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भारत के जाति प्रश्न का कोई समाधान गांधीवाद और अम्बेडकरवाद के पास नहीं

भारत के जाति प्रश्न का कोई समाधान गांधीवाद और अम्बेडकरवाद के पास नहीं

मधुवनदत्त चतुर्वेदी

जाति का प्रश्न !

गांधीवाद और अम्बेडकरवाद के पास भारत के जाति प्रश्न का कोई समाधान नहीं है। भारत का पूंजीवाद इस सामंती अवशेष को नष्ट नहीं कर पा रहा, बल्कि उसने किसी हद तक उसे अपने लिए फ्रेंडली कर लिया है। अंततः इसपर वैज्ञानिक विचारों से लैस समाजवादी व्यवस्था ही प्रहार करेगी, क्योंकि तब आरक्षण न होकर सबको शिक्षा और रोजगार का संवैधानिक अधिकार होगा और राज्य धर्म या जाति के पाखंड को बढ़ावा देने की बजाय उसे सख्ती से कुचलेगा।

बारात की खबर है।

यह सिर्फ इत्ती सी बात नहीं है। यह खबर है, यही बात बड़ी है। आरक्षण के विरुद्ध सड़कों पर नारेबाजी करने वाले सवर्ण बच्चे 'समानता' की आवाज उठाते हैं तो समाज के इस विद्रूप यथार्थ को अनदेखा कर रहे होते हैं क्योंकि उनमें से ज्यादातर किसी 'ब्राह्मण स्वाभिमान' या 'क्षत्रिय स्वाभिमान' की संस्थाओं के संपर्क में उकसावा पा रहे होते हैं। वे इस यथार्थ से आंखें मूंदे होते हैं या उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गयी होती है। उन्हें 'अवसर से वंचित' होने का मिथ्या भय दिखाया जाता है जबकि वास्तव में पूंजीवादी व्यवस्था में सरकारी नौकरी के अवसर धीरे धीरे सबके लिये ही समाप्त होते जा रहे हैं और निजी क्षेत्र में दलितों को ये अवसर पहले ही शून्य रहे हैं।

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की समाप्ति पर भी दलित युवक की बारात यदि खबर है तो यह समाज की शर्मनाक स्थिति का इश्तिहार है।

पिछले कुछ दिनों से ब्लैक कलर की कुछ ऐसी टीशर्ट्स पहने बहुत से लोग मेरे शहर में दिखे हैं जिनकी पीठ पर या तो 'क्षत्रिय' लिखा है या 'ब्राह्मण' और साथ में तलवार या फरसा जैसे चिन्ह। कुछ गाड़ियों पर भी ऐसे ही जातीय पहचान के शब्द और चिन्ह देखने में आते हैं। प्रशासन को बारात चढ़वानी पड़ी इसलिए कि हमने लोकतांत्रिक राज व्यवस्था स्वीकारी थी किन्तु समाज का जनवादीकरण करने का संकल्प पीछे छूट गया।

जो लोग आरक्षण के विरोध में दलील देते हैं कि जातीय अपमान, उत्पीड़न और उपेक्षा अब नहीं रहे वे इस बारात की खबर पर क्या कहेंगे। मुझे तो इस बात का दुख है, चिंता है, शर्मिंदगी है कि ये बारात खबर बनी ऐसा हमारा समाज अब भी है।



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