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गोपालदास नीरज – हिन्दी के लोकप्रिय गीतकवि

वीरेन्द्र जैन

कोई उन्हें गीत सम्राट कहता है, तो कोई गीतों का राजकुँवर, और यह सब कुछ कहने से पहले यह जान लेना चाहिए कि नीरज जी तब एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में गीतकार के रूप में पहचाने गये जब हमने राजतंत्र को तकनीकी रूप से विदा कर दिया था। इसलिए उन्हें श्रेष्ठता की दृष्टि से शिखर का कलाकार दिखाने के लिए राजकुँवर और सम्राट उस हद तक ही ठीक हैं जैसे माँएं अपने बच्चों को प्यार में राजा बेटा कहती हैं। ऐसी उपमाएं समाज में शेष रह गई सामंती मानसिकता की सूचक हैं। पर क्या करें कि लोगों की श्रद्धा प्रेम इससे कम पर व्यक्त ही नहीं हो पाता, इसलिए ये उपमाएं भी सटीक हैं।

गोपालदास नीरज के गीतों पर मैं सैकड़ों पृष्ठ लिख सकता हूं किंतु इस लेख में केवल उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ मामूली बात करना चाहता हूं।

मेरे जीवन में दिल और दिमाग दोनों का हिस्सा है और दिल वाले हिस्से को समृद्ध करने का काम नीरज जी के गीतों रजनीश के भाषणों, व अमृताप्रीतम के उपन्यासों ने किया तो उसके मुकाबले दिमाग वाले हिस्से को प्रेमचन्द, हरिशंकर परसाई, मुकुट बिहारी सरोज, प्रो. सव्यसाची, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, और विभिन्न अन्य लेखकों के लेखन व सामाजिक कार्यों ने समृद्ध किया। उक्त बात लिखने का आशय यह है कि ज्ञान को सम्वेदना के साथ जोड़ने में मेरे ऊपर नीरज जी का प्रभाव इतना अधिक है कि मैंने अपनी पहली संतान का नाम ही नीरज रख दिया। एक समय था जब मुझे नीरज जी के सभी लोकप्रिय गीत कंठस्थ थे।

मेरे गृह नगर दतिया में प्रतिवर्ष एक कवि सम्मेलन का आयोजन होता था व कवि सम्मेलन का अर्थ होता था नीरज जी का आना।

कवि सम्मेलन की तिथि नीरज जी की उपलब्धता के आधार पर ही तय होती थी व श्रोताओं के रूप में उमड़ने वाले ‘मेले’ में शामिल होने वाले लोग अपने निजी कार्यक्रम भी उसके अनुसार तय करते थे। कवि सम्मेलन सूर्य की पहली किरण के साथ ही समाप्त होते थे व आमंत्रित कवि जनता की फर्माइश पूरी करने से कभी पीछे नहीं हटते थे। वे खजाना लुटाने की तरह जी भर कर सुनाते थे, जिनमें नीरज जी भी होते थे। उन दिनों गीतों की किताबें मुश्किल से मिलती थीं इसलिए अनेक श्रोता अपने साथ पैन व कापी लेकर आते थे और गीत को दर्ज करते रहते थे। मैंने सबसे पहले नीरज के गीत अपने एक दोस्त की रिश्ते की बुआ की कापी से पढे थे जो उन्होंने छोटे छोटे मोती से सुन्दर अक्षरों में लिखे हुए थे। कापी भी फुल साइज के कोरे पन्नों को मोड़ व अन्दर सुई धागे से सिल कर बनायी गयी थी। बाद में यह बात पुष्ट भी हुई कि हम लोगों से पहले की पीढी ने भी अपने प्रेमपत्र लिखने में नीरज के गीतों का सहारा लिया था। मुकुट बिहारी सरोज ने बतलाया था कि हिन्दी भाषी क्षेत्र के प्रत्येक नगर में नीरज के गीतों के प्रति दीवानगी रखने वाली महिलाएं थीं। एक रेल यात्रा में उनके लिए हर स्टेशन पर खाने का टिफिन लिये कोई गीत मुग्धा खड़ी थी। नीरज जी ने खुद भी लिखा है कि

