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Kanhaiya Kumar

‪संघी कंसों का काल है‬ ‎अपना कन्हैय्या लाल है‬

कौन है ये कन्हैया कुमार ? और क्या बनाते जा रहे हैं हम इसे … Who is Kanhaiya Kumar? And what are we going to make it …

कन्हैया कुमार (Kanhaiya Kumar) अब दो तारीख तक जेल में हैं। इधर अब तक कोई भी सुबूत न मिलने …और उधर खुद ही इन संघ/ भाजपा की इन हरकतों के खिलाफ विद्यार्थी परिषद् (ABVP) के तीन नेताओं के इस्तीफे ने चीज़ों को और अधिक गहराई से देखने पर मजबूर कर दिया है।


मैं कभी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य नहीं रहा और न ही कन्हैया के संगठन आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (All India Students Federation) का…फिर भी… यहाँ चंद बातें रखना चाहता हूँ।

The basic objective of establishing All India Students Federation

कन्हैया आल इण्डिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का नेता है …

आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन की स्थापना लखनऊ में 1936 में हुई थी। यहीं अमीनाबाद के सबसे मशहूर गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल में। इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य था कि छात्रों नौजवानों की देश की आज़ादी और देश की बेहतरी में क्या भूमिका सुनिश्चित की जा सकती है। गौर करें 1931 तक भगत सिंह सहित ज़्यादातर क्रन्तिकारी नौजवानों को शहीद किया जा चुका था और बचे हुए लोग काला पानी की सजा काट रहे थे।

इस स्थापना सम्मेलन में जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेताओं ने अपने सन्देश और वक्तव्य भेजे थे। इसी स्टूडेंट्स फेडरेशन के नेतृत्व में पूरे देश के कालेज और यूनिवर्सिटी के छात्रों ने अंग्रेजों के खिलाफ जम कर संघर्ष किये, जेलें काटी और कई लोग लाठियों और गोलियों से मारे गए।

इसी स्टूडेंट्स फेडरेशन से बाद में मशहूर शायर बने अली सरदार जाफरी जैसे लोग लखनऊ युनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन के महामंत्री बने। कैफ़ी आज़मी जैसे लोगों का छात्र आन्दोलन इसी स्टूडेंट्स फेडरेशन की रहनुमाई में हुआ और वो मौलवी बनने की बजाय मजदूर नेता और शायर बने।

आप गौर करें 1925 में आरएसएस की स्थापना हुई, मगर काकोरी काण्ड से लेकर भगत सिंह की सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी बनने या सुभाष बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज बनने के दौर से लेकर स्टूडेंट्स फेडरेशन की स्थापना तक और इसके बाद 47 में आज़ादी मिलने तक आरएसएस के पास एक भी बड़ा क्या मामूली नेता या नाम नहीं है, जिसने आज़ादी के आन्दोलन में कोई क़ुरबानी दी हो। आखिर 22 बरस तक इन्होंने किया क्या ?? हाँ आज़ादी के बाद 1948 में सिर्फ एक बूढ़े गांधी की हत्या की, क्यूंकि ये विचारों से डरने वाले लोग हैं।

बहरहाल आज़ादी के बाद नेहरू की राय थी अब हम आज़ाद हैं और इन संगठनों की कोई ज़रूरत नहीं, इन्हें भंग कर देना चाहिए पर स्टूडेंट्स फेडरेशन का मानना था नहीं अभी तो बस राजनैतिक आज़ादी मिली है, छात्रों को न केवल अपने अधिकारों बल्कि दूसरे कमज़ोर वर्गों के लिए सामाजिक आज़ादी के लिए भी संघर्ष करना होगा, इसलिए संगठन की ज़रूरत आगे भी रहेगी।

यही वो सामाजिक आज़ादी थी जिसका हवाला भगत सिंह अपनी आज़ादी के मॉडल में करते हैं और जिसे ‘’पूरी आज़ादी’’ कहते हैं न कि गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों के हाथ में सत्ता आ जाना।

