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प्राचीन हिन्दू धर्म का विरोधी है संघ का हिन्दू

प्राचीन हिन्दू धर्म का विरोधी है संघ का हिन्दू

RSS Hindutwa is anti of Ancient Hindu religion

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता व धर्मनिरपेक्षता 

जगदीश्वर चतुर्वेदी

हाल के वर्षों में और ख़ासकर मोदी सरकार आने के बाद 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद 'को लेकर बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक चर्चाएं तेज हो गई हैं। इन चर्चाओं के पीछे किस तरह की राजनीतिक मंशाएँ सक्रिय हैं इसे हम सबलोग जानते हैं।

सवाल यह है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद क्या है ?

इसका उत्तर इस सवाल से मिलेगा कि ये लोग भारत को किस तरह देख रहे हैं ? किस तरह की सामाजिक इकाइयों के आधार पर देख रहे हैं ? यानी इनके नक़्शे में भारत की किस तरह की तस्वीर है।

असल में, यह काल्पनिक धारणा है और इसका भारत के सामाजिक यथार्थ और उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से कोई संबंध नहीं है। यह वर्तमान, अन्य (अदर) और विविधता के निषेध पर निर्मित अवधारणा है।

'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ' के पक्षधर भारतीय समाज को धार्मिक इकाइयों के आधार पर वर्गीकृत करके नस्ल के आधार पर देखते हैं। धर्म के आधार पर सामाजिक समूहों को वर्गीकृत करते हुए ये लोग खुलेआम एक ऐसे हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता का दावा कर रहे हैं जो परंपरा में कहीं नहीं मिलता। सामाजिक जीवन में कहीं पर भी नज़र नहीं आता। यह वह हिन्दू धर्म है जिसकी रचना सन् 1925 के आसपास आरंभ हुई। आरएसएस के संस्थापकों ने इसको निर्मित किया। यह वह हिन्दू धर्म नहीं है जो हज़ारों सालों से हमारे देश में विभिन्न सम्प्रदायों के आचार-व्यवहार और शास्त्र विमर्श ने बनाया है। इसलिए इसे 'भगवा हिन्दूधर्म' कहना समीचीन होगा।

'भगवा हिन्दू धर्म' हमारे वर्तमान के वैविध्य को देखने, समझने में एकदम असमर्थ है। इसके अधिकांश नेताओं की स्वाधीनता संग्राम में नकारात्मक भूमिका रही है। यहां तक कि संविधान बनने के समय और बाद में भी अनेक बार संविधान विरोधी भूमिका रही है।

क्या है 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का मूलाधार

स्वाधीनता संग्राम में कई तरह की विचारधाराएं और उनके मानने वाले संगठन सक्रिय थे, संघ ने उनमें से लिबरल और क्रांतिकारी नेताओं और संगठनों के विचारों से प्रेरणा लेने की बजाय उन परंपराओं और राजनीतिक ताक़तों से प्रेरणा ली जिनके पास धर्म के आधार पर देखने या नस्ल के आधार पर देखने का नजरिया था, यही नजरिया संघ ने समाज, राजनीति, इतिहास आदि पर लागू किया।

'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का मूलाधार है एम.एस. गोलवलकर की किताब "वी ओर अवर नेशनहुड डिफाइंड" है, यह किताब सन् 1938 में लिखी गई और सन् 1939 में इसका पहला संस्करण प्रकाशित हुआ। इस किताब में नस्ल के आधार पर देश,राष्ट्र, धर्म,  संस्कृति,  भाषा आदि को व्याख्यायित किया गया।

गोलवलकर के नज़रिए की सबसे बड़ी समस्या है कि वह भारत में उपलब्ध ज्ञान संपदा और उसके वैविध्यपूर्ण मूल्याँकन की अनदेखी करके कपोल- कल्पनाओं पर आधारित राष्ट्र -राज्य की परिकल्पना पेश करते हैं। उन्होंने हमारी ज्ञान संपदा से मदद लेने की बजाय हिटलर-मुसोलिनी के नजरिए से राष्ट्र-राज्य को परिभाषित करते हैं। यही समझ भारत के बारे में आरएसएस के राजनीतिक विवेक की धुरी है और इसी से निर्देशित होकर संघ और उसके द्वारा संचालित संगठन आए दिन आधुनिक भारत की बातें करते रहते हैं।

