग्री और वीडियो के साथ चार्ली चैपलिन की फिल्म माडर्न टाइम्स के वीडियो पोस्ट किये।

आधार से जरूरी सेवाओं को जोड़ने की मोहलत निजता के मौलिक अधिकार बन जाने के बावजूद दिसंबर तक बढ़ाकर कारपोरेट डिजिटल इंडिया के हिंदू राष्ट्र एजंडा को वैधता देने के सिलिसले में निरंकुश अंध राष्ट्रवाद की आड़ में नागरिकों की निगरानी,  नागरिक स्वतंत्रता और नागरिक मानवाधिकार हनन के अबाध पूंजी प्रवाह की जांच पड़ताल के मकसद से संदर्भ सामग्री पाठकों तक पहुंचाने के नजरिये से हमने ऐसा किया है।

जार्ज आरवेल का उपन्यास 1949 में प्रकाशित हुआ। हमने याहू ग्रुप के जमाने से इस उपन्यास के कथानक के क्रम में नागरिक और मानव अधिकारों की लगातार चर्चा की है। उनके लिखे एनीमल फार्म पर भी इसी सिलसिले में खासकर सिंगुर नंदीग्राम भूमि आंदोलन में सत्ता वर्ग के कारपोरेट राज के सिलसिले में चर्चा की है।

चार्ली चैप्लिन का फासीवादी राष्ट्र के शिकंजे में फंसी नागरिकता पर और नागरिकों की निगरानी पर 1936 में बनी कामेडी फिल्म माडर्न टाइम्स भी हमने कई दफा शेयर किया है।

गौरतलब है कि 1949 में लिखे जार्ज आरवेल के उपन्यास 1984 और 1936 में बनी चैपलिन की फिल्म माडर्न टाइम्स से काफी पहले 1917 में ही रवींद्रनाथ ने राष्ट्र के इस निरंकुश मनुष्यता और सभ्यता विरोधी चरित्र को अपने निबंध नेशनालिज्म (राष्ट्रवाद) में बेनकाब कर दिया था।

रक्तकरबी (Red Oleanders) रवींद्रनाथ ने 1923 में लिखा।

इसे भी पहले भारत के छोटे से राज्य त्रिपुरा के राजतंत्र पर लिखे ऐतिहासिक उपन्यास राजर्षि में रवींद्रनाथ ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद के मनुष्यता के दमन के चरित्र को बेनकाब किया है। इस उपन्यास पर हम बाद में अलग से चर्चा करेंगे।

गौरतलब है कि फासीवाद नाजी राष्ट्र से बहुत पहले पश्चिमी राष्ट्र की अवधारणा के विरुद्ध रवींद्र भारतीय लोक गणराज्य की संस्कृति में विविधात बहुलता और संस्कृति के लोकतंत्र का विमर्श चला रहे थे। जिसका भारत के हिंदुत्ववादियों के फासीवादी हिंदू राष्ट्र के एजंडे के साथ टकराव हिंदुत्ववादियों के फासीवाद और नाजी जर्मनी से संपर्क होते ही शुरु हो गया था।

रक्तकरबी के विचार स्वप्न अभिव्यक्ति निजता नागरिकता और स्वतंत्रता नियंत्रण के राजकाज और सत्ता राजनीति के नस्ली वर्चस्व में निष्णात राष्ट्रवाद के खिलाफ मनुष्यता की पुकार की गूंज आरवेल के उपन्यास 1984 और चार्ली चैपलिन की फिल्म माडर्न टाइम्स में है तो रक्तकरबी का संदर्भ समझने के लिए सैन्य राष्ट्र में मनुष्यता और सभ्यता के संकट के गहराते जाने की प्रक्रिया भारत के आजाद होने तक समझने के लिए इन दोनों कृतियों को जानना जरूरी है।

इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए रक्त करबी, 1984 और माडर्न टाइम्स को एकसाथ रखकर देखें तो समझ में आता है कि पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में बदलने के बाद स्वतंत्र नागरिक किस तरह सैन्य राष्ट्र के नियंत्रित मनुष्यताहीन यंत्रमानव में तब्दील होता जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार माना है लेकिन आधार की तकनीकी निगरानी के तहत इस निजता की रक्षा के लिए अभी कोई फैसला नहीं हुआ है और सुप्रीम कोर्ट की राय बदलने के लिए सत्ता वर्ग के कब्जे में संसदीय प्रणाली में नागरिकों का खासकर अवर्णों,  गैरनस्ली दीगर समुदायों, मेहनतकशों,  किसानों,  अल्पसंख्यकों और आदिवासियों का कारगर प्रतिनिधित्व न होने की वजह से नये कानून के तहत इस राय को उलट देने का खतरा बना हुआ है।

