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गुंडई, बाजार और दहशत का मिश्रण बना भगवा गमछा

शाहनवाज आलम

लखनऊ/बलिया। हालांकि इस बार भी उत्तर प्रदश में पिछली साल जैसी ही गरमी है और लोग लू से बचने के लिए हमेशा की तरह ही सरों पर गमछे बांध कर दोपहर में निकल रहे हैं। लेकिन पारम्परिक तौर पर सफेद गमछों की जगह इस बार भारी तादाद में सरों पर भगवा रंग के गमछों का बांधा जाना इस साल की गरमी को पिछली गरमियों से अलग करता है। ये एक ऐसा बदलाव है जो राजनीति और मौसम के बीच के अमूमन न दिखने वाले सम्बंध को दिखाता है।

बहुत हद तक आप कह सकते हैं कि इस साल की गरमी भाजपा के नाम है।

आखिर मौसम से लड़ने के तरीके में आए इस बदलाव का क्या मतलब है, क्या किसी दूसरे रंग के गमछे से गरमी से नहीं निपटा जा सकता? सर और मुंह पर भगवा गमछा बांधे कोई भी सामान्य आदमी इस सवाल पर कोई सीधा जवाब देने के बजाए एक ‘डिप्लोमेटिक’ मुस्कान देता दिखेगा। जो बहुत कुरेदने पर आपको बताएगा कि अब इसी का जमाना है। वो आपसे उम्मीद करेगा कि अगर आप जमाने पर नजर रखने वाले होंगे तो खुद इस डिप्लोमेटिक मुस्कान का अर्थ समझ लेंगे।

अब डिप्लेमेटिक भाषा का कोई एक अर्थ तो होता नहीं है लिहाजा उसके कई अर्थ निकलते हैं।

इस तरह, भगवा गमछे के इस्तेमाल पर हर आदमी अपने राजनीतिक झुकाव के मद्देनजर इसकी व्याख्या करता दिख रहा है। मसलन, सपा और बसपा के समर्थक आपको बताएंगे कि भाजपा नेताओं की तरफ से इस गमछे को मुफ्त में बांट कर शक्ति प्रर्दशन की कोशिश की जा रही है। लोग इसके समर्थन में आपको बताएंगे कि कैसे अलग-अलग भाजपा नेता जो आगामी नगरपालिका चुनाव में प्रत्याशी बनने की होड़ में हैं इसे अपने जनसम्पर्क में लोगों को अपने नाम के कैलेंडरों और दूसरे प्रचार सामग्रियों के साथ बांट रहे हैं। एक तरह से वो भाजपा पर गरमी का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगा रहे हैं। वहीं भाजपा समर्थक इसे स्वेच्छा से जनता द्वारा खरीद कर पहने जाने और इससे भाजपा और भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों के बढ़ते रूझान को प्रमाणित करने वाला बताएगा।

वहीं इस राजनीतिक पक्ष-विपक्ष के अलावा एक तीसरा पक्ष पत्रकारों का भी है जिनसे नैतिक तौर पर निरपेक्ष होने की उम्मीद की जाती है।

छोटे-छोटे शहरों में जहां पत्रकारिता और पत्रकार नैतिकता से ज्यादा व्यावहारिकता को तरजीह देते हैं वहां वे भी भगवा गमछा ओढ़ कर ही धूप से अपना बचाव कर रहे हैं।

बलिया के एक पत्रकार जो अपना नाम नहीं उजागर होने देना चाहते, बताते हैं कि पिछले लोक सभा चुनाव से पहले से ही गरमी के दिनों में भाजपा ने अपने हर प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों को गिफ्ट में भगवा गमछा देना शुरू कर दिया था। जिसे सभी ने इस्तेमाल किया क्योंकि एक सामान्य गमछा कम से कम 100 रूपए में आता है। जिस पत्रकार को सैलेरी के नाम पर बहुत कुछ नहीं मिलता और जिसे गिफ्ट लेने की आदत हो गई होती है वो इसे लेने से क्यों इनकार करेगा। आखिर एक टोपी भी इससे महंगी आती है और उससे पूरा चेहरा भी नहीं बचाया जा सकता।

वो आगे बताते हैं कि भाजपा की देखा-देखी दूसरे दलों ने भी अपने रंग के गमछे देने शुरू किए थे लेकिन उनका आईडिया क्लिक नहीं कर पाया, क्योंकि वो पत्रकारिता के पेशे के अनुरूप नहीं था। क्योंकि बसपा या कांग्रेस और सपा का लाल-हरा गमछा लपेटने का मतलब इन पार्टियों का कार्यकर्ता दिखना हो जाता जबकि भगवा को धार्मिक और सांस्कृतिक के नाम पर चलाया जा सकता है।

इस समय बलिया जैसे कस्बेनुमा शहरों में ‘पत्रकार’ लिखे मोटर सायकिलों पर ऐसे ‘भगवा’ सर खूब देखे जा सकते हैं।

दरअसल, अन्य राजनीतिक दलों के मुकाबले भाजपा ही एक ऐसी पार्टी है जिसकी पहचान एक खास तरह का रंग हो और जिसकी सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि भी हो। अन्य दलों में सिर्फ वामपंथी दलों की लाल रंग से एकरूपता ही इसके मुकाबिल खड़ी है जिसकी अपनी एक ऐतिहासिकता रही है। हालांकि नीला रंग बसपा की पहचान है लेकिन, उसके सामाजिक जनाधार की कमजोर पृष्ठभूमि उसके सार्वजनिक प्रर्दशन से और वो भी शहरों में, उसे रोकती है।

दरअसल, गमछा उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में दबंगई का प्रतीक रहा है और इसे अमूमन राजनीतिक और सामाजिक तौर पर दबंग कहे जाने वाले तबकों द्वारा इसे राजनीतिक वर्चस्व के मनोवैज्ञानिक औजार के बतौर इस्तेमाल किए जाने का ट्रेंड रहा है। इसी वजह से बसपा सरकारों में भी नीले गमछे का इस्तेमाल गरमियों में सार्वजनिक तौर पर ज्यादा नहीं दिखता था।

वहीं समाजवादी पार्टी की पहचान किसी खास रंग से न जुड़े होने के कारण वो इस मामले में पिछड़ जाती रही है। कोई एक खास रंग न होने के कारण सफेद से ही उसके कार्यकताओं को काम चलाना पड़ता रहा है।

अगर कांग्रेस की बात करें तो उसके झंडे के राष्ट्रीय ध्वज से मेल खाने के चलते उसके सर और मुंह पर लपेट कर बांधने या पसीना पोछने जैसे रोजमर्रा की जरूरतों में प्रयोग किए जाने का नैतिक आधार कमजोर हो जाता है।

इस तरह इस ‘गमछा वार’ में भाजपा सब पर भारी पड़ रही है। जिसे बाजार भी खूब भुना रहा है।

सामान्य सफेद गमछा अगर सौ रूपए में बिक रहा है तो भगवा गमछा डेढ़ से दौ सौ में।

 (शाहनवाज आलम, स्वतंत्र पत्रकार और डॉक्यूमेंटरी फिल्मकार)        

 

 

 

 

 

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