गोलवलकर ने संघियों में ज्ञान की जो नींव डाली उसका आधार है किंवदन्ती, कपोल कथाएँ और अविवेकवादवाद। इसका सामाजिक लक्ष्य है 'अन्य' के खिलाफ घृणा और हिंसा केन्द्रित शासनतंत्र की स्थापना करना, मौजूदा शासनतंत्र में अविवेकवाद को नॉर्मल विचारधारा के रुप में प्रतिष्ठित करना। लोकतंत्र का आधार, नागरिक को आधार बनाने की बजाय धर्म और खासकर हिन्दू धर्म को आधार बनाना। सामाजिक इकाई की नियामक धुरी के रुप में जाति की संरचना की हर हालत में रक्षा करना। संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बदलना। आमलोगों में धर्मनिरपेक्षता की बजाय 'भगवा हिन्दू धर्म' का प्रचार करना, धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ घृणा पैदा करना, साम्प्रदायिकता फैलाना।

गोलवलकर की कपोल -कल्पनाएँ सतह पर सामान्य और सहज प्रतीत होती हैं लेकिन इनका राजनीतिक आयाम भयावह और बर्बर है। कपोलकथाएं बर्बरता का अंग कैसे बन गया यह चीज आरएसएस रचित शास्त्र और विभिन्न राज्य और केन्द्र सरकारों के नीतिगत फैसलों के मूल्याँकन के ज़रिए सहज ही समझी जा सकती है। मसलन्, यह कपोल कल्पना कि हिन्दू श्रेष्ठ होते हैं, पहले यह चीज पंडितों की कहानियों तक सीमित थी, इसका राजनीति से कोई संबंध नहीं था। इसके आधार कोई नया शास्त्र, सामाजिक नियम, संविधान अथवा दण्डविधान बनाने की कोई कोशिश पहले नहीं की गईं, यहां तक कि धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावादी संरचनाओं के खिलाफ कभी हमले नहीं किए गए। लेकिन पहली बार आरएसएस ने अपने जन्म से लेकर आज तक इन कल्पित कहानियों को सामयिक राजनीतिक विमर्श,  सामाजिक संरचनाओं और राज्य की नीतियों, शिक्षा के पाठ्यक्रम और राजनीतिक गोलबंदी का आधार बना दिया।

आरएसएस के जन्म के पहले रैनेसां में पुनरुत्थानवादी धारा थी जिनमें शामिल कई बड़े विचारकों ने धर्म और नस्ल के आधार समाज को देखने का नज़रिया पेश किया। इस तरह के लोग ब्रिटिश परंपरा, प्राच्यवादी परंपरा और देशज पुनरुत्थानवादी रैनेसां परंपरा में मौजूद थे। आरएसएस के प्रचारक इन विचारकों का बार – बार जिक्र करते हैं। मूल बात यह है कि समाज को धर्म और नस्ल के आधार पर देखने की राजनीतिक परंपरा का श्रीगणेश ब्रिटिश दौर में हुआ। यह नजरिया मध्यकाल में नहीं मिलता। यहां तक कि मध्यकाल में हिन्दू- मुस्लिम वैमनस्य के दर्शन भी नहीं होते। यही वजह है कि संघ का पुनरुत्थानवादी विचारकों और ब्रिटिशपंथी विचारकों के साथ सहज रूप में गहरा संबंध भी है। उनके इस नजरिए का साहित्य और कला रुपों में किस तरह का असर हुआ है इस पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है और यह भी विचारणीय है कि साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में इसका किस तरह विरोध किया गया।

( वर्द्धमान विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिन्दी साहित्य" विषय पर 29 सितम्बर 2015 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिए गए वक्तव्य का अंश)

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Topics – Cultural nationalism and Hindi literature, cultural nationalism, Hindi literature, hatred against secularism, secularism, the basis of democracy, cultural nationalism,

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