ये सच है आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के स्वतंत्र संगठन होने के बावजूद इसके ऊपर कम्युनिस्ट विचारधारा का असर था, क्यूंकि भगत सिंह के साथी रहे और काला पानी जैसी सजाएँ काट कर आये शिव वर्मा, अजय घोष जैसे क्रन्तिकारी न केवल स्टूडेंट्स फेडरेशन से बल्कि सीधे तौर पर ‘’भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी‘’ से जुड़े थे। बाद में क्रांतिकारी शिव वर्मा (Revolutionary Shiva Verma) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव बने और लखनऊ में क्रन्तिकारी दुर्गा भाभी के स्कूल लखनऊ मांटेसरी स्कूल में इन्होंने एक शहीद शोध केंद्र स्थापित किया। और क्रन्तिकारी कामरेड अजय घोष वहीं हैं जिनके नाम पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का मुख्यालय ‘’अजय भवन’’ है।

ये चीनी या रूसी नहीं बल्कि ‘’भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी‘’ थी जैसे पाकिस्तान सहित दुनिया के हर मुल्क में वहां की कम्युनिस्ट पार्टी हैं। चीन तो तब आज़ाद भी नहीं हुआ था।

वैसे लगे हाथ बता दूँ दुनिया के हर देश में तीन तरह की पार्टियाँ होती हैं। एक जो वहां के मजदूरों किसानों की कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट पार्टी होती है। दूसरी जो वहां के पूंजीपति–धन्ना सेठों की भारतीय जनता पार्टी टाइप पार्टी होती है और तीसरी जो कांग्रेस जैसी मध्यमार्गी पार्टी होती है जो कभी इधर कभी उधर झुकती रहती है।

इसी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इन्द्रजीत गुप्ता, चतुरानन मिश्र अपने बनारस के उदल, झारखंडे राय, सरजू पांडे जैसे ज़मीनी और कद्दावर नेता दिए, जो अपनी ईमानदारी, सादगी और लगातार विधानसभा और सांसदी के चुनाव जीतने की वजह से जनमानस पर छाये रहे।

साहित्यकार बाबा नागार्जुन, महापंडित राहुल संकृत्यायन, स्वामी सहजानंद सरस्वती फिल्मकार, ख्वाजा अहमद अब्बास, के आसिफ, फैज़ अहमद फैज़, सज्जाद ज़हीर, साहिर लुधियानवी, गीतकर शैलेन्द्र, महबूब ही नहीं ए के हंगल तक सब कम्युनिस्ट पार्टी के ही थे।

बाद में कांग्रेस के सहयोग और कुछ दूसरे मुद्दों पर कम्युनिस्ट पार्टी टूटी और सी पी आई (एम) अलग बनी। इन्हीं मुद्दों पर स्टूडेंट्स फेडरेशन भी टूटी और बाद में एसएफ़आई बनी।

कुछ ही बरस बाद बाद में सीपीआई (एम) के लोकल नेता चारू मजूमदार को जल्दबाजी में की हुई कार्यवाहियों के चलते निकाला गया और उन्होंने अपने साथियों के साथ नक्सलबाड़ी आन्दोलन की शुरुआत की।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और सीपीआई (एम) ने नक्सलबाड़ी मूवमेंट को हमेशा दुर्भाग्यपूर्ण और गलत कहा और भारतीय लोकतंत्र के मार्फ़त ही पहले व्यवस्था बदलने की बात कही। यही वजह है नक्सलवादी पार्टियों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और सीपीआई (एम) को अपना दुश्मन नंबर एक कहा और आपसी संघर्षों में इनसे जुड़े सैकड़ों कम्युनिस्टों मारे गए। उधर नक्सली कार्यवाहियों की वजह से राज्य सत्ता द्वारा भी हजारों होनहार छात्र नौजवान मारे गए। आगे चल कर अपनी गलत नीतियों और नेतृत्व के झगड़ों की वजह से ही नक्सली धारा में सैकड़ों गुट और पार्टियाँ बनीं।