उसकी हर बात पर हो जाती हैं पागल कलियां

जाने क्या बात है नीरज के गुनगुनाने में

हाँ, नीरज जी का गुनगुनाना दिल के तारों को झंकृत कर देने वाला होता रहा है। उनका स्वर अन्दर से निकली झंकार की तरह होता था, ऐसा लगता था कि जैसे बोलने के लिए मुँह के अन्य सहयोगी अंगों का उपयोग किये बिना वे केवल गले गले से गाते हों। क्या पता इसी कारण उन्होंने अपने बेटे का नाम गुंजन रखा हो। मेरे एक मित्र जो बाद में विधायक भी बने नीरज जी के अन्दाज में उनकी रचना पढते थे और उस समय उनका आनन्द उनके चेहरे से झलकता था जब वे पढते थे – आदमी को आदमी बनाने के लिए, जिन्दगी में प्यार की कहानी चाहिए, और इस कहानी को सुनाने के लिए, स्याही नहीं, आंसू वाला पानी चाहिए। उनके एक मित्र जो आजकल मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री हैं, भी नीरज की कविताएं डूब कर पढते थे और मनोरंजन के लिए कहते थे कि यह रचना मेरी खुद की चुराई हुयी है।

नीरज जी सम्भवतः वे पहले हिन्दी कवि हैं जिनके बारे में उनके श्रोता जानते थे कि हिन्दी कवि सम्मेलन के मंच पर मदिरापान करके आते हैं। और उनके प्रति उनके श्रोताओं की दीवानगी को इस आधार पर भी नापा जाये तो गलत नहीं होगा कि किसी भी वैष्णवी श्रोता तक ने इस आधार पर उनकी आलोचना नहीं की। नीरज जी की लोकप्रियता को इस आधार पर भी नापा जा सकता है कि बहुत से मंचाकांक्षी छुटभैया कवियों ने इस सम्भावना के वशीभूत मदिरा पान करने की कोशिश की कि शायद इससे वे नीरज जी जैसी कविता लिख लेंगे, और प्रस्तुत भी कर देंगे। इस मूर्खता में वे बुरी तरह असफल हुये, और नीरज तो नहीं बन पाये पर शराबी जरूर बन गये। वे यह भूल गये कि सैकड़ों गीतों के गीतकार नीरज ने कभी डायरी लेकर नहीं पढा व नब्बे साल के नीरज को बीमारी में भी अपने सभी गीत याद रहे क्योंकि वे उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा हैं। न कवि सम्मेलन के मंच पर और न ही किसी बैठक में किसी ने उन्हें बहकते देखा।

हर मुग्ध श्रोता/पाठक की तरह मैंने उनके निकट जाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा यहाँ तक कि अपनी आदत के विपरीत उनके मंच पर रचना पाठ करने की जुगाड़ भी जमाई, मुहावरे में कहूं तो दर्जनों बार उनकी चिलम भी भरी, पर मैं यह नहीं कह सकता हूं कि वे मुझे पहचानते होंगे। मैं ऐसी अपेक्षा भी नहीं रखता क्योंकि उन्होंने चालीस साल तक लगातार सैकड़ों सम्मेलनों में लंगोटा घुमाया है और मेरे जैसे अनेक लोग तो हर जगह उनके इर्दगिर्द रहते ही हैं, वे किस किस को याद करें जब तक कि बारम्बार का साथ न हो, या कोई न भूलने वाली रचना या घटना न हो। पर यह भी सच है कि कभी भूले भटके उनके साथ का अवसर पाने वाले हर व्यक्ति की स्मृति में वह गौरवपूर्ण क्षण दर्ज होगा, जब उसे उनका साथ मिला होगा।

जो भी सच्चा कवि है उसमें स्वभिमान भी जरूर होगा और वह खुद के बारे में गलत बयानी नहीं करेगा। कभी गालिब ने लिखा था कि-

‘हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अन्दाजे बयां और’

या फिराक गोरखपुरी ने कहा था कि-

आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हम असरों

जब ये खयाल आयेगा उनको, तुमने फिराक को देखा था

पर हिन्दी में इतनी क्षमता और साहस वाला दूसरा कोई नीरज जैसा कवि नहीं मिलेगा जो कह सकता हो कि-

