तथ्य : सरदार पटेल 370 का प्रस्ताव लेकर आए, पंडित नेहरू विदेश में थे और श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने समर्थन किया

सारा खेल पॉलिटिकल परसेप्शन (Political perception,) का है, और देश की बहुसंख्यक आबादी इस वक्त सत्ता के परसेप्शन गेम में पूरे तरीके से उलझी हुई है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। लद्दाख से भाजपा सांसद जामयांग शेरिंग नामग्याल (BJP MP from Ladakh Jamyang Tshering Namgyal) ने लोकसभा में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल (Jammu and Kashmir State Reorganization Bill) पर अपना भाषण दिया। इस भाषण को भाजपा कार्यकर्ताओं और भक्तों की मंडली ने ये कहकर प्रचारित किया कि लद्दाख के एमपी का बयान करगिल समेत पूरे लद्दाख की राय है। लोकतांत्रिक प्रणाली (Democratic system) में हालांकि ऐसा होना मुमकिन नहीं है लेकिन फिर भी अगर इसे मान भी लिया जाए तो क्या ये केवल लद्दाख के एमपी नामग्याल पर ही लागू होगा? या फिर संसद में निर्वाचित होकर आए जम्मू-कश्मीर के बाकी प्रतिनिधियों पर भी इसे लागू करना होगा। ज़ाहिर है लद्दाख के एमपी की तरह बाकियों की राय को भी उस इलाक़े की राय मानना चाहिए लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा।

जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस की तरफ से अनंतनाग से सांसद हसनैन मसूदी ने लोकसभा में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल पर अपनी पार्टी का पक्ष रखा।

हसनैन मसूदी खान हाईकोर्ट में जज रह चुके हैं और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़े हैं। लद्दाख के एमपी नामग्याल की तरह हसनैन मसूदी की राय को कश्मीर की राय नहीं मानी गई।

यहां ये जानना जरूरी है कि कश्मीर की बाकी दो सीटें बारामूला और श्रीनगर में भी जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के ही सांसद हैं। लेकिन हसनैन मसूदी को भाषण के वक्त ना केवल भाजपा के सीनियर नेताओं की हूटिंग का सामना करना पड़ा, बल्कि राजनाथ सिंह जैसे गंभीर सियासतदां भी हसनैन मसूदी के बयान को ग़लत तरीके से कोट करते नज़र आए।

ये खेल परसेप्शन का है जिसमें भक्त मंडली, भाजपा आईटी सेल और मुख्यधारा की मीडिया एक विचार विशेष की राय को देश की राय कहकर प्रचारित कर रही है और इसमें कामयाब भी हो रही है।

एक बात और ग़ौर करने लायक है कि राज्यसभा और लोकसभा में चर्चा के दौरान दिनभर भाजपा के नेता दो परिवार-तीन परिवार का रट लगाते रहे। अब ये भी जान लेना चाहिए के आखिर इन दो-तीन परिवार के नेताओं की छवि घाटी में कैसी है। कश्मीर के अलगाववादी इन्हें घाटी में भारत के एजेंड के तौर पर प्रचारित करते रहे हैं। इसलिए ऐसा भी कहा जा सकता है कि लोकसभा और राज्यसभा की दिनभर की बहस में सत्ताधारी दल घाटी के अलगाववादियों का काम आसान करते नज़र आए।

एक और बात महत्वपूर्ण है कि इतिहास के नाम पर सरकार ने जो कुछ देश के सामने परोसा है, उसमें सुविधा के हिसाब से चीजें दिखाई और छिपाई तो गई ही हैं, बड़े पैमाने पर झूठ का भी सहारा लिया गया है।

सरदार पटेल और पंडित नेहरू की कश्मीर नीति के बारे में सत्ताधारी दल की तरफ से जो कुछ भी बोला गया उसका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है।

इसके साथ ही सबसे बड़ा झूठ तो डॉ अंबेडकर और डॉ लोहिया को ग़लत कोट करके बोला गया है। दोनों बड़े नेताओँ के हवाले से गृह मंत्री ने संसद में कश्मीर का जो भी इतिहास सामने रखा, वो राष्ट्र निर्माताओं के विचार को अपनी सुविधा के मुताबिक कोट करने की वजह से आपत्तिजनक भी है।

डॉ लोहिया जहां भारत-पाकिस्तान महासंघ बनाने की बात कहते थे तो बाबा साहेब अंबेडकर ने कश्मीर के मुस्लिम बहुल इलाक़े को कई बार पाकिस्तान को देने की वकालत की थी।

सरदार पटेल तो खुद 370 का प्रस्ताव लेकर आए थे, पंडित नेहरू विदेश में थे तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बतौर सदस्य 370 का उस वक्त कोई विरोध नहीं किया था।

इसमें हैरानी की कोई बात नहीं कि, प्रचंड बहुमत की सरकार अपने हित के लिए जान बूझकर ग़लत इतिहास सामने रख रही है। लेकिन इस ऐतिहासिक घड़ी में गांधीवादी, समाजवादी, वामपंथी और सक्रिय बुद्धिजीवी सब सरकारी साजिश का शिकार हो रहे हैं। माहौल बनाया जा रहा है कि इस वक्त को सरकार को समर्थन की जरूरत है, लेकिन सच्चाई ये है कि इस वक्त कश्मीर को समर्थन की जरूरत है।

राजेश कुमार

(लेखक टीवी पत्रकार हैं।)