आज की आइसा, पीएसओ, डीएसओ और जाने कितने संगठन उन्हीं नक्सली पार्टियों के समर्थक छात्रों के हैं। पर बाद के दिनों में सीपीआई (एम एल) और आइसा वापस जनतांत्रिक धारा में आकर जनता को संगठित करके बदलाव की मंशा रखते हैं। और दूसरे अतिवादी वाम गुट इन्हें संशोधनवादी या दलाल या दूसरे आरोपों से ख़ारिज करते हैं।

It is necessary to open some eyesight to know the left.

मेरा मतलब कौन सही या कौन गलत का नहीं, बल्कि ये बताना है कि लेफ्ट या वाम को जानने के लिए कुछ नज़र खोलना ज़रूरी है। सबकी अलग नीतियां और अलग रास्ते हैं और उनमें उतने ही तीखे मतभेद भी हैं जितने कांग्रेस भाजपा या भाजपा और लेफ्ट के बीच।

Kanhaiya Kumar” politics

आल इण्डिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का ‘’कन्हैया कुमार‘’ की राजनीति एक जुझारू लोकतान्त्रिक संघर्षों की राजनीति रही है।

दूसरी बात डेमोक्रेसी में सभी को अपनी राजनीति करने और समझ बदलने पर पार्टियाँ या संगठन बदलने का हक है। कम्युनिस्ट भाजपाइयों को देश का गद्दार कहते हैं भाजपायी कम्युनिस्टों को ..कांग्रेसियों को …, मगर ये सब नारों के रूप में। क्यूंकि लगता है दूसरे की नीतियां देश को नुकसान पहुंचा रही हैं इसलिए वो देश विरोधी है, लेकिन कभी इसे मीडिया ट्रायल…हिंसक हमले, कोर्ट में हमले जैसे एक्ट  में नहीं बदला गया। ये राजनीति का फासीवादीकरण है।

Left leader, who rose to the top in other parties

आइये आपको कुछ पुराने और कुछ आज के नाम बताते हैं। भाजपा के लखनऊ के सांसद कौशल किशोर, सांसद उदित राज, नीति निर्धारक और पत्रकार चन्दन मित्रा जैसे कितने लोग स्टूडेंट्स फेडरेशन और कम्युनिस्ट पार्टी के रहे हैं। इनसे पूछिए क्या ये देशद्रोही थे? बसपा के सांसद रहे गंगा चरण राजपूत, कांग्रेसी विधायक अनुग्रह नारायण सिंह हों या राष्ट्रवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद डी पी त्रिपाठी सब एसएफ़आई से ही निकले हैं। “आप” के मंत्री गोपाल राय हों या सपा के मित्रसेन यादव ऐसे सैकड़ों नामों ने राजनीति लेफ्ट की करी और सीखी है।

लखनऊ यूनिवर्सिटी चुनाव में भी पहली महत्वपूर्ण जीत ABVP को जिस प्रत्याशी के रूप में मिली थी, वो उनका नहीं लेफ्ट का लीडर था, जिसे एक हफ्ते पहले ही उसके संगठन ने निर्णय न मानने पर निकाला था। बड़ी आसानी से लोग कांग्रेस से भाजपा, भाजपा से सपा, सपा से बसपा में जाते हैं। ये अक्सर राजनैतिक अवसरवाद की वजह से होता है पद और चुनाव में टिकट मिलने की ख्वाहिश से।

Left politics from Hindi belt

मगर 90 के बाद से जो लोग हिंदी बेल्ट से लेफ्ट की राजनीति में शामिल हुए वो जनता के लिए प्रतिबद्ध थे, क्यूंकि बाकी सभी पार्टियों में पैसा–पद–चुनाव या दूसरे फायदे हैं मगर लेफ्ट में ऐसा कुछ भी नहीं। वो अपना समय, अपनी ऊर्जा उठती हुई भाजपा, बसपा, सपा में कहीं लगाते तो 20 बरस में बड़े नेता होते। इसके बावजूद मेरे दर्जनों दोस्त ऐसे हैं जो संघ की शाखा और बजरंग दल की राजनीति छोड़ कर कम्युनिस्ट पार्टियों के संघर्षों में शामिल हो गए जबकि उत्तर प्रदेश की राजनैतिक ज़मीन पर उन्हें कुछ नहीं मिलना।