आज भले कुछ भी कह लो तुम, पर कल विश्व कहेगा सारा

नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था पर प्यार नहीं था

या

इतने बदनाम हुये, हम तेरे जमाने में  / लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में

एक बार अट्टहास के कार्यक्रम में मैं लखनऊ के गैस्ट हाउस में रुका था तभी मालूम हुआ कि नीरज जी भी किसी कवि सम्मेलन में जाने के पड़ाव में वहीं ठहरे हुए थे। उनसे मिलने मैं, प्रदीप चौबे, और सूर्य कुमार पांडॆ, भी उनके कमरे में जा पहुँचे। कहीं से फिल्मी गीतों की बात निकल पड़ी। सच तो यह है है कि नीरज जी ने फिल्मी दुनिया में जाकर जो श्रेष्ठ गीत लिखे हैं उनसे फिल्मी दुनिया में हिन्दी साहित्य का सम्मान बढा है, किंतु उनसे ईर्षा रखने वाले कई लोग इसी आधार पर उनको कमतर करने की कोशिश करते रहे हैं। नीरज जी ने कहा कि अच्छा यह बताओ कि ‘ स्टेशन पर गाड़ी जब छूट जाती है तो एक-दो-तीन हो जाती है” इस एक दो तीन हो जाने के मुहावरे का इससे पहले प्रयोग किस हिन्दी गीत वाले ने किया? फिल्मी गीत भी नये प्रयोग कर रहे हैं व हिन्दी को समृद्ध कर रहे हैं। इसी दौरन उन्होंने अपने गीत का एक मुखड़ा सुना कर पूछा, अच्छा बताओ यह कौन सा छन्द है? मुखड़ा था-

सोना है, चाँदी है, हीरा है, मोती है, गोरी तिरा कंगना

किसी के पास भी उत्तर नहीं था तो नीरज जी खुद ही बोले यह रसखान का वह छन्द है जिसमें कहा गया है –

मानस हों तो वही रसखान बसों बिच गोकुल गाँव के ग्वालन

हिन्दी साहित्य और दर्शन शास्त्र में प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने वाले नीरज ने जो सूफियाना गीत लिखे हैं उन्हें सुधी श्रोताओं के बीच सुनाते हुए जब वे व्याख्या देते थे तब हम जैसे लोगों को उनका महत्व समझ में आता था। विस्तार में नहीं जाना चाहता हूं क्योंकि विषय की सीमाओं की घोषणा पहले ही कर चुका हूं, पर एक घटना याद आ रही है। नागरी प्रचारणी सभा के एक अन्वेषक उदय शंकर दुबे अपने कार्य के सिलसिले में कई वर्षों तक दतिया में रहे व दतिया के साहित्य जगत में सम्मानीय स्थान रखते थे। वे विचारों से समाजवादी थे। उन्होंने बातचीत में कह दिया कि नीरज की कविताएं तो स्त्रैण कविताएं हैं। मैं साहित्य का संस्थागत विद्यार्थी नहीं रहा किंतु उस दिन नीरज जी के प्रति प्रेम में मैंने भक्ति काल के कवियों की जो श्रंगार रस की कविताओं के उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या इन्हें भी आपने पहले कभी स्त्रैण कवि कहा है? मैंने धारा प्रवाह रूप से नीरज जी का गीत – बद्तमीजी कर रहे हैं, आज फिर भौंरे चमन में, साथियो आँधी उठाने का ज़माना आ गया है।‘ सुना दिया तब दुबे जी मेरी याददाश्त पर भी हक्के बक्के रह गये। बोले अभी नीरज को सुना भर है, उन्हें और पढूंगा। नीरज के मृत्यु गीत के कई किस्से हैं जो कई बार बयां हुये हैं।

अनेक संस्मरण हैं जो लेख की सीमा रेखा के बाहर चले जायेंगे। उन्हें फिर कभी लिखूंगा।

पिछले दिनों नीरज जी अस्वस्थ होकर अस्पताल में भर्ती हो गये थे। अपने चाहने वालों की शुभेक्षा से वे जल्दी स्वस्थ होंगे और शतायु होंगे यह भरोसा है।

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