आर्थिक सुधारों के हवाले कारपोरेट जनसंहारी कार्यक्रम के तहत संवैधानिक रक्षा कवच और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हुए तमाम कायदे कानून इसी तरह बदले जाते रहे हैं। कारपोरेट एकाधिकार के लिए तीन हजार के करीब कानून अभी भगवा रामराज के तीन साल में ही बदल दिये गये हैं।

कारपोरेट खेल का कमाल यह है कि दुनियाभर में घूम-घूमकर प्रधान स्वयंसेवक विदेशी कंपनियों के हवाले कर रहे हैं भारत की अर्यव्यवस्था, कारोबार, उद्योग और जलजंगल जमीन और उनका बाबा बाबी संप्रदाय संस्थागत हिंदुत्व के एजंडे के मुताबिक स्वराज, विशुद्धता, धर्म, देशभक्ति का स्वांग रचते हुए अपना अपना कारोबार का कारपोरेट एकाधिकार वर्चस्व कायम कर रहे हैं। विदेशी पूंजी और स्वदेशी राष्ट्रवाद की दुधारी तलवार से आम जनता की गर्दन उतारी जा रही है।

राज्यसभा में विपक्ष के बहुमत को बाईपास करते हुए अर्थ विधेयक बतौर लोकसभा में बहुमत के जरिये जिस तरह आधार कानून बनाया गया है उससे जनपदों के कब्रिस्थान और श्मशानघाट के नींव पर सत्ता सवर्ण वर्ग के डिजिटल यांत्रिक इंडिया का निरमाण का स्टार्ट अप शुरु हो गया है और स्मार्ठ फोन के ऐप के जरिये नागरिकों की जान माल का सफाया अभियान, बेदखली विस्थापन बहिष्कार और छंटनी की नई वर्णव्यवस्था का ब्राह्मणधर्म का पुनरुत्थान हो गया है और इसका पुरोहित तंत्र है समूचा कारपोरेटपंडेड राजनेता वर्ग तो लोकतंत्र और कानून के राज में आम नागरिक गुलाम में बदल गये हैं और किसान अपनी जमीन से बेदखल गुलाम कैद मजदूर हैं।

यही रक्तरबी की यक्षपुरी का सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक यथार्थ है, जिसमें अभिव्यक्ति, निजता, सपनों, विचारों के नियंत्रण का माडर्न टाइम बदस्तूर 24 घंटा लाइव है और इसीमें 1984 की निरंतरता है और नागरिक एनीमल फार्म में कैद जीव जंतुओं की तरह जनविद्रोह भी कर नहीं सकते क्योंकि आधार नंबर के सिवाय रक्त मांस का उनका कोई वजूद नहीं है। क्योंकि उनके विचार और सपने भी राष्ट्र नियंत्रित हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है ही नहीं। सारे माध्यम, विधाएं और मातृभाषाएं तक जनपदों और जनता के खिलाफ सत्तावर्ग के नस्ली वर्म वर्चस्व के पक्ष में लामबंद है और सैन्यतंत्र लगातार मजबूत होता जा रहा है।

आपातकाल के इस अंधियारे का कहीं कोई असर किसी नागरिक पर होने का अंदेशा भी नहीं है क्योंकि मनुष्य का कोई वजूद ही नहीं है और वह सिर्फ एक डिजिटल कार्यक्रम के अधीन यंत्रमानव है जिसके रोबोटिक प्रोग्राम में अंध राष्ट्रवाद के सिवाय कोई मानवीय संवेदना है ही नहीं।

इसलिए किसी नंदिनी को रोशनी की तलाश नहीं है और समूचा अध्यापक वर्ग सिरे से लापता है जो कि आम नागरिकों की शिक्षा दीक्षा पूरी करके उन्हें मनुष्य बना दें। शिक्षा का ज्ञान से कोई मतलब नहीं है और न विमर्श की कोई इजाजत है। तमाम नागरिक और मानवाधिकार ऐप्पस और स्टर्ट अप से नत्थी है जो आधार लिकंड हैं।

समूची युवापीढ़ी नीले शार्क के खेल में शामिल है और आत्महत्या उनकी अनिवार्य नियति है। समता, न्याय और अवसरों, रोजगार और आजीविका से बेदखल पीढ़ियों का कोई भविष्य है नहीं और हम एक अनंत ब्लैक होल में दाखिल यंत्रमानव हैं।

भविष्यद्रष्टा रवींद्र लगातार यह चेतावनी जारी करते रहे हैं और चार्ली चैपलिन की कामेडी का विमर्श वहीं है जो 1984 का कथानक है।

1923 में लिखे अपने नाटक रक्तकरबी (Red Oleanders) को रवींद्र भावीकाल के फासीवादी समय के सामाजिक यथार्त के रुप में पेश कर रहे थे। 1924 के नवंबर दिसंबर के दौरान वे अर्जेंटीना की यात्रा पर थे उस यात्रा के दौरान एलमहर्स्ट से रवींद्र का लंबा संवाद चला जिसमें रक्तकरबी की चर्चा भी हुई।

फासीवाद के खतरे के मद्देनजर भावीकाल के संकट से सचेत रवींद्र गैरबंगाली पाठकों तक इस नाटक को संप्रेषित करना चाहते थे।

नील विद्रोह और उसमें शामिल आदिवासी बहुजन किसान, इस विद्रोह पर लिखे दीनबंधु मित्र के लिखे नाटक नील दर्पण और नवान्न से शुरू गणनाट्य आंदोलन, बंगाल की भुखमरी, तेभागा आंदोलन तक जारी किसान आदिवासी जनविद्रोंहों की निरंतरता की वजह से अभूतपूर्व कृषि संकट के संदर्भ में बंगाल में रक्तकरबी की प्रासंगिकता और उसकी समझ को लेकर को कभी संशय नहीं रहा लेकिन पूंजीवादी साम्राज्यवादी उत्पादन प्रणाली और कारपोरेट राज में समूचे बारत में गहराते कृषि संकट, जल जंगल जमीन से किसानों की अनंत बेदखली के बावजूद अस्मिता राजनीति के हिंदुत्व एजंडे के अंध राष्ट्रवाद के सर्वव्यापी वर्चस्व की वजह से बाकी भारत में राष्ट्रवाद के इस जनविरोधी वीभत्स चेहरे के सच का सामना हुआ ही नहीं है और प्रेमचंद के बाद किसानों और कृषि पर साहित्य के क्षेत्र में रचनाधर्मिता की अनुपस्थिति से हिंदुत्व के पुनरूत्थान की सुनामी में सैन्य राष्ट्र के निरंतर मजबूत होते जाने से आदिवासी भूगोल के अलावा धर्म जाति के नाम नरसंहारों की निरंतरता के बावजूद राष्ट्र और सत्ता की कारपोरेट राजनीति में रक्तकरबी पर बाकी भारत में विमर्श का कोई स्पेस ही तैयार नहीं हो सका।

भविष्यद्रष्टा रवींद्रनाथ को इस संकट का शायद आभास रहा होगा तो गैरबंगाली पाठकों के लिए उन्होंने इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी में खुद रेडआलियंडर्स शीर्षक से किया तो 1925 में ही इस नाटक की व्याख्या अंग्रेजी में कर दी।

इस व्याख्या में रवींद्र नाथ ने मनुष्य की निजी सत्ता संप्रभुता का संगठित मनुष्यों के तंत्र द्वारा नियंत्रण को ही राष्ट्र तंत्र माना है। फासीवादी नाजीवादी सैन्य राष्ट्र के अभ्युदय से ही संस्थागत दमन उत्पीड़न का यह तंत्र बना है। रवींद्र ने इस व्याख्या और अपने निबंधों में इसकी विस्तार से चर्चा की है।

Red Oleanders

Tagore’s preoccupation with life,  death,  and God in the first decade of the twentieth century gave way to a more overt analysis of political and social subjects during the 1920’s. Red Oleanders epitomizes the best work of this phase. Set in an imaginary town called Yakshapuri (in Hindu mythology,  the god of wealth rules over the city of this name),  the play presents a society in which the hoarding of gold demands strict discipline and a stratified class structure based on the suppression of human rights. Tagore himself explained its several layers of meaning later to his English readers: He had condemned the principle of organization for utilitarian purposes,  which subjugates the individuality of people and turns “a multitude of men . . . into a gigantic system”; the passion of greed among colonial powers,  “stalking abroad in the name of European civilization, ” and humiliating subject races; and the impersonal attitude in modern humanity that transforms the spirit of science into the tyranny of the machine,  preferring mechanization over humanitarianism. The playwright had become increasingly troubled by the evils of twentieth century civilization and seemed to offer an alternative solution in the person of Nandini,  the heroine of this play. Nandini symbolizes spontaneity,  love,  altruism,  and the spirit of humanity

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