सिर्फ यही नहीं, ये जानना भी ज़रूरी है दक्षिणपंथी नारों और हरकतों की प्रतिक्रिया जब पकिस्तान और बांग्लादेश के हिन्दू अल्पसंख्यकों पर होती है तो ये संघ और भाजपा उनके लिए नहीं लड़ते बल्कि वहां की मजदूर कम्युनिस्ट पार्टियां लड़ती हैं, उनके कार्यकर्ता मारे जाते हैं, उनके दफ्तर जलाए जाते हैं … पाकिस्तानी कम्युनिस्ट पार्टियों के फैज़ और सज्जाद ज़हीर जैसे लेखकों को भी बरसों जेल में रहना पड़ा। सज्जाद ज़हीर की बेटियां हिंदुस्तान में हैं जिन्हें आप नूर ज़हीर और नादिरा बब्बर के नाम से पढ़ते-देखते हैं।

अफगानिस्तान में तालिबानों से कम्युनिस्ट ही लड़ते हुए मारे गए और तालिबानों की हिंसा का भारत में सबसे ज्यादा विरोध लेफ्ट ने ही किया।

काश्मीर और पंजाब में भी संघ नहीं लेफ्ट के कार्यकर्ता कुर्बान हुए हैं। कितनो को तो व्यक्तिगत मैं जानता था। काश्मीर में विधायक युसूफ तारीगामी 4 आतंकवादी हमले झेल चुके हैं। उधर पंजाब में तो खालसा आतंकवादियों ने कम्युनिस्ट और लेफ्ट कार्यकर्ताओं की पूरी लिस्ट जारी की थी कि ये हिन्दुस्तानी कुत्ते हैं।

जबकि भाजपा उसी देश विरोधी अकाली दल या PDP के साथ सरकार बनाये हैं।

ये लेख लिखना इसलिए ज़रूरी लगा कि सत्ता पाने के लिए राजनैतिक पार्टियाँ जनता को बेवकूफ बनाती रहती हैं, चुनाव जीतने के लालच में नेता एक से दूसरी पार्टी जाते रहते हैं। जनता भी उकता कर एक पार्टी को हराकर दूसरी पार्टी को जिताती रहती है। ये लोकतंत्र है इसे और बेहतर और मजबूत और जवाबदेह बनाने की ज़रूरत है।

मगर जब माहौल ऐसा हो जाए कि जनता को राजनीति से विरक्ति हो जाए और उसे अराजनीतिक बनाने की साजिशें रची जाएँ तो लोकतंत्र कमज़ोर हो जाता है, अफवाह और गलत फहमियां पैदा होती हैं, संवाद की राजनीति ख़त्म होती है।

This is fascist politics, this is politics to break the country

दादरी हो या रोहित वेमुला या कन्हैया प्रकरण। यहाँ सच जानते हुए भी सच को छुपाया जा रहा है, अपने चाटुकार मीडिया का इस्तेमाल करके, फोटो मार्फ़ करके, भीड़ की हिंसक राजनीति का इस्तेमाल करके एक आतंक का माहौल बनाया जा रहा है। ये ‘’फासीवादी‘’ राजनीति है, ये देश तोड़ने की राजनीति है

ज़रा सी भी राजनीति जानने वाले ये जानते हैं। जेएनयू में व्यक्ति कुछ नहीं होता, वहां संगठन और विचारधारा की लड़ाई है। वहां कन्हैया हों या नासिर हों या रोहित हों हरजिंदर या सुनीता, इन नामों से चुनाव नहीं होता बल्कि कौन किस संगठन का है। AISF, SFI, AISA, ABVP, NSUI और दूसरे संगठन चुनाव लड़ते हैं। चूँकि वहां लेफ्ट का गढ़ है इसलिए लेफ्ट में ही अलग-अलग नीतियों  और रास्तों को लेकर भयानक जंग होती है।

कन्हैया AISF का प्रत्याशी था और AISF की राजनीति कभी भी अतिवादी नहीं रही बल्कि लोकतांत्रिक रही। कैम्पस की राजनीति जानने वाले सिर्फ संगठन के नाम से ये बता सकते हैं कौन, कौन से नारे लगा सकता है। और लेफ्ट की ईमानदारी के कायल तो उसके दुश्मन भी हैं।

फिर भी अगर ग़लतफ़हमी थी पर नीयत ठीक थी तो कन्हैया से पूछताछ करके तुरंत पता चल जाता मगर ये मीडिया ट्रायल, ये पूरे JNU के खिलाफ हिंसा, लड़कियों को वेश्या रंडी कहना, ये फोटो और रिकार्डिंग मॉर्फ करना, ये लगातार कोर्ट में हमले करना,पत्रकारों को मारना उनके कैमरे से फोटो डिलीट कराना, सुप्रीम कोर्ट की टीम को पाकिस्तानी दलाल कहना, पूरे देश में आतंक का माहौल बनाना…. ये दिखा रहा है कि सरकार देश के लोकतंत्र को ख़त्म करके भीड़, झूठ और अफवाह और हिंसा की राजनीति करना चाहती है। ये अटल की भाजपा का लोकतंत्र नहीं, ये मुसोलिनी और हिटलर का फासीवाद है, जिसे अगर नहीं रोका गया तो कन्हैया और रोहित जैसे कितने गरीब मेधावी छात्र मारे जायेंगे।

हाँ ! आज़ादी वाले गाने के तार भी लखनऊ से जुड़े हैं, उसकी कहानी भी लिखूंगा मगर लेफ्ट की राजनीति में जो नारा हमने सबसे ज्यादा लगाया था वो ये है ….

मजदूर की रक्षा कौन करेगा –हम करेंगे, हम करेंगे

किसान की रक्षा कौन करेगा –हम करेंगे, हम करेंगे

अमन की रक्षा कौन करेगा –हम करेंगे, हम करेंगे

फिरका वाद से कौन लडेगा हम लड़ेंगे, हम लड़ेंगे

जातिवाद से कौन लडेगा – हम लड़ेंगे, हम लड़ेंगे

क्षेत्रवाद से कौन लडेगा – हम लड़ेंगे, हम लड़ेंगे

सामंतवाद से कौन लडेगा – हम लड़ेंगे, हम लड़ेंगे

देश की रक्षा कौन करेगा –हम करेंगे, हम करेंगे

दीपक कबीर

लेखक रंगमंचकर्मी हैं

आप हस्तक्षेप के पुराने पाठक हैं। हम जानते हैं आप जैसे लोगों की वजह से दूसरी दुनिया संभव है। बहुत सी लड़ाइयाँ जीती जानी हैं, लेकिन हम उन्हें एक साथ लड़ेंगे — हम सब। Hastakshep.com आपका सामान्य समाचार आउटलेट नहीं है। हम क्लिक पर जीवित नहीं रहते हैं। हम विज्ञापन में डॉलर नहीं चाहते हैं। हम चाहते हैं कि दुनिया एक बेहतर जगह बने। लेकिन हम इसे अकेले नहीं कर सकते। हमें आपकी आवश्यकता है। यदि आप आज मदद कर सकते हैंक्योंकि हर आकार का हर उपहार मायने रखता है – कृपया। आपके समर्थन के बिना हम अस्तित्व में नहीं होंगे। Paytm – 9312873760 Donate online – https://www.payumoney.com/paybypayumoney/#/6EBED60B33ADC3D2BC1E1EB42C